अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
“ऊंट संरक्षण: रेगिस्तान के इस जीवित प्रतीक को बचाना क्यों जरूरी है?” कभी रेगिस्तान की रेत पर सभ्यता की गति और संस्कृति की गूंज ऊंट की चाल से मापी जाती थी। आज वही ऊंट—थार की आत्मा, राजस्थान की पहचान और भारत की विरासत—अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है। यह केवल एक पशु के विलुप्त होने की कहानी नहीं, बल्कि हमारी नीतियों, प्राथमिकताओं और पर्यावरणीय दृष्टिकोण के कमजोर पड़ने का प्रतीक है। 1977 में जहां देश में लगभग 11 लाख ऊंट थे, वहीं 2019 तक यह संख्या घटकर केवल 2.52 लाख रह गई। यानी 42 वर्षों में 75 प्रतिशत से अधिक की गिरावट। यह आंकड़ा केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत संवेदनहीनता की सजीव तस्वीर है। गिरावट की जड़ें: आधुनिकता के रेगिस्तान में परंपरा की मौत ऊंट सदियों से मरुस्थलीय भारत के लिए जीवन का आधार रहा है। वह न केवल परिवहन का साधन था, बल्कि दूध, ऊन, मांस और कृषि में भी उपयोगी रहा। परंतु पिछले चार दशकों में तकनीकी विकास और औद्योगिक परिवर्तनों ने इस पारंपरिक संबंध को तोड़ दिया। ट्रैक्टर और ट्रक ने ऊंट गाड़ियों की जगह ले ली, सिंथेटिक कपड़ों ने ऊंट ऊन की मांग घटा दी, और सर...