भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र: उपलब्धियों के उत्साह से चुनौतियों के यथार्थ तक, फिर भी निर्यात-आधारित भविष्य की ठोस बुनियाद
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की कहानी लंबे समय तक “कम लागत–उच्च प्रभाव” के मॉडल की मिसाल रही है। सीमित संसाधनों में असाधारण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ—चंद्रयान-1 से लेकर मंगलयान तक—ने भारत को केवल एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय अंतरिक्ष भागीदार के रूप में स्थापित किया। इस क्रम में 2019 का चंद्रयान-2 ऑर्बिटर और 2023 का चंद्रयान-3, जिसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रचा, भारत की तकनीकी परिपक्वता और रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बने। यह केवल विज्ञान की जीत नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षाओं की भी उड़ान थी।
लेकिन अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रगति रैखिक नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश करता दिख रहा है, जहाँ उत्साह और आत्मविश्वास के साथ-साथ चुनौतियाँ और आत्ममंथन भी समान रूप से उपस्थित हैं।
‘वर्कहॉर्स’ की थकान और विश्वसनीयता का प्रश्न
इस संक्रमण का सबसे स्पष्ट संकेत इसरो के सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान—पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV)—में आई हालिया विफलताओं से मिलता है। दशकों तक PSLV को भारत की अंतरिक्ष सफलता की रीढ़ माना गया, जिसने न केवल स्वदेशी उपग्रहों को बल्कि दर्जनों देशों के विदेशी उपग्रहों को भी सटीकता से कक्षा में स्थापित किया।
मगर मई 2025 में PSLV-C61 मिशन और फिर जनवरी 2026 में PSLV-C62 की विफलता ने यह संकेत दिया कि तकनीकी परिपक्वता के बावजूद प्रणालीगत दबाव, उत्पादन प्रक्रियाओं में बदलाव और बढ़ती लॉन्च आवृत्ति नई कमजोरियों को जन्म दे सकती है।
ये घटनाएँ केवल तकनीकी असफलताएँ नहीं हैं; वे भारत की ऑपरेशनल विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं—विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में प्रतिस्पर्धा तीव्र होती जा रही है और निजी कंपनियाँ तेज़, सस्ते और बार-बार लॉन्च की क्षमता विकसित कर रही हैं।
निजी क्षेत्र का उदय: संभावनाएँ और सीमाएँ
2020 के बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए नीतिगत सुधार—निजी भागीदारी को प्रोत्साहन, IN-SPACe का गठन और NSIL के माध्यम से व्यावसायीकरण—भारत के न्यू स्पेस युग की नींव बने। स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉस्मोस जैसे स्टार्टअप्स ने स्वदेशी रॉकेट इंजनों का परीक्षण और सब-ऑर्बिटल उड़ानें कर यह दिखाया कि भारत में नवाचार की क्षमता केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है।
फिर भी, इन प्रयासों के सामने वास्तविक चुनौतियाँ भी हैं—आयात-निर्भर आपूर्ति श्रृंखला, कुशल मानव संसाधन की कमी, दीर्घकालिक वित्तपोषण का अभाव और नियामक प्रक्रियाओं की जटिलता। पूर्ण कक्षीय लॉन्च में हो रही देरी यह याद दिलाती है कि अंतरिक्ष उद्योग में सफलता के लिए धैर्य, निरंतर निवेश और संस्थागत समर्थन अनिवार्य है।
आर्थिक सर्वेक्षण का आशावाद: ‘संघर्ष’ नहीं, ‘समेकन’
इसी पृष्ठभूमि में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। सर्वेक्षण हालिया विफलताओं को गिरावट के संकेत के बजाय निर्यात-समेकन के चरण के रूप में देखता है। 2015 से 2024 के बीच 34 देशों के लगभग 400 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण यह दर्शाता है कि भारत की लॉन्च सेवाओं की वैश्विक मांग बनी हुई है—विशेषकर छोटे उपग्रहों और लो-अर्थ ऑर्बिट मिशनों में।
NSIL की बढ़ती आय और वाणिज्यिक लॉन्च की संख्या इस बात की पुष्टि करती है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल वैज्ञानिक गौरव तक सीमित नहीं, बल्कि एक आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में विकसित हो रहा है। IN-SPACe का यह अनुमान कि 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 44 अरब डॉलर तक पहुँच सकती है, इसी विश्वास को मजबूती देता है।
आगे की राह: आत्ममंथन से आत्मनिर्भरता तक
भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वह निर्णायक है। एक ओर ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हैं, जो आत्मविश्वास देती हैं; दूसरी ओर हालिया तकनीकी झटके हैं, जो सुधार और पुनर्संरचना की माँग करते हैं।
आवश्यक है कि नीति-निर्माण में तीन बातों पर समान रूप से ध्यान दिया जाए—पहला, इसरो की कोर तकनीकी क्षमताओं और गुणवत्ता नियंत्रण को और सुदृढ़ करना; दूसरा, निजी क्षेत्र को केवल पूरक नहीं बल्कि सहभागी के रूप में विकसित करना; और तीसरा, निर्यात-उन्मुख रणनीति के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को गहराई देना।
निष्कर्षतः, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम न तो संकट में है और न ही पूर्ण उत्कर्ष पर—वह एक संक्रमण में है। यदि यह दौर ईमानदार आत्ममंथन, संस्थागत सुधार और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ संभाला गया, तो हालिया चुनौतियाँ भविष्य की सफलता की भूमिका बन सकती हैं। अंतरिक्ष में भारत की अगली छलांग अब केवल रॉकेट की ऊँचाई से नहीं, बल्कि नीति, नवाचार और विश्वास की मजबूती से तय होगी।
With The Hindu Inputs
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