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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs in Hindi : 16 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख संकलन : 16 अप्रैल 2025

यह रहा लेख का विश्लेषणात्मक और UPSC GS-3 (आंतरिक सुरक्षा)निबंध लेखन के अनुकूल विस्तृत संस्करण:


शीर्षक-1: 26/11 मुंबई हमला: एक राज्य प्रायोजित आतंकवाद और रणनीतिक भ्रम की साजिश

(UPSC GS-3: आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ और आतंकवाद)

भूमिका:

26/11 का मुंबई आतंकी हमला भारत के इतिहास में एक ऐसा त्रासद क्षण था जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद के स्वरूप और अंतरराष्ट्रीय रणनीति पर गहरे प्रश्न खड़े किए। यह हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, राज्य-प्रायोजित साजिश थी, जिसे वैश्विक स्तर पर भ्रम फैलाने और भारत को अस्थिर करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया।

पाकिस्तान की रणनीति: भ्रम की पृष्ठभूमि

इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक अशोक प्रसाद के अनुसार, पाकिस्तान ने इस हमले को "घरेलू असंतोष" का रूप देने की कोशिश की थी। इसके लिए पहले से ही देश के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मुजाहिदीन (IM) द्वारा सिलसिलेवार बम धमाके कराए गए। यह संगठन, यद्यपि "स्वदेशी" बताया गया, असल में कराची से नियंत्रित होता था और इसका संबंध लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से था।

राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का स्वरूप:

  • पाकिस्तान ने न केवल आतंकवादियों को प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरों में धोखा देने हेतु योजनाबद्ध रूप से इसे 'भारतीय मुसलमानों की प्रतिक्रिया' दर्शाने की कोशिश की।
  • इसके माध्यम से उसकी दोहरी रणनीति थी — एक ओर भारत में धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देना और दूसरी ओर आतंकवाद में अपनी भूमिका को छिपाना।

भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया:

  • भारत की एजेंसियों द्वारा अजमल कसाब को जीवित पकड़ना एक निर्णायक मोड़ था, जिसने पाकिस्तान की झूठी कहानी को नष्ट कर दिया।
  • कसाब के कबूलनामे और तकनीकी सबूतों ने पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब किया और उसे वैश्विक स्तर पर शर्मिंदा होना पड़ा।

आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव:

  • इस हमले ने भारत की तटीय सुरक्षा, खुफिया समन्वय और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र की खामियों को उजागर किया।
  • इसके बाद NIA (National Investigation Agency) की स्थापना, NSG हब्स का विकेंद्रीकरण, और मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) के माध्यम से इंटेलिजेंस साझा करने की प्रणाली को मजबूती दी गई।

वैश्विक सन्दर्भ में संदेश:

26/11 जैसे हमले यह बताते हैं कि आतंकवाद केवल सीमाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि एक वैश्विक संकट है। जब तक कुछ राष्ट्र आतंकवाद को रणनीतिक उपकरण की तरह प्रयोग करते रहेंगे, तब तक विश्व में शांति संभव नहीं।

निष्कर्ष:

मुंबई हमला न केवल भारत की पीड़ा है, बल्कि यह एक उदाहरण है कि किस प्रकार राज्य प्रायोजित आतंकवाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर हमला कर सकता है। भारत ने जिस तरह इस हमले के बाद अपने सुरक्षा ढांचे को सशक्त किया, वह अन्य राष्ट्रों के लिए भी प्रेरणा है। वैश्विक समुदाय को अब यह समझने की ज़रूरत है कि आतंकवाद के खिलाफ केवल शब्द नहीं, ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है — विशेषकर उन राष्ट्रों के विरुद्ध जो उसे आश्रय देते हैं।


नीचे 26/11 मुंबई आतंकी हमले और उससे संबंधित संभावित UPSC GS-3 और निबंध लेखन के दृष्टिकोण से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न:


GS-3 (आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद और खुफिया प्रणाली से संबंधित प्रश्न):

  1. "26/11 मुंबई हमला भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।" इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा करें।
  2. राज्य प्रायोजित आतंकवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए, 26/11 हमले के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका का विश्लेषण करें।
  3. भारतीय मुजाहिदीन (IM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे संगठनों की गतिविधियों के माध्यम से भारत में आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर चर्चा करें।
  4. 26/11 के बाद भारत ने आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु किन प्रमुख संस्थागत सुधारों को अपनाया?
  5. "आतंकवाद से निपटने में खुफिया समन्वय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।" उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
  6. भारत की तटीय सुरक्षा व्यवस्था में 26/11 के बाद हुए सुधारों पर प्रकाश डालिए।
  7. राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की भूमिका और प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें।

निबंध लेखन के संभावित शीर्षक:

  1. "26/11: एक आतंकवादी हमला या एक रणनीतिक युद्ध?"
  2. "राज्य प्रायोजित आतंकवाद और वैश्विक सुरक्षा की चुनौतियाँ"
  3. "आतंकवाद के विरुद्ध भारत की नीति: अनुभव, सुधार और भविष्य की दिशा"
  4. "जब सुरक्षा चूक बन गई राष्ट्रीय आपदा: 26/11 की सीख"
  5. "आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय राजनीति: दोषारोपण से समाधान तक"

2-हिंदूफोबिया के खिलाफ कानून: क्या भारत को भी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए?

 भूमिका:

आज के समय में जब धार्मिक सहिष्णुता और विविधता को वैश्विक समाज की शक्ति माना जाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ देशों और समुदायों में धार्मिक घृणा और भेदभाव की घटनाएँ चिंता का विषय बनती जा रही हैं। ऐसे ही एक गंभीर लेकिन कम चर्चित विषय – ‘हिंदूफोबिया’ – के खिलाफ अमेरिका के जॉर्जिया राज्य द्वारा लाया गया बिल न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि यह एक नई सोच और चेतना का संकेत भी देता है। यह कदम अब वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या भारत जैसे बहुधार्मिक और लोकतांत्रिक राष्ट्र को भी इस दिशा में कोई पहल करनी चाहिए?

 जॉर्जिया का ऐतिहासिक कदम: पहला 'हिंदूफोबिया' बिल 

मार्च 2024 में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य ने ‘हिंदूफोबिया’ के खिलाफ एक विशेष बिल पेश कर दुनिया का पहला ऐसा क्षेत्र बनने का गौरव प्राप्त किया, जिसने हिंदू-विरोधी भेदभाव को कानूनी रूप से मान्यता दी। इस कानून के तहत अब हिंदू धर्म या समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने, हिंसा करने, या सामाजिक बहिष्कार जैसे कृत्यों को राज्य की घृणा अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों में कार्रवाई का स्पष्ट आधार मिलेगा।

इस बिल को अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों – रिपब्लिकन और डेमोक्रेट – का समर्थन मिला, जो यह दर्शाता है कि यह कानून किसी एक समुदाय का पक्ष नहीं लेता, बल्कि एक सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों की रक्षा का प्रयास है।

 क्या अन्य देशों में है ऐसा कोई कानून?

दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले देशों में भी धार्मिक घृणा के खिलाफ कानून मौजूद हैं, लेकिन ‘हिंदूफोबिया’ को विशेष रूप से परिभाषित करने वाला कानून अब तक नहीं था।

कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में धार्मिक घृणा के विरुद्ध कानून तो हैं, लेकिन हिंदू धर्म के खिलाफ घृणा या हमलों को अब तक विशेष पहचान नहीं मिली थी।

कनाडा में हिंदू मंदिरों पर हमलों और मूर्ति तोड़े जाने की घटनाएँ सामने आईं, परंतु उन्हें ‘हिंदूफोबिया’ के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य हेट क्राइम के रूप में देखा गया।

भारतवंशी प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव के चलते अब इन देशों में हिंदूफोबिया की पहचान और दंडात्मक कार्रवाई की माँग भी उठने लगी है।

 भारत में ऐसी किसी कानून की जरूरत क्यों है?

भारत में संविधान द्वारा हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है, लेकिन फिर भी हिंदू धर्म को लेकर फैलाई जा रही विकृत जानकारियाँ, हिंदू प्रतीकों और परंपराओं का उपहास, और राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी समय-समय पर सामने आती रही है।

 1. धार्मिक बहुलता में संतुलन ज़रूरी:

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सभी धर्मों को बराबरी का सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। अगर इस्लामोफोबिया और एंटी-सेमिटिज्म पर कानून बन सकते हैं, तो हिंदूफोबिया को नजरअंदाज करना न्यायोचित नहीं है।

 2. मीडिया और सोशल मीडिया में हिंदू-विरोधी कंटेंट:

कुछ फिल्में, वेबसीरीज, सोशल मीडिया पोस्ट्स और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में हिंदू धर्म और संस्कृति को एकतरफा नकारात्मक रूप में पेश किया जाता है, जो समाज में विभाजन को जन्म देता है।

 3. प्रवासी हिंदू समुदाय की सुरक्षा:

भारत से बाहर बसे करोड़ों हिंदू आज सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत यदि 'हिंदूफोबिया' के खिलाफ कोई क़ानून लाता है तो यह वैश्विक स्तर पर एक संदेश होगा कि हिंदू धर्म के अनुयायी भी कानूनी सुरक्षा के हक़दार हैं।

 *क्या भारत में ऐसा कानून बन सकता है?* 

तकनीकी रूप से, हाँ।

भारत का संविधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26, धार्मिक समानता और स्वतंत्रता की बात करता है। भारतीय दंड संहिता में भी कई धाराएँ हैं जो धार्मिक घृणा, भावना आहत करने या सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी हैं (जैसे IPC धारा 153A, 295A)। लेकिन अब आवश्यकता है एक विशेष और स्पष्ट कानून की, जो 'हिंदूफोबिया' जैसे कृत्यों को नामित करे और प्रभावी ढंग से दंडनीय बनाए।

हालांकि, यह प्रयास धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक संतुलन के साथ किया जाना चाहिए, ताकि यह किसी एक धर्म के पक्ष में पक्षपात न लगे। इसे ‘धार्मिक घृणा निरोधक कानून’ की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसमें हिंदूफोबिया के साथ-साथ इस्लामोफोबिया, क्रिश्चियनफोबिया आदि को भी शामिल किया जाए।

 निष्कर्ष: 

हिंदूफोबिया’ के खिलाफ अमेरिका के जॉर्जिया राज्य का कदम एक वैचारिक और कानूनी क्रांति का प्रारंभ हो सकता है। यह न केवल हिंदू समुदाय को पहचान और सुरक्षा देता है, बल्कि यह अन्य देशों को भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वे धार्मिक विविधता के साथ न्याय कर पा रहे हैं।

भारत, जो कि हिंदू धर्म की जन्मभूमि है, उसे न केवल अपने नागरिकों बल्कि वैश्विक हिंदू समुदाय की भावनाओं और सुरक्षा के लिए भी एक सक्रिय और संरक्षक भूमिका निभानी चाहिए। समय आ गया है कि भारत एक उदाहरण बने – कानून के माध्यम से हर धर्म के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी देने वाला एक सशक्त राष्ट्र।


3-वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत के बिजली उपकरण उद्योग के लिए एक रणनीतिक अवसर

हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया है कि चीन पर अमेरिकी टैरिफ और वहाँ बढ़ती उत्पादन लागत के चलते भारत के लिए बिजली उपकरण उद्योग के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने का एक उल्लेखनीय अवसर उत्पन्न हुआ है। यह विश्लेषण न केवल भारत की निर्यात क्षमताओं को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में उभरते परिवर्तनों की ओर भी संकेत करता है।

चीन पर अमेरिकी टैरिफ: भारत के लिए अवसर

अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए टैरिफ, विशेष रूप से ट्रंप युग से लेकर वर्तमान तक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पुनर्संरचना की प्रक्रिया को तेज कर चुके हैं। इसमें चीन पर निर्भरता कम करने की नीति अपनाई जा रही है, जिसे 'चीन +1 रणनीति' कहा जाता है। इसका सीधा लाभ उन देशों को हो सकता है जो उत्पादन और निर्यात की दृष्टि से प्रतिस्पर्धी विकल्प प्रदान कर सकते हैं – भारत उनमें अग्रणी हो सकता है।

भारत की शक्ति और संभावनाएँ

भारत के पास पहले से ही एक मजबूत और विविधीकृत बिजली उपकरण उद्योग है, जिसमें ट्रांसफॉर्मर, पावर केबल, मोटर, गियरबॉक्स और अन्य औद्योगिक उपकरणों का उत्पादन शामिल है। नीति आयोग के अनुसार, भारत 2035 तक $25 बिलियन से अधिक मूल्य के बिजली उपकरण निर्यात करने की क्षमता रखता है। यह न केवल निर्यात आधारित विकास को बल देगा, बल्कि रोजगार, नवाचार और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी सशक्त करेगा।

