अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
जाति जनगणना: सामाजिक न्याय से डेटा न्याय की ओर प्रस्तावना भारतीय लोकतंत्र की जड़ों में यदि कोई तत्व सबसे गहराई तक व्याप्त है, तो वह है जाति । यह केवल सामाजिक पहचान का नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों की पहुंच का निर्धारक रही है। स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा ने समानता और समावेशन का लक्ष्य रखा, परंतु यह लक्ष्य अब भी अधूरा है। मंडल आयोग (1980) की सिफारिशों के बाद आरक्षण नीति ने वंचित वर्गों को सशक्त किया, किंतु इसकी आधारशिला 1931 की जनगणना पर टिकी रही — यानी ऐसे डेटा पर जो आज की सामाजिक वास्तविकता से मेल नहीं खाता। इसी संदर्भ में प्रख्यात विचारक आनंद तेलतुंबड़े ने अपनी नवीनतम पुस्तक Caste con census में यह तर्क रखा कि अब समय आ गया है जब भारत को सामाजिक न्याय से आगे बढ़कर "डेटा न्याय" की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। द हिंदू के साथ बातचीत में उन्होंने कहा — “Caste census is not social justice, but data justice.” यह कथन मात्र वैचारिक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की दिशा तय करने वाला बिंदु है। सामाजिक न्याय से डेटा न्या...