भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...
2025–2026 ईरान विरोध प्रदर्शन: आर्थिक संकट से उपजी जन-आक्रोश की नई लहर प्रस्तावना दिसंबर 2025 के उत्तरार्ध में शुरू होकर जनवरी 2026 तक जारी रहने वाले ईरान के विरोध प्रदर्शन केवल कुछ दिनों की असंतोष-लहर नहीं थे, बल्कि वे उस गहरे आर्थिक और सामाजिक संघर्ष का विस्फोट थे जो वर्षों से भीतर-ही-भीतर पनप रहा था। राजधानी तेहरान के बाजारों में दुकानदारों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही छात्रों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग तक फैल गया। यह उभार 2022 के महसा अमीनी विरोधों के बाद सबसे बड़ा और सबसे व्यापक जन-आंदोलन माना जा रहा है, जहाँ आर्थिक पीड़ा राजनीतिक अविश्वास में बदलती हुई दिखाई दी। आर्थिक संकट: असंतोष की जड़ ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से प्रतिबंधों, सीमित निवेश, तेल-राजस्व की अनिश्चितता और संस्थागत अक्षमताओं का बोझ ढो रही है। 2025 में इज़रायल के साथ 12-दिवसीय संघर्ष, वैश्विक कूटनीतिक दबाव और ऊर्जा व्यापार में गिरावट ने स्थिति को और नाजुक बना दिया। दिसंबर 2025 के अंत तक ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से गिरकर लगभग 1.42–1.45 मिलियन रियाल प्रति डॉलर के स्त...