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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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अमेरिकी जन्मजात नागरिकता विवाद

 

संवैधानिक मूल्यों बनाम कार्यकारी आदेश - जन्मजात नागरिकता पर नया विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जन्मजात नागरिकता (Birthright Citizenship) और 'बर्थ टूरिज्म' (Birth Tourism) को सीमित करने के उद्देश्य से दो नए कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर करना अमेरिकी संविधान और कार्यपालिका के बीच जारी एक गहरे संवैधानिक और कानूनी संघर्ष का प्रतीक है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके पिछले व्यापक आदेश को असंवैधानिक करार दिए जाने के बावजूद, ट्रम्प प्रशासन द्वारा उठाया गया यह नया कदम राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोन से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

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संविधान की आत्मा और चौदहवां संशोधन

अमेरिकी संविधान का चौदहवां संशोधन (14th Amendment), जो 1868 में गृहयुद्ध के बाद लागू किया गया था, स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि अमरीका में पैदा हुआ या प्राकृतिक रूप से नागरिक बना हर व्यक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका का नागरिक है। ऐतिहासिक रूप से इसका मुख्य उद्देश्य दास प्रथा के उन्मूलन के बाद पूर्व दासों और उनके बच्चों को नागरिकता का पूर्ण अधिकार प्रदान करना था। बीते डेढ़ सौ से अधिक वर्षों से यह सिद्धांत अमेरिकी लोकतंत्र और आव्रजन (Immigration) नीति की रीढ़ रहा है।

हालाँकि, ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग व्यावसायिक 'बर्थ टूरिज्म' (जहाँ लोग केवल बच्चे को नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से यात्रा करते हैं) और विदेशी हितों द्वारा किया जा रहा है। इसी आधार पर नए आदेशों में कुछ विशिष्ट श्रेणियों—जैसे व्यावसायिक बर्थ टूरिज्म, विदेशी एजेंटों/लॉबिस्टों, और आतंकी समूहों से जुड़े व्यक्तियों के बच्चों—को जन्मजात नागरिकता से वंचित करने और उनकी सीमा प्रवेश पर सख्ती की बात कही गई है।

संवैधानिक मर्यादा और न्यायालय की भूमिका

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अपने फैसले (Trump v. Barbara) में यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपति किसी कार्यकारी आदेश के माध्यम से संविधान के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकते। अदालत का यह रुख शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को रेखांकित करता है—जिसमें संविधान में संशोधन का अधिकार संसद (कांग्रेस) और राज्यों के पास है, न कि केवल राष्ट्रपति के कार्यकारी कलम में।

ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि इस बार के आदेश "संकीर्ण और लक्षित" (narrower) हैं, इसलिए वे अदालती समीक्षा में टिक सकते हैं। परंतु नागरिक अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि दायरा चाहे जितना भी छोटा किया जाए, यदि वह संविधान की मूल भावना को खारिज करता है, तो उसे अंततः अदालत द्वारा अमान्य ही घोषित किया जाएगा।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

यह कदम केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। अमेरिका में चुनावी राजनीति के लिहाज से आव्रजन हमेशा से एक ध्रुवीकरण करने वाला मुद्दा रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा बार-बार इस मुद्दे को उठाना उनके समर्थकों को एकजुट करने और अपनी "अमेरिका फर्स्ट" नीति को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

दूसरी ओर, इस तरह के बार-बार बदलते नियमों से आव्रजक समुदायों और अस्थायी रूप से रह रहे विदेशियों के बीच भारी अनिश्चितता का माहौल पैदा होता है। बर्थ टूरिज्म या अवैध आव्रजन की समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यापक, स्पष्ट और पारदर्शी आव्रजन सुधार (Immigration Reform) की आवश्यकता है, जिसे संसद में सर्वसम्मति और विधायी प्रक्रिया से लागू किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

लोकतंत्र में संविधान और न्यायपालिका की सर्वोच्चता सर्वोपरि होती है। यदि कार्यपालिका सर्वोच्च अदालत के फैसलों के बाद भी ऐसे रास्ते तलाशती है जो संविधान के सीधे टकराव में आते हों, तो इससे संस्थागत संघर्ष बढ़ता है। यह नया कार्यकारी आदेश एक बार फिर अमेरिकी अदालतों की देहलीज़ पर पहुंचेगा। देखना यह होगा कि क्या अमरीकी न्यायपालिका अपने ऐतिहासिक रुख पर कायम रहती है या कार्यपालिका की इस नई संवैधानिक चुनौती को स्वीकार करती है। लेकिन एक बात साफ है—नागरिकता जैसे मौलिक विषय का समाधान संवैधानिक प्रक्रियाओं और संसदीय सहमति के माध्यम से ही संभव है, न कि बार-बार जारी होने वाले कार्यकारी आदेशों से।

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