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यह कहानी एक आलसी कौवे और एक मेहनती गिलहरी की है, जो हमें सिखाती है कि मेहनत का फल मीठा होता है और कामचोरी का परिणाम हमेशा बुरा होता है। लेकिन यह कहानी आज के समय में एक नया और व्यंग्यात्मक मोड़ ले चुकी है। जहाँ पहले कहानियों से 'नैतिक शिक्षा' ग्रहण की जाती थी, वहीं आज का समाज एक अजीबोगरीब 'तार्किक युद्ध' में उलझ गया है। कहानी के अंत का विश्लेषण ही इस कहानी को प्रस्तुत करने का मुख्य उद्देश्य है : गिलहरी और कौवा: साझी खेती की कहानी 1. दोस्ती और खेती का फैसला एक समय की बात है, एक पेड़ पर एक कौवा और एक गिलहरी रहते थे। दोनों में गहरी दोस्ती थी। एक दिन गिलहरी ने कौवे से कहा, "दोस्त! क्यों न हम दोनों मिलकर खेती करें? अगर हम मेहनत करेंगे, तो हमारे पास साल भर के लिए पर्याप्त अनाज होगा और हमें भोजन की तलाश में दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा।" कौवा स्वभाव से बहुत आलसी और चतुर था, लेकिन उसने सोचा कि बैठे-बिठाए अनाज मिल जाएगा, तो बुरा क्या है? उसने तुरंत हाँ कर दी। 2. जुताई का समय कुछ दिनों बाद बारिश हुई और खेत जोतने का समय आ गया। गिलहरी सुबह-सुबह उठी और कौवे के पास जाकर बोल...