India Energy Week 2026 Goa: Trump’s Absence, Energy Diplomacy and the Rise of a New Multipolar World Order
ट्रंप के बाद की दुनिया: गोवा में उभरी बहुध्रुवीय ऊर्जा राजनीति
भारत एनर्जी वीक (IEW) 2026, जो गोवा के ONGC एडवांस्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में 27 से 30 जनवरी तक आयोजित हुआ, मात्र एक ऊर्जा सम्मेलन नहीं रहा। यह वैश्विक व्यवस्था में गहन बदलाव का जीवंत साक्ष्य बन गया, जहां अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय ढांचे की जगह बहुध्रुवीय वास्तविकता ने मजबूती से पकड़ बनानी शुरू कर दी। इस मंच पर ऊर्जा केवल ईंधन या बिजली का स्रोत नहीं रही, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रमुख माध्यम बनी।
सम्मेलन की शुरुआत से ही चर्चाएं ऊर्जा संक्रमण से आगे बढ़कर वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन पर केंद्रित हो गईं। कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की दुनिया में जो हो रहा है, वह "कोई धीमा आर्थिक संक्रमण नहीं, बल्कि एक बड़ा विद्रूप (rupture)" है। यह टिप्पणी डावोस में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उस बयान की गूंज थी, जिसमें उन्होंने postwar अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की "मृत्यु" की घोषणा की थी। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की "अमेरिका फर्स्ट" नीतियां—टैरिफ को रणनीतिक हथियार बनाना, सहयोगियों पर दबाव, यहां तक कि कनाडा पर annexation जैसी धमकियां और यूरोप के साथ ग्रीनलैंड विवाद—ने पारंपरिक गठबंधनों में दरार डाल दी। भारत पर भी रूसी तेल आयात के मुद्दे पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए, जिससे नई दिल्ली को अपनी ऊर्जा आपूर्ति विविधीकरण की दिशा में तेजी से कदम उठाने पड़े।
इस बदलते परिदृश्य का सबसे प्रतीकात्मक पहलू अमेरिकी अधिकारियों की उद्घाटन सत्र में उल्लेखनीय अनुपस्थिति (या न्यूनतम उपस्थिति) थी। इसके विपरीत, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अन्य देशों को प्रमुख मंच मिला। सम्मेलन में 75,000 से अधिक प्रतिनिधियों, 700 से ज्यादा प्रदर्शकों और 120 से अधिक देशों की भागीदारी ने इसे अब तक का सबसे बड़ा संस्करण बना दिया। "अस्थिरता", "व्यत्यय" और "अनुकूलन" जैसे शब्द हर सत्र में गूंजते रहे। नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड और यहां तक कि पैराग्वे जैसे देश भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को अवसर के रूप में देखते हुए साझेदारी की पेशकश कर रहे थे।
भारत की स्थिति इस संदर्भ में विशेष महत्वपूर्ण है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता बन चुका भारत अभी भी कोयले पर लगभग 40% निर्भर है, जबकि क्रूड ऑयल से करीब 25% ऊर्जा जरूरत पूरी होती है—जिसका बड़ा हिस्सा आयातित है। कुल बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 500 गीगावाट है, जो चीन के 3.2 टेरावाट से काफी पीछे है। तेल मांग 5.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर जल्द ही 6 मिलियन से ऊपर पहुंचने वाली है। रूसी रियायती क्रूड ने पिछले वर्षों में राहत दी, लेकिन ट्रंप प्रशासन के दबाव और टैरिफ से आयात में कमी आई। फिर भी, भारत का बाजार इतना आकर्षक है कि मध्य पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देश गोवा में सक्रिय दिखे।
कनाडा ने खुद को "विश्वसनीय साझेदार" के रूप में पेश किया, खासकर ग्रीन एनर्जी, क्रिटिकल मिनरल्स और LNG में। हॉजसन का कथन—"हम ऐसी दुनिया में नहीं जीएंगे जहां ताकत ही सही है"—अमेरिकी एकतरफा नीतियों पर स्पष्ट कटाक्ष था। UAE के मंत्री सुल्तान अहमद अल जबेर ने कहा कि "नई दिल्ली अब हमारी प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा ग्राहक है"। नॉर्वे और अन्य यूरोपीय देशों ने भी भारतीय योजनाओं में भागीदारी की इच्छा जताई। इन सबके बीच भारत-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसी पहलें बहुपक्षीयता की मजबूती का प्रमाण हैं।
अटलांटिक काउंसिल जैसे विश्लेषकों ने गोवा सम्मेलन को अमेरिका के प्रति वैश्विक असंतोष की सामूहिक अभिव्यक्ति करार दिया। ऊर्जा अब केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था का आधार स्तंभ बन चुकी है। रूस पर निर्भरता में सावधानीपूर्ण कमी, नए साझेदारों की तलाश और बहुपक्षीय ढांचे गढ़ना—ये सभी संकेत एक ऐसी दिशा की ओर इशारा करते हैं जहां कोई एक शक्ति पर निर्भरता नहीं रहेगी।
IEW 2026 से निकला संदेश स्पष्ट है: ट्रंप-केंद्रित दुनिया अब अतीत की बात है। अस्थिरता के इस दौर में भारत न किसी गुट का अनुयायी है, न टकराव का केंद्र—बल्कि वह संतुलन, विकल्प और साझेदारी की राजनीति का प्रतिनिधि बनकर उभर रहा है। गोवा के समुद्री तटों पर हुई ये चर्चा भविष्य की उस वैश्विक व्यवस्था की झलक है, जहां दीवारें नहीं, दरवाजे बनाए जाएंगे। और उन दरवाजों से गुजरने में भारत की भूमिका निर्णायक सिद्ध होगी।With Washington Post Inputs
Comments
Post a Comment