पश्चिमी गठबंधन में उभरती दरारें: बहुध्रुवीय विश्व की ओर संकेत
ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन, जो शीत युद्ध के बाद वैश्विक स्थिरता का प्रतीक रहा है, आज अपनी आंतरिक असंगतियों से जूझ रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेद न केवल रणनीतिक प्राथमिकताओं में फर्क दिखाते हैं, बल्कि एक नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभरने का स्पष्ट संकेत भी देते हैं। जहां अमेरिका अपनी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की चुनौती पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, वहीं यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की कोशिश में लगा है। ये दरारें महज नीतिगत असहमतियां नहीं हैं, बल्कि गहरे भू-राजनीतिक परिवर्तनों की अभिव्यक्ति हैं, जो पश्चिमी एकता के पारंपरिक मिथक को तोड़ रही हैं। 2025-2026 में ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) ने इन मतभेदों को और गहरा किया है, जिसमें यूरोप को "सभ्यता के विलोपन" का खतरा बताया गया है।
अमेरिकी एकतरफावाद इस संकट का मूल कारण है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में "अमेरिका फर्स्ट 2.0" नीति ने यूरोप पर दबाव बढ़ा दिया है। NATO में बोझ-बंटवारे की बहस तेज हो गई है, जहां अमेरिका मांग कर रहा है कि यूरोपीय देश अपने रक्षा खर्च को GDP के 5% तक बढ़ाएं।
यूक्रेन संकट ने इस असमानता को और उजागर किया; अमेरिका ने रूस के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया, लेकिन यूरोप को ऊर्जा संकट और आर्थिक दबाव झेलना पड़ा। 2025 की NSS में अमेरिका ने यूरोप से अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं को कम करने का संकेत दिया, साथ ही यूक्रेन को खुफिया जानकारी साझा करने में कटौती की।
फ्रांस के पूर्व राजदूत हांस-डिएटर लुकास जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप की सुरक्षा अब अमेरिकी विश्वसनीयता पर निर्भर नहीं रह सकती।
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने स्पष्ट कहा कि "पैक्स अमेरिकाना" का युग यूरोप के लिए समाप्त हो चुका है, और यूरोप को अपने हितों की रक्षा खुद करनी होगी।
चीन का उदय इन दरारों को और चौड़ा कर रहा है। अमेरिका की रणनीति अब पूरी तरह चीन-केंद्रित है, जिसमें QUAD और AUKUS जैसे गठबंधन उसके इंडो-पैसिफिक हितों की रक्षा करते हैं। लेकिन यूरोप की चुनौतियां अलग हैं; यहां रूस मुख्य खतरा माना जाता है, जबकि चीन के साथ व्यापार, जलवायु और तकनीकी सहयोग को महत्व दिया जाता है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देश चीन के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहते हैं, जो अमेरिकी "डी-रिस्किंग" और प्रतिबंधों से टकराते हैं।
EU की विदेश नीति प्रमुख कैला ने चेतावनी दी कि ट्रंप के टैरिफ चीन और रूस को फायदा पहुंचा रहे हैं, क्योंकि वे सहयोगियों के बीच विभाजन का लाभ उठाते हैं।
चीन यूरोप को बहुध्रुवीय दुनिया में एक महत्वपूर्ण ध्रुव मानता है, और ट्रांस-अटलांटिक दरारों का फायदा उठाकर EU के साथ करीबी संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है, हालांकि यूरोपीय अविश्वास एक चुनौती है।
संस्थागत स्तर पर यह संकट और अधिक स्पष्ट है। NATO, जो सामूहिक रक्षा का प्रतीक था, अब असहमतियों का मैदान बन गया है। पूर्वी यूरोपीय देश जैसे पोलैंड अमेरिका के करीब हैं, जबकि फ्रांस और जर्मनी रणनीतिक स्वायत्तता की वकालत करते हैं। EU के अंदर भी विभाजन गहरा रहा है; ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन की अलग राह ने एकीकरण को कमजोर किया, और अब यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा नीति से सैन्य सहयोग तक मतभेद बढ़ा दिए हैं। हालांकि, फिनलैंड और स्वीडन के शामिल होने से NATO ने कुछ मजबूती दिखाई, लेकिन मूल समस्या बनी हुई है: गठबंधन अब एकजुट नहीं है।
2025 की NSS ने NATO को "यूरोपीयकरण" की ओर धकेला, जहां यूरोप को अपनी रक्षा का अधिक बोझ उठाना होगा, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम हो।
ये दरारें एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा हैं—एक ऐसी विश्व व्यवस्था जहां पश्चिम अब निर्विवाद केंद्र नहीं रहा। शक्ति का संतुलन बहुध्रुवीयता की ओर झुक रहा है, जहां चीन और रूस अपनी भूमिकाएं मजबूत कर रहे हैं। वैश्विक दक्षिण के देश—जैसे भारत, ब्राजील, नाइजीरिया, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की—अब पश्चिमी दबाव से मुक्त होकर अपनी शर्तों पर साझेदारियां बना रहे हैं।
BRICS का विस्तार और G20 में बढ़ती भूमिका इस बदलाव की मिसाल है। तीन ब्लॉक—पश्चिम, पूर्व और दक्षिण—अब भू-राजनीति को चला रहे हैं, और मध्यम शक्तियां परिणाम तय करती हैं।
अमेरिकी hegemony का अंत हो रहा है, और बहुध्रुवीय युग आ रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति अवसरों और चुनौतियों से भरी है। पश्चिमी मतभेदों के बीच भारत को रणनीतिक स्थान मिल रहा है। अमेरिका के साथ इंडो-पैसिफिक में सहयोग—QUAD के माध्यम से—भारत की सुरक्षा को मजबूत करता है, जबकि EU के साथ स्वतंत्र व्यापार समझौते आर्थिक लाभ दे सकते हैं। लेकिन भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" की परंपरा को बनाए रखना जरूरी है, जो गैर-संरेखण से निकली है। किसी एक ध्रुव पर अत्यधिक निर्भरता से बचकर, भारत को लचीली साझेदारियां बनानी होंगी, जो उसके राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दें। वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका इसे बहुध्रुवीय दुनिया में एक प्रमुख खिलाड़ी बना सकती है।हालांकि, इस विश्लेषण की कुछ सीमाएं हैं। पश्चिमी गठबंधन की एकता को पूरी तरह नकारना अतिशयोक्ति हो सकती है; तकनीकी नवाचार, जलवायु कार्रवाई और मूल्य-आधारित कूटनीति में सहयोग अभी भी संभव है।
NATO का अनुकूलन इतिहास में देखा गया है, जहां संकट गठबंधनों को मजबूत कर सकते हैं। फिर भी, यथार्थवादी दृष्टिकोण जरूरी है, जो भू-राजनीति को शक्ति, हितों और असमानताओं के संदर्भ में देखे।अंत में, पश्चिमी गठबंधन टूट नहीं रहा, बल्कि रूपांतरित हो रहा है। यह बदलाव 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का संकेत है: जहां कठोर गठबंधन कम होंगे, और हित-आधारित लचीली साझेदारियां प्रमुख होंगी।
भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर है—एक ऐसी दुनिया में जहां कोई एक केंद्र नहीं, बल्कि बहुविध संतुलन होंगे।
IR विशेषज्ञ रहीस सिंह के लेख से प्रेरित
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