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भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र: उपलब्धियों के उत्साह से चुनौतियों के यथार्थ तक, फिर भी निर्यात-आधारित भविष्य की ठोस बुनियाद भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की कहानी लंबे समय तक “कम लागत–उच्च प्रभाव” के मॉडल की मिसाल रही है। सीमित संसाधनों में असाधारण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ—चंद्रयान-1 से लेकर मंगलयान तक—ने भारत को केवल एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय अंतरिक्ष भागीदार के रूप में स्थापित किया। इस क्रम में 2019 का चंद्रयान-2 ऑर्बिटर और 2023 का चंद्रयान-3, जिसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रचा, भारत की तकनीकी परिपक्वता और रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बने। यह केवल विज्ञान की जीत नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षाओं की भी उड़ान थी। लेकिन अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रगति रैखिक नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश करता दिख रहा है, जहाँ उत्साह और आत्मविश्वास के साथ-साथ चुनौतियाँ और आत्ममंथन भी समान रूप से उपस्थित हैं। ‘वर्कहॉर्स’ की थकान और विश्वसनीयता का प्रश्न इस संक्रमण का सबसे स्पष्ट संकेत इसरो के सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण...