अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
भारत–संयुक्त अरब अमीरात (UAE) संबंध: आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी की नई ऊँचाइयाँ एक मौलिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन भूमिका 21वीं सदी में भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार “मल्टी-अलाइनमेंट” बन चुका है—अर्थात् किसी एक गुट पर निर्भर हुए बिना, सभी प्रभावशाली शक्तियों और क्षेत्रों के साथ व्यावहारिक और हित-आधारित संबंध। इसी नीति का सबसे सशक्त उदाहरण भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच तेजी से गहराता रिश्ता है। 20 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान (MbZ) की द्विपक्षीय बैठक केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह संकेत थी कि भारत और UAE अब पारंपरिक तेल-व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं। यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया गाजा संकट, यमन संघर्ष, सऊदी-पाक रक्षा समीकरण और अमेरिका की अस्थिर नीतियों के कारण गहरी अनिश्चितता से गुजर रहा है। ऐसे माहौल में भारत-UAE समझौते स्थिरता और दीर्घकालिक साझेदारी का संकेत देते हैं। आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी: तेल से आगे की कहानी भारत और U...