India–US Trade Deal 2026: Strategic Shift, Tariff Cuts, Energy Realignment and Geopolitical Implications
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता 2026: रणनीतिक मोड़, आर्थिक अवसर और भू-राजनीतिक निहितार्थ
परिचय
वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल के इस दौर में, जहां व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं, भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में घोषित व्यापार समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए उच्च-स्तरीय संवाद के परिणामस्वरूप यह समझौता न केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। इस समझौते के केंद्र में भारतीय निर्यात पर लगे अमेरिकी टैरिफ में भारी कटौती और रूसी तेल आयात से जुड़ी शर्तें हैं, जो पिछले एक साल से चले आ रहे तनाव को समाप्त करती हैं।यह लेख समझौते की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके प्रमुख प्रावधानों, आर्थिक लाभों व जोखिमों, तथा भू-राजनीतिक प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह समझौता न केवल आर्थिक अवसरों का द्वार खोलता है, बल्कि भारत की बहुध्रुवीय कूटनीति को भी नई दिशा देता है।
पृष्ठभूमि: तनाव से समझौते की ओर
2025 की शुरुआत से ही भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में दरारें दिखाई देने लगी थीं। जून 2025 में अमेरिका ने 'रेसिप्रोकल टैरिफ' के नाम पर भारतीय निर्यात पर 25 प्रतिशत शुल्क लगा दिया, और अगस्त में रूस से सस्ते तेल आयात को आधार बनाकर अतिरिक्त 25 प्रतिशत 'पेनल्टी टैरिफ' जोड़ दिया गया। इससे भारतीय सामानों पर कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, भारत द्वारा रूसी तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने का परिणाम था।इस नीति से भारतीय निर्यात क्षेत्र, विशेष रूप से टेक्सटाइल, चमड़ा, रत्न-आभूषण और मैन्युफैक्चरिंग जैसे श्रम-गहन उद्योगों को गहरा झटका लगा। वहीं, वियतनाम, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को अमेरिकी बाजार में बढ़त मिली। भारत के सामने चुनौतियां थीं: निर्यात बाजारों का विविधीकरण, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और अमेरिका के साथ संबंधों को पटरी पर लाना।
2026 की शुरुआत में नए अमेरिकी राजदूत के पदभार ग्रहण और कूटनीतिक प्रयासों की तेजी ने अंततः समझौते का मार्ग प्रशस्त किया। यह समझौता 2 फरवरी 2026 को ट्रंप और मोदी के फोन कॉल के बाद घोषित हुआ, जो दोनों देशों के लिए एक सकारात्मक मोड़ साबित हुआ।समझौते के प्रमुख प्रावधान
यह समझौता प्रारंभिक चरण का है, लेकिन इसके प्रावधानों में स्पष्टता और व्यावहारिकता झलकती है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:- टैरिफ में कटौती: अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर कुल टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया, जिसमें पेनल्टी टैरिफ को पूरी तरह हटा लिया गया। यह कटौती तत्काल प्रभाव से लागू हुई, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है।
- रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध: भारत ने रूसी तेल आयात को बंद करने पर सहमति जताई है, और इसके बदले अमेरिका तथा अन्य स्रोतों (जैसे वेनेजुएला) से ऊर्जा आयात बढ़ाने का वादा किया है। हालांकि, भारतीय पक्ष ने इसे 'क्रमिक प्रक्रिया' बताया है, जो ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
- व्यापार लक्ष्य और प्रतिबद्धताएं: दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। भारत अमेरिकी ऊर्जा, कृषि उत्पादों, रक्षा उपकरणों और उन्नत तकनीक की खरीद बढ़ाएगा, जबकि अमेरिका ने भारतीय बाजार पहुंच में सुधार का आश्वासन दिया।
- अन्य सुधार: समझौते में कृषि उत्पादों पर कुछ छूट शामिल है, और व्यापक व्यापार समझौते के लिए आगे की वार्ताएं जारी रहेंगी। राजनीतिक स्तर पर, ट्रंप ने इसे अपनी उपलब्धि बताया, जबकि मोदी ने वैश्विक स्थिरता से जोड़ा।
आर्थिक प्रभाव: अवसरों की बहार और सतर्कता की जरूरत
समझौते का सबसे प्रत्यक्ष लाभ भारतीय निर्यात में वृद्धि है। टैरिफ कटौती से टेक्सटाइल, मैन्युफैक्चरिंग और अन्य क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में नई प्रतिस्पर्धा मिलेगी, जो पिछले साल के नुकसान की भरपाई कर सकता है। शेयर बाजारों में सकारात्मक प्रतिक्रिया और रुपए की मजबूती इसकी पुष्टि करती है। यह समझौता 'चाइना+1' रणनीति को प्रोत्साहित करेगा, जहां वैश्विक कंपनियां चीन से हटकर भारत में निवेश करेंगी। भारत को चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम से कम टैरिफ का लाभ मिलेगा, जो निर्यात-आधारित विकास को बढ़ावा देगा। साथ ही, यूरोपीय संघ और यूके के साथ हाल के समझौते भारत को वैश्विक व्यापार में मजबूत स्थिति प्रदान करेंगे। हालांकि, चुनौतियां भी हैं। रूसी तेल पर निर्भरता कम होने से ऊर्जा लागत बढ़ सकती है, जो मुद्रास्फीति और आयात बिल को प्रभावित करेगा। रिफाइनरियों को नए स्रोतों के अनुरूप समायोजन करना होगा, जो अल्पकालिक जोखिम पैदा कर सकता है। कुल मिलाकर, समझौता 'मेक इन इंडिया' को मजबूत करेगा, लेकिन सतर्क क्रियान्वयन आवश्यक है।भू-राजनीतिक निहितार्थ: संतुलित कूटनीति की परीक्षा
यह समझौता अमेरिका की भारत को चीन के प्रतिसंतुलन के रूप में देखने की रणनीति को मजबूत करता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में क्वाड जैसे मंचों के माध्यम से रणनीतिक सहयोग गहरा होगा। रूसी तेल से दूरी भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति की चुनौती है, लेकिन यह चरणबद्ध समायोजन दर्शाता है कि भारत अपनी स्वायत्तता बनाए रखेगा।ट्रंप की घरेलू राजनीति में यह समझौता एक उपलब्धि है, जबकि भारत ने पाकिस्तान संबंधी मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है। कुल मिलाकर, यह बहुध्रुवीय विश्व में भारत को एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करता है, जहां आर्थिक निकटता रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करती।
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