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Empowerment vs Protectionism in India: Constitutional Rights, Women’s Agency and State Intervention Debate
सशक्तिकरण बनाम संरक्षणवाद: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा विशेष संपादकीय | भूमिका: एक उभरता हुआ संवैधानिक द्वंद्व समकालीन भारतीय राजनीति एक गहरे वैचारिक द्वंद्व के दौर से गुजर रही है। एक ओर ‘नारी शक्ति’, ‘समावेशी प्रतिनिधित्व’ और ‘सशक्तिकरण’ जैसे प्रगतिशील नारों के माध्यम से राज्य स्वयं को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक प्रस्तुत कर रहा है; वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन के अत्यंत निजी क्षेत्रों—विशेषकर विवाह, धर्म और पसंद—में उसका हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है। यह विरोधाभास केवल राजनीतिक रणनीति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों— स्वतंत्रता, समानता और गरिमा —की पुनर्व्याख्या की चुनौती भी है। यह बहस आज केवल न्यायालयों या विधानसभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी प्रश्न को सामने लाती है: क्या राज्य नागरिकों का संरक्षक (protector) है या उनके अधिकारों का सक्षमकर्ता (enabler)? राजनीतिक अनुकूलनशीलता: ‘इमेज’ और ‘आइडियोलॉजी’ का संतुलन भारतीय राजनीति, विशेषकर सत्तारूढ़ दलों की रणनीति, समय के साथ बदलते सामा...