अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
भारत–रूस द्विपक्षीय संबंधों का नया अध्याय: हैदराबाद हाउस वार्ता और सात समझौतों का बहुआयामी विश्लेषण परिचय अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ साझेदारियाँ समय की कसौटी पर खरी उतरती हैं—भारत और रूस का संबंध उन्हीं में से एक है। शीत युद्ध के तनावपूर्ण दौर से लेकर वैश्विक शक्ति-संतुलन के वर्तमान परिवर्तनों तक, दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ निभाया है। 5 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई वार्ता उन समानताओं और रणनीतिक विश्वास की पुनर्पुष्टि है, जिन पर यह संबंध खड़ा है। सात नए समझौतों पर हस्ताक्षर कर भारत और रूस ने न केवल अपने पारंपरिक सहयोग को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला, बल्कि वैश्विक मल्टी-पोलैरिटी के दौर में मजबूत साझेदारी का संकेत भी दिया। यह लेख इन समझौतों के प्रासंगिक आयामों, भू-राजनीतिक निहितार्थों, आर्थिक परिणामों और भारत–रूस संबंधों के भविष्य का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सात दशक की रणनीतिक संगति भारत–रूस संबंधों की मजबूत नींव ऐतिहासिक घटनाओं में निहित है। 1971 का भ...