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यहाँ India Justice Report 2025 के आधार पर एक विश्लेषणात्मक हिंदी लेख प्रस्तुत है, जिसे UPSC और समसामयिक अध्ययन के दृष्टिकोण से उपयोगी बनाया गया है: न्याय की खाई को पाटने की ज़रूरत प्रसंग : इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 देश की विधिक सहायता व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023–24 में केवल 15.5 लाख लोगों ने निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त की, जबकि देश की लगभग 80% आबादी इसके लिए पात्र थी। यह आंकड़ा महज़ प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि न्याय की संरचनात्मक पहुँच में मौजूद गहरी असमानता को उजागर करता है। संवैधानिक वचन और वास्तविकता के बीच अंतर भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39(क) स्पष्ट करता है कि न्याय किसी व्यक्ति को आर्थिक या अन्य अक्षमता के कारण वंचित नहीं कर सकता। लेकिन न्याय की यह संवैधानिक अवधारणा जमीनी हकीकत में दूर की कौड़ी प्रतीत होती है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और राज्य स्तरीय संस्थाएं (SLSA) इस उद्देश्य के लिए गठित की गई थीं, परंतु यह आंकड़े दर्शाते हैं कि न तो इन संस्थाओं की पहुँच व्यापक हुई है, न ही गुणवत्ता भरोसेमंद रही है।...