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मासिक धर्म स्वच्छता: गरिमा से जुड़े अधिकार की संवैधानिक स्वीकृति भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 समय के साथ केवल जीवित रहने के अधिकार से आगे बढ़कर सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का संवैधानिक आधार बन चुका है। 30 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह ऐतिहासिक निर्णय—जिसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया गया—इसी संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह फैसला न केवल कानून की भाषा में परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर पर भी एक निर्णायक हस्तक्षेप है। जीवन का अधिकार: जैविक यथार्थ से गरिमा तक न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म कोई निजी या गौण विषय नहीं, बल्कि गरिमा, निजता, स्वास्थ्य, समानता और शिक्षा से जुड़ा एक मूल मानव अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 21 तब अधूरा रह जाता है, जब राज्य किसी बालिका को उसके जैविक यथार्थ के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सहभागिता से वंचित रहने देता है। अदालत की यह टिप्पणी कि “मासिक धर्म प्रबंधन की सुविधाओं से वंचित होना किश...