Trump’s Claim on India Oil Deal: Energy Geopolitics, Russia Sanctions and India’s Strategic Autonomy
ट्रंप का भारत के साथ व्यापार समझौते का दावा: ऊर्जा भू-राजनीति, दबाव कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
(भारत सरकार की पुष्टि के पूर्व लिखा गया यह लेख)
प्रस्तावना
फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि भारत ने एक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल की खरीद बंद करने और इसके स्थान पर अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल आयात करने पर सहमति जताई है, केवल एक द्विपक्षीय बयान भर नहीं है। यह दावा वैश्विक ऊर्जा राजनीति, प्रतिबंध-आधारित कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े कई जटिल प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है। विशेष रूप से तब, जब इस कथित समझौते की न तो भारत के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने।
यह स्थिति एक बार फिर उस अंतर को उजागर करती है, जो अमेरिकी राजनीतिक वक्तव्यों और संस्थागत वास्तविकताओं के बीच अक्सर देखा जाता है। साथ ही, यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या ऊर्जा व्यापार अब विशुद्ध आर्थिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है।
एकतरफा दावा और कूटनीतिक चुप्पी
ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में यह कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हालिया फोन वार्ता के बाद यह समझौता हुआ है। लेकिन भारत की ओर से आई चुप्पी साधारण नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में मौन कई बार असहमति का संकेत होता है, विशेषकर तब जब दावा किसी देश की संप्रभु नीति—जैसे ऊर्जा आयात—से जुड़ा हो।
भारत का रुख ऐतिहासिक रूप से स्पष्ट रहा है: ऊर्जा आयात बाजार-आधारित निर्णय हैं, जिन्हें राष्ट्रीय हित, कीमत, आपूर्ति सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स तय करते हैं, न कि किसी तीसरे देश का राजनीतिक दबाव। अक्टूबर 2025 में ट्रंप द्वारा किए गए इसी तरह के दावे को भारत पहले ही सार्वजनिक रूप से खारिज कर चुका है। ऐसे में फरवरी 2026 का यह बयान उसी कड़ी का विस्तार प्रतीत होता है, न कि किसी निर्णायक नीति परिवर्तन का प्रमाण।
अमेरिकी दबाव की रणनीति: शुल्क, प्रतिबंध और ऊर्जा
ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर रूसी तेल आयात को हतोत्साहित करने के प्रयास 2025 से ही स्पष्ट दिखने लगे थे। अप्रैल 2025 में लगाए गए 25 प्रतिशत शुल्क, जिन्हें बाद में 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया, दरअसल रूस-विरोधी प्रतिबंध नीति का विस्तार थे। इसका मूल उद्देश्य भारत को निशाना बनाना नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा आय को सीमित करना था, जिससे यूक्रेन संघर्ष को वित्तपोषित करने की उसकी क्षमता कमजोर हो सके।
लेकिन इस रणनीति में एक अंतर्निहित विरोधाभास है। भारत जैसे देश, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बाहरी राजनीतिक एजेंडे के अधीन नहीं रख सकता। अमेरिका का यह मानना कि शुल्क और दबाव के माध्यम से भारत जैसे रणनीतिक साझेदार की ऊर्जा नीति बदली जा सकती है, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वास्तविकताओं से टकराता है।
वेनेजुएला कार्ड और अमेरिकी भू-राजनीति
ट्रंप के बयान में वेनेजुएला का उल्लेख विशेष ध्यान देने योग्य है। जनवरी 2026 में वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका ने वहां के तेल उद्योग पर प्रभावी नियंत्रण का दावा किया है। इसके बाद वेनेजुएलन तेल को रूसी तेल के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना अमेरिकी भू-राजनीतिक हितों से सीधे जुड़ा है।
यहां सवाल यह नहीं है कि भारत वेनेजुएलन तेल खरीद सकता है या नहीं—तकनीकी रूप से यह संभव है—बल्कि यह है कि क्या भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को एक ऐसे स्रोत पर निर्भर करेगा, जो स्वयं राजनीतिक अस्थिरता और अमेरिकी नीति परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील है। 2019 में ईरानी तेल आयात का अचानक बंद होना भारत के लिए एक महंगा सबक रहा है।
रूस से तेल: आर्थिक तर्क और रणनीतिक यथार्थ
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से मिलने वाला डिस्काउंटेड तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध हुआ। इससे न केवल भारत को घरेलू महंगाई नियंत्रित करने में मदद मिली, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी कम हुआ। यही कारण है कि रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा और रूसी निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भारत की ओर मुड़ गया।
हालिया महीनों में रूसी तेल आयात में कमी की खबरें जरूर आई हैं, लेकिन यह कमी किसी कथित समझौते का परिणाम है या वैश्विक कीमतों, शिपिंग लागत और भुगतान तंत्र में बदलाव का—यह स्पष्ट नहीं है। बाजार की गतिशीलता को राजनीतिक समझौते के रूप में प्रस्तुत करना एक अतिसरलीकरण होगा।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की कसौटी
भारत-अमेरिका संबंध पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं—चाहे वह रक्षा सहयोग हो, क्वाड हो या प्रौद्योगिकी साझेदारी। लेकिन इन संबंधों की नींव ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर टिकी है, न कि किसी गठबंधन अनुशासन पर।
ऊर्जा नीति इस स्वायत्तता का केंद्रीय स्तंभ है। यदि भारत किसी एक शक्ति के दबाव में अपने ऊर्जा स्रोतों का त्याग करता है, तो यह न केवल उसकी आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगा, बल्कि उसकी वैश्विक विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाएगा। भारत की ताकत इसी में है कि वह अमेरिका, रूस, मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभाव
यदि भारत वास्तव में रूसी तेल आयात में भारी कटौती करता है, तो इसके प्रभाव केवल द्विपक्षीय नहीं होंगे। रूस की अर्थव्यवस्था, जो ऊर्जा निर्यात पर अत्यधिक निर्भर है, को झटका लगेगा। दूसरी ओर, चीन जैसे देश रूसी तेल को अधिक मात्रा में खरीदकर इस स्थिति से लाभ उठा सकते हैं।
साथ ही, वेनेजुएलन तेल की वैश्विक आपूर्ति बढ़ने से ओपेक देशों के साथ प्रतिस्पर्धा तेज होगी। इससे तेल कीमतों में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऊर्जा बाजार अब केवल मांग-आपूर्ति का खेल नहीं रहा, बल्कि शक्ति संतुलन का प्रतिबिंब बन चुका है।
निष्कर्ष: दबाव और साझेदारी के बीच संतुलन
डोनाल्ड ट्रंप का दावा अमेरिकी विदेश नीति की उस शैली को दर्शाता है, जिसमें सार्वजनिक बयानबाजी को रणनीतिक दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन भारत के लिए ऊर्जा नीति न तो किसी चुनावी बयान का विषय है और न ही किसी एक देश के साथ सौदेबाजी का साधन।
वास्तविकता यह है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को विविधीकरण, दीर्घकालिक अनुबंधों और घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के माध्यम से मजबूत कर रहा है। अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन यह साझेदारी तभी टिकाऊ होगी जब वह परस्पर सम्मान और संप्रभु निर्णयों की स्वीकृति पर आधारित हो।
ट्रंप के दावे की सच्चाई समय के साथ स्पष्ट होगी, पर इतना तय है कि आज की वैश्विक राजनीति में ऊर्जा केवल ईंधन नहीं, बल्कि शक्ति है। और इस शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग ही भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा है।
With Reuters Inputs
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