नीति आयोग के सुझाव और आवश्यक सुधार

नीति आयोग ने इस अवसर का लाभ उठाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

  • उद्योग के लिए अनुकूल नीति ढाँचा: निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं, टैक्स रियायतों और व्यापार समझौतों के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार किया जा सकता है।
  • बुनियादी ढांचे में सुधार: लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा आपूर्ति और उद्योगों के लिए औद्योगिक क्लस्टर का विकास।
  • तकनीकी नवाचार और अनुसंधान: गुणवत्ता मानकों का उन्नयन और नवाचार पर बल देने से भारत को वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने में सहायता मिलेगी।
  • कौशल विकास: प्रशिक्षित श्रमिक बल के अभाव में उत्पादन की गुणवत्ता और गति प्रभावित हो सकती है, अतः स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों का विस्तार आवश्यक है।

चुनौतियाँ और आवश्यक सावधानियाँ

हालाँकि अवसर बड़ा है, लेकिन भारत को कुछ प्रमुख चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा:

  • कच्चे माल की आपूर्ति में निर्भरता
  • उच्च वित्तीय लागत
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों की चुनौती
  • गुणवत्तापूर्ण ब्रांड पहचान की कमी

इन चुनौतियों के समाधान के लिए एक समन्वित रणनीति की आवश्यकता है जिसमें सरकार, उद्योग और अनुसंधान संस्थान मिलकर कार्य करें।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम

भारत के बिजली उपकरण उद्योग के पास वर्तमान वैश्विक व्यापारिक माहौल में अपनी भूमिका सशक्त करने का एक स्वर्णिम अवसर है। यदि इस अवसर को नीति निर्माण, औद्योगिक निवेश और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से साध लिया जाए, तो भारत न केवल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि एक निर्यात महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने भी आ सकता है। यह “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियानों को गति देने वाला एक ठोस स्तंभ सिद्ध हो सकता है।


4-तमिलनाडु ने राज्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए पैनल का गठन किया

— केंद्र के साथ बढ़ते मतभेदों के बीच तमिलनाडु की संघीय स्वायत्तता की पहल

भूमिका:

हाल के वर्षों में भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर बहस तेज होती गई है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु ने बार-बार यह चिंता जताई है कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु सरकार ने राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए एक विशेष पैनल का गठन किया है।

पैनल की प्रकृति और उद्देश्य:

तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित यह पैनल संविधान के अनुच्छेदों के तहत राज्यों को प्राप्त अधिकारों की रक्षा करने, केंद्र द्वारा जारी नीतियों के विश्लेषण की समीक्षा करने और संभावित संवैधानिक उल्लंघनों की पहचान करने के लिए कार्य करेगा। यह विशेषज्ञ समिति कानूनी, प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से सलाह प्रदान करेगी, जिससे राज्य अपनी नीतियों में अधिक मजबूती के साथ केंद्र के समक्ष अपना पक्ष रख सके।

संघीय ढांचे पर प्रभाव:

भारत का संविधान एक संघीय ढांचा प्रस्तुत करता है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के लिए अधिकारों का पृथक्करण किया गया है। लेकिन बीते समय में, जीएसटी परिषद में राज्यों की सीमित भूमिका, राज्यपालों की भूमिका में बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप, केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता और नई शिक्षा नीति जैसे विषयों पर राज्यों को पर्याप्त परामर्श न मिलना, राज्यों की असंतोषजनक स्थिति को दर्शाता है। तमिलनाडु का यह कदम न केवल राज्य हितों की रक्षा की दिशा में एक प्रयास है, बल्कि यह पूरे संघीय ढांचे को पुनर्संतुलित करने की ओर एक संकेत भी है।

राजनीतिक संदर्भ और विपक्षी एकजुटता:

डीएमके के नेतृत्व में तमिलनाडु सरकार पहले भी "संघीय मोर्चा" जैसे विचारों को सामने ला चुकी है। हाल ही में विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ में तमिलनाडु की सक्रिय भागीदारी भी केंद्र के एकाधिकारवादी रुझानों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष की ओर संकेत करती है। यह पैनल अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान के दायरे में रहते हुए सक्रिय कदम उठाएं।

निष्कर्ष:

तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित यह पैनल न केवल एक राज्य के अधिकारों की रक्षा का प्रयास है, बल्कि यह भारतीय संघवाद के भविष्य को लेकर उठ रही चिंताओं की अभिव्यक्ति भी है। यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल प्रस्तुत कर सकती है कि कैसे वे संवैधानिक ढांचे में रहकर केंद्र के साथ शक्ति संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रयास कर सकते हैं। संघीय भारत की मजबूती तभी संभव है जब सभी घटक इकाइयाँ — केंद्र और राज्य — आपसी सम्मान, सहयोग और संवैधानिक मर्यादा का पालन करें।

यह विषय UPSC और अन्य राज्य सेवा परीक्षाओं के लिए समसामयिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे जुड़े कुछ संभावित प्रश्न निम्नलिखित हैं:

मुख्य परीक्षा (UPSC Mains) हेतु संभावित प्रश्न:

  1. "संघीय ढांचे की रक्षा हेतु राज्यों की सक्रियता भारतीय लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक है?" — इस कथन के आलोक में तमिलनाडु द्वारा गठित पैनल की भूमिका का विश्लेषण करें।

  2. तमिलनाडु द्वारा राज्यों के अधिकारों की रक्षा हेतु पैनल गठन को भारत में 'सहकारी संघवाद' बनाम 'प्रतिस्पर्धी संघवाद' की बहस से कैसे जोड़ा जा सकता है?

  3. राज्यपालों की भूमिका और केंद्र के हस्तक्षेप के मुद्दे भारतीय संघवाद को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? हाल के उदाहरणों सहित उत्तर दीजिए।

  4. "भारत में वास्तविक संघवाद तभी संभव है जब राज्यों को नीति-निर्माण में सक्रिय भागीदारी मिले।" — इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा करें।

  5. भारतीय संविधान के किन प्रावधानों के तहत राज्यों को संघीय स्वायत्तता प्राप्त है? क्या वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इनकी पुनर्व्याख्या आवश्यक है?


निबंध लेखन हेतु संभावित विषय:

  • "संघीय भारत में राज्यों की भूमिका: अधिकार बनाम वास्तविकता"
  • "संघवाद का भविष्य: क्या राज्य अपनी पहचान खो रहे हैं?"
  • "राज्यों का सशक्तिकरण: लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने की दिशा में एक कदम"

5-भारत न्याय रिपोर्ट 2025: समावेशी न्याय प्रणाली की कसौटी पर भारतीय राज्य – UPSC के दृष्टिकोण से एक विश्लेषणात्मक लेख

भूमिका

भारत न्याय रिपोर्ट (India Justice Report - IJR) 2025 ने एक बार फिर देश की न्याय प्रणाली की वास्तविक स्थिति को तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर सामने रखा है। यह कोई सरकारी रिपोर्ट नहीं है, लेकिन Tata Trusts के नेतृत्व में कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट अब नीतिगत विमर्श, सुधारात्मक दृष्टिकोण और UPSC जैसे परीक्षाओं में लेखन का सशक्त स्रोत बन चुकी है। यह रिपोर्ट न केवल पुलिस, न्यायपालिका, जेल प्रणाली और कानूनी सहायता के चार स्तंभों का मूल्यांकन करती है, बल्कि लैंगिक न्याय, सामाजिक समावेश, प्रशासनिक दक्षता, और राज्यों की प्रतिबद्धता जैसे बिंदुओं पर भी ध्यान केंद्रित करती है।


प्रमुख निष्कर्ष – UPSC की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बिंदु:

1. लैंगिक न्याय की अनदेखी – पुलिस बल में महिलाएं नदारद

रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि देश का कोई भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश पुलिस बल में निर्धारित महिला आरक्षण (20–33%) को पूरा नहीं कर पाया

  • यह दर्शाता है कि महिला सशक्तिकरण के नीतिगत वादों और वास्तविक क्रियान्वयन में गहरी खाई है।
  • UPSC GS Paper 2 में Governance & Women Empowerment विषयों के उत्तरों में इसे सशक्त उदाहरण के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • महिला अपराधों की जाँच, रिपोर्टिंग और पीड़िता के प्रति संवेदनशीलता सीधे तौर पर पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ी है।

2. न्यायपालिका में भारी लंबित मामले और संसाधनों की कमी

  • रिपोर्ट के अनुसार देश की अधिकांश न्यायालयों में जजों की भारी कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, और मामलों का अत्यधिक लंबित होना एक गंभीर समस्या है।
  • उदाहरