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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Paris Agreement at Risk: Key Insights from UNEP’s Emissions Gap Report 2024

UNEP उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2024: पेरिस समझौते की सीमा से आगे बढ़ती दुनिया का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

भूमिका

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा जारी उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2024 ने स्पष्ट कर दिया है कि पेरिस समझौते (2015) में तय 1.5°C तापमान सीमा का अस्थायी उल्लंघन अब लगभग निश्चित है।
यह रिपोर्ट किसी नए संकट की घोषणा नहीं करती, बल्कि उस संकट की पुष्टि करती है जिसकी चेतावनी पिछले कई वर्षों से दी जा रही थी — कि वैश्विक नीतियाँ विज्ञान की गति से नहीं चल रहीं।

पेरिस समझौते का मूल लक्ष्य था कि औद्योगिक युग से पहले के औसत तापमान की तुलना में वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखा जाए। यह लक्ष्य इसलिए तय किया गया क्योंकि इसी सीमा के भीतर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। किंतु UNEP की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि मानवता इस सीमा के बहुत करीब पहुँच चुकी है और मौजूदा प्रयास अपर्याप्त हैं।


उत्सर्जन अंतराल: अवधारणा और महत्व

“उत्सर्जन अंतराल” (Emissions Gap) वह दूरी है जो वास्तविक नीतिगत कार्यवाहियों और जलवायु लक्ष्यों के बीच बनी हुई है।
दूसरे शब्दों में, यह अंतराल बताता है कि यदि सभी देश अपने वादे पूरे भी कर लें, तब भी पृथ्वी का तापमान नियंत्रित करने के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा।

इसका महत्व इस तथ्य में है कि यह अंतराल वैश्विक शासन की नाकामी का सूचक बन गया है।
हर वर्ष जलवायु सम्मेलनों में प्रतिबद्धताएँ बढ़ती हैं, परंतु उत्सर्जन घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है।
यह स्थिति बताती है कि वैश्विक जलवायु नीति में इरादे और क्रियान्वयन के बीच की खाई अब खतरनाक रूप ले चुकी है।


जलवायु शासन की वास्तविक चुनौती

UNEP की रिपोर्ट इस तथ्य को रेखांकित करती है कि दुनिया “दीर्घकालिक लक्ष्यों” की घोषणा में तो सक्रिय है, परंतु “तात्कालिक कार्रवाई” के मोर्चे पर निष्क्रिय।
अधिकांश देशों ने 2050 या 2060 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन (Net Zero) का वादा किया है, लेकिन अगले पाँच से दस वर्षों में क्या कदम उठाए जाएँगे, इसकी कोई ठोस रूपरेखा नहीं है।

नीतिगत रूप से यह सबसे बड़ा विरोधाभास है — जहाँ भविष्य के वादों से राजनीतिक लाभ तो लिया जाता है, किंतु वर्तमान के निर्णायक कदमों से बचा जाता है।
रिपोर्ट इसी प्रवृत्ति को वैश्विक जलवायु शासन की “संरचनात्मक जड़ता” (structural inertia) कहती है।

यह जड़ता तीन स्तरों पर दिखाई देती है:

  1. आर्थिक संरचना में — जहाँ जीवाश्म ईंधन आधारित विकास मॉडल अभी भी प्रमुख है।
  2. वित्तीय तंत्र में — जो अब भी स्वच्छ ऊर्जा के बजाय परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को अधिक समर्थन देता है।
  3. राजनीतिक निर्णयों में — जहाँ दीर्घकालिक समाधान को अल्पकालिक राजनीतिक हितों के सामने दबा दिया जाता है।

असमानता और जलवायु न्याय

जलवायु संकट की एक बुनियादी विशेषता यह है कि इसका प्रभाव समान नहीं है।
जो देश उत्सर्जन में सबसे अधिक योगदान देते हैं, वे उसके परिणामों से अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं; जबकि वे देश जो न्यूनतम उत्सर्जन करते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

यह विरोधाभास “जलवायु न्याय” (Climate Justice) की अवधारणा को जन्म देता है।
विकासशील देशों का तर्क है कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों ने औद्योगिक युग में विशाल मात्रा में कार्बन उत्सर्जन किया, जिससे आज की जलवायु अस्थिरता उत्पन्न हुई।
इसलिए अब जब कटौती की जिम्मेदारी की बात आती है, तो उसे समानता और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए।

UNEP की रिपोर्ट इसी नैतिक दृष्टिकोण को समर्थन देती है।
यह कहती है कि जलवायु कार्रवाई का अर्थ केवल उत्सर्जन घटाना नहीं, बल्कि न्यायोचित संक्रमण (Just Transition) सुनिश्चित करना भी है —
अर्थात, ऐसी नीतियाँ जो ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया में गरीबों, श्रमिकों और विकासशील समाजों के हितों की रक्षा करें।


विकास बनाम पर्यावरण: द्वंद्व का पुनर्परिभाषण

लंबे समय तक यह मान्यता रही कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी हैं।
लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह दृष्टिकोण अप्रासंगिक होता जा रहा है।
अब प्रश्न यह नहीं कि विकास कैसे रोका जाए, बल्कि यह है कि विकास किस दिशा में आगे बढ़े।

UNEP की रिपोर्ट कहती है कि यदि ऊर्जा, परिवहन, कृषि और शहरी नियोजन के ढांचे को हरित बनाया जाए तो उत्सर्जन घटाते हुए भी आर्थिक प्रगति संभव है।
दरअसल, जलवायु परिवर्तन अब “पर्यावरणीय चुनौती” नहीं बल्कि “विकास मॉडल की चुनौती” है।

इसलिए समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संरचनात्मक और व्यवहारिक परिवर्तन में निहित हैं —
ऐसा परिवर्तन जो उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था की जगह सतत (sustainable) जीवनशैली को बढ़ावा दे।


जलवायु वित्त और वैश्विक उत्तरदायित्व

रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई का सबसे कमजोर स्तंभ “वित्त” है।
विकासशील देशों के पास नवीकरणीय ऊर्जा, अवसंरचना पुनर्निर्माण और अनुकूलन (adaptation) परियोजनाओं के लिए आवश्यक पूंजी नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा वादा किया गया जलवायु वित्त (Climate Finance) अभी तक अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचा।

वास्तव में, यदि दुनिया गंभीरता से पेरिस लक्ष्य हासिल करना चाहती है तो वित्तीय प्रवाह की दिशा बदलनी होगी —
जीवाश्म ईंधन सब्सिडी से हटकर हरित निवेश की ओर।
इस दिशा में UNEP का संकेत है कि जलवायु नीति को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक नीति का केंद्र बनाया जाए।


नीति और विज्ञान के बीच की खाई

रिपोर्ट का सबसे गहरा संदेश यह है कि विज्ञान ने हमें बहुत पहले बता दिया था कि क्या करना चाहिए, परंतु राजनीति यह तय नहीं कर पाई कि कब और कितनी तेजी से करना चाहिए।
यह खाई केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक है —
मानव समाज अब भी यह स्वीकारने को तैयार नहीं कि जलवायु संकट तत्काल और अपरिवर्तनीय हो सकता है।

“अस्थायी ओवरशूट” की अवधारणा इसी मानसिकता का परिणाम है — यह मान लिया गया है कि तापमान कुछ समय के लिए 1.5°C से ऊपर चला जाएगा और बाद में तकनीकी उपायों से इसे घटाया जा सकेगा।
परंतु यह दृष्टिकोण खतरनाक है, क्योंकि जलवायु प्रणाली में कई बदलाव ऐसे हैं जिन्हें वापस नहीं मोड़ा जा सकता।
हिमनदों का पिघलना, समुद्र-स्तर वृद्धि और जैव विविधता का क्षय स्थायी हानियाँ हैं।


COP30: निर्णायक अवसर

2025 में ब्राज़ील के बेलेम में होने वाला COP30 जलवायु शासन के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
यह 2030 से पहले राष्ट्रीय योगदानों (NDCs) के अद्यतन का अंतिम अवसर है।
UNEP की सिफारिश है कि नए NDCs केवल संख्यात्मक लक्ष्य न हों, बल्कि संरचनात्मक नीतियों का रूप लें —
जैसे ऊर्जा संक्रमण, मीथेन नियंत्रण, कृषि सुधार, और न्यायोचित आर्थिक परिवर्तन।

यह सम्मेलन तय करेगा कि मानवता अब भी अपने सामूहिक भविष्य को बचाने की इच्छा रखती है या नहीं।


निष्कर्ष

उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2024 केवल एक वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक नैतिक दर्पण है —
जो हमें दिखाता है कि हम जानते हैं कि क्या करना है, पर उसे करने की सामूहिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा पा रहे।

पेरिस समझौते की 1.5°C सीमा अब केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि मानवता की जिम्मेदारी की कसौटी है।
यदि हम आने वाले वर्षों में निर्णायक कदम नहीं उठाते, तो 21वीं सदी के उत्तरार्ध में जलवायु संकट मानव इतिहास की सबसे बड़ी विफलता बन जाएगा।

विकास और पर्यावरण का प्रश्न अब “या तो-या” का नहीं रहा; यह “कैसे” का प्रश्न है।
कैसे हम ऐसा विकास सुनिश्चित करें जो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से समझौता न करे।

भविष्य अभी भी हमारे हाथ में है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है।
UNEP की यह रिपोर्ट हमें भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है —
क्योंकि जलवायु संकट के विरुद्ध युद्ध विज्ञान से नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और सहयोग की शक्ति से जीता जा सकता है।


संदर्भ

  • UNEP (2024). Emissions Gap Report 2024: No More Hot Air.
  • IPCC (2022). Sixth Assessment Report – Mitigation of Climate Change.
  • Climate Action Tracker (2024). Global Thermometer Analysis.
  • Reuters Summary, 24 October 2024.


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