अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
जलवायु संकट की ऐतिहासिक जड़ें और मुआवजे की अनिवार्यता ब्राज़ील में नवंबर 2025 में होने वाला COP30 जलवायु शिखर सम्मेलन केवल एक वार्षिक सम्मेलन नहीं है; यह वैश्विक न्याय और जिम्मेदारी की परीक्षा है। सैकड़ों पर्यावरण और मानवाधिकार संगठनों ने इस शिखर सम्मेलन से पहले जो सामूहिक आह्वान किया है, वह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। उनका तर्क है कि जलवायु संकट महज़ वर्तमान नीतियों की विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें उपनिवेशवाद, गुलामी और संसाधन-शोषण जैसी ऐतिहासिक अन्याय की गहराइयों में छिपी हैं। ऐतिहासिक अपराधों और जलवायु संकट का अंतर्संबंध गुलामी और उपनिवेशवाद ने वैश्विक असमानताओं की नींव डाली। यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने दक्षिणी देशों के संसाधनों को लूटा, वनों को उजाड़ा, खनन व औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया और अपने आर्थिक व तकनीकी प्रभुत्व की इमारत खड़ी की। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन देशों ने सबसे कम उत्सर्जन किया, वे आज जलवायु आपदाओं के सबसे अधिक दंश झेल रहे हैं—बाढ़, सूखा और समुद्र स्तर में वृद्धि इसकी मिसाल हैं। इस ऐतिहासिक अन्याय का असर आज भी दो स्तरों पर दिखाई देता है—एक, पर्यावरणी...