अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
ट्रम्प की H-1B नीति: भारत के लिए चुनौती या अवसर? संपादकीय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया कार्यकारी आदेश ने वैश्विक आईटी उद्योग को हिला दिया है। 20 सितंबर को जारी प्रोक्लेमेशन के तहत, एच-1बी वीजा के नए आवेदकों के लिए एकमुश्त 100,000 डॉलर (लगभग 84 लाख रुपये) की फीस लगाई गई है। यह कदम अमेरिकी श्रम बाजार को 'अमेरिकन वर्कर्स फर्स्ट' नीति के तहत मजबूत करने का प्रयास है, लेकिन इसका सबसे बड़ा निशाना भारत है – जहां से कुल एच-1बी वीजा का 71 प्रतिशत हिस्सा आता है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि यह फीस मौजूदा वीजा धारकों पर लागू नहीं होगी, फिर भी भारतीय आईटी कंपनियों और युवा प्रतिभाओं के लिए यह एक बड़ा झटका है। भारत सरकार ने इसे 'मानवीय परिणामों' वाली चिंता बताते हुए कूटनीतिक स्तर पर आवाज बुलंद की है।इस संपादकीय में हम इस नीति के भारत पर पड़ने वाले बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण करेंगे। भारत का एच-1बी निर्भरता: एक आंकड़ों की झलक भारतीय आईटी क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर बुरी तरह निर्भर है। नास्कॉम के अनुसार, 2024 में भारतीय कंपनियों ने लगभग 80,000 एच-1बी वीजा के लिए आवेदन क...