अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
JNU and the Decline of Free Speech: A Legal and Administrative Analysis of India’s Premier University Crisis (2025)
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुक्त भाषण की गिरती साख: एक कानूनी और प्रशासनिक विश्लेषण परिचय: संवाद से डर तक की यात्रा भारत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) लंबे समय तक उस वैचारिक ऊर्जा का प्रतीक रहा है, जिसने राष्ट्र को सोचने, असहमत होने और परिवर्तन की दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दी। 1969 में स्थापित यह विश्वविद्यालय अपने पहले तीन दशकों में स्वतंत्र चिंतन, छात्र राजनीति और सामाजिक चेतना का केंद्र रहा। "विचारों का संघर्ष" यहां उतना ही स्वाभाविक था जितना कक्षा में पढ़ाई का क्रम। किंतु पिछले एक दशक में यह संस्थान धीरे-धीरे संवाद से डर की संस्कृति की ओर बढ़ता दिख रहा है। हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस की 2025 की जांच ने यह स्पष्ट किया कि जिस विश्वविद्यालय को कभी ‘मुक्त भाषण की प्रयोगशाला’ कहा जाता था, वह आज कानूनी मुकदमों, अनुशासनात्मक कार्रवाइयों और प्रशासनिक अविश्वास के जाल में उलझ चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से अब तक JNU दिल्ली उच्च न्यायालय में 600 से अधिक मामलों का पक्षकार रहा है। यह आंकड़ा सिर्फ प्रशासनिक असंतुलन का नहीं, बल्कि एक गहरे संस्थागत संकट का सं...