अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
कुआलालंपुर समझौता: अमेरिकी कूटनीति और 2025 थाई-कंबोडिया सीमा संकट का समाधान परिचय दक्षिण-पूर्व एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य सदियों से सीमाई अस्पष्टताओं और औपनिवेशिक विरासतों के कारण जटिल रहा है। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच प्रीह विहार मंदिर परिसर को लेकर चला आ रहा विवाद इसी विरासत का परिणाम है। 2025 में यह पुराना तनाव एक गंभीर सीमा संघर्ष में बदल गया, जिसने न केवल दोनों देशों को बल्कि समूचे आसियान (ASEAN) क्षेत्र को अस्थिर कर दिया। अंततः अक्टूबर 2025 में मलेशिया की राजधानी में हुए “कुआलालंपुर समझौते” ने इस संकट का शांतिपूर्ण समाधान प्रस्तुत किया। इस समझौते में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की निर्णायक भूमिका रही, जिन्होंने न केवल मध्यस्थता की बल्कि अपने पारंपरिक ‘आर्थिक दबाव कूटनीति’ का उपयोग कर दोनों पक्षों को युद्धविराम के लिए प्रेरित किया। संकट की पृष्ठभूमि: औपनिवेशिक मानचित्रों की अस्पष्टता थाई-कंबोडिया सीमा विवाद की जड़ें 1907 की फ्रांको-सियामी संधि तक जाती हैं, जब फ्रांसीसी उपनिवेश शासन के दौरान सीमाओं को निर्धारित तो किया गया, परंतु प्राचीन खमेर मंदिरों — विशेष रूप...