भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: एक नई शुरुआत या रणनीतिक समझौता?
परिचय
फरवरी 2026 की शुरुआत में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौते की घोषणा हुई, जिसने दोनों देशों के बीच पिछले कुछ महीनों से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर इसकी घोषणा की। उन्होंने बताया कि अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर लगने वाले टैरिफ को 50% (25% पारस्परिक + 25% रूसी तेल खरीद के कारण दंडात्मक) से घटाकर 18% कर रहा है। बदले में, भारत ने रूसी तेल की खरीद रोकने या काफी कम करने, अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने और कुछ व्यापारिक बाधाओं को हटाने पर सहमति जताई।
यह समझौता न केवल आर्थिक है, बल्कि भू-राजनीतिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत की ऊर्जा नीति, रूस के साथ संबंधों और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, दोनों पक्षों से जारी बयानों में कुछ असमानताएं हैं, जिससे विवरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं।समझौते की प्रमुख शर्तें
समझौता मुख्य रूप से टैरिफ में कमी और व्यापार असंतुलन को संबोधित करता है। अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर लगे उच्च टैरिफ को कम किया है:- पारस्परिक टैरिफ 25% से घटाकर 18%।
- रूसी तेल खरीद के कारण लगाया गया अतिरिक्त 25% दंडात्मक टैरिफ पूरी तरह हटा दिया गया।
इससे भारतीय निर्यातकों—विशेषकर वस्त्र, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य क्षेत्रों—को बड़ी राहत मिली है। भारतीय शेयर बाजार और रुपये में तत्काल सकारात्मक प्रभाव देखा गया।
भारत की प्रमुख प्रतिबद्धताएं:
- रूसी तेल खरीद में कमी या रोक: ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल की खरीद रोक देगा और इसके बजाय अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदेगा। हालांकि, भारतीय पक्ष ने इसे "स्केल बैक" या "सीमित" करने के रूप में वर्णित किया है—केवल अपूरणीय आपूर्ति के मामलों में रूसी तेल की खरीद जारी रहेगी। क्रेमलिन ने कहा कि उसे भारत से ऐसी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है।
- अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाना: ट्रंप ने $500 बिलियन से अधिक मूल्य के अमेरिकी उत्पादों (ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला आदि) की खरीद का उल्लेख किया, जो कई वर्षों में फैला होगा। भारतीय पक्ष ने इसकी पुष्टि नहीं की, लेकिन अधिक खरीद की बात स्वीकारी है।
- भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों के लिए पहुंच: भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य करने की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई। कृषि क्षेत्र में सीमित खुलावे की बात है, लेकिन वाण्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील क्षेत्र जैसे डेयरी, चीनी, चावल और अन्य राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्पाद पूरी तरह संरक्षित रहेंगे। अमेरिकी फलों, नट्स, वाइन आदि के लिए आंशिक पहुंच मिलेगी।
पृष्ठभूमि और तनाव के कारण
2025 में ट्रंप प्रशासन ने "Liberation Day" के तहत वैश्विक टैरिफ लगाए, जिसमें भारत पर रूसी तेल खरीद के कारण दंडात्मक टैरिफ थोपे गए। इससे भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ और दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध निचले स्तर पर पहुंच गए। भारत ने भी अमेरिकी उत्पादों पर उच्च टैरिफ बनाए रखे। यह समझौता इन तनावों को समाप्त करने का प्रयास है और इसे व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (संभावित FTA) की पहली कड़ी माना जा रहा है।आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव
भारत के लिए:
- सकारात्मक: टैरिफ में कमी से निर्यात बढ़ेगा, 'मेक इन इंडिया' को बल मिलेगा, और अर्थव्यवस्था में उत्साह आएगा। पीयूष गोयल ने इसे "क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ समझौता" बताया, जिसमें किसानों के हित सुरक्षित हैं।
- चुनौतियां: रूसी तेल (सस्ता और उपलब्ध) में कमी से ऊर्जा लागत बढ़ सकती है और विदेश नीति पर असर पड़ सकता है। रूस भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार है।
अमेरिका के लिए:
- ऊर्जा निर्यात, रक्षा सौदे और कृषि उत्पादों के बाजार विस्तार का अवसर। अमेरिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। ट्रंप ने इसे यूक्रेन युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम बताया।
निष्कर्ष
यह भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026 एक नई शुरुआत तो है ही, लेकिन इसमें रणनीतिक आयाम अधिक मजबूत हैं। टैरिफ युद्ध का अंत आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देगा, लेकिन रूसी तेल पर निर्भरता कम करने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय विदेश नीति की परीक्षा होगी। विवरण अभी अंतिम रूप से तय हो रहे हैं—संयुक्त बयान जल्द जारी होने की उम्मीद है। यदि सफलतापूर्वक लागू हुआ, तो यह दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली का प्रतीक बनेगा और वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति को मजबूत करेगा। भविष्य में पूर्ण मुक्त व्यापार समझौते की संभावनाएं बढ़ गई हैं, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए दीर्घकालिक लाभदायक सिद्ध हो सकती हैं।यह समझौता दिखाता है कि आर्थिक दबाव और रणनीतिक जरूरतें कैसे एक-दूसरे को आकार देती हैं—नई शुरुआत के साथ कुछ रणनीतिक समायोजन की कीमत पर।
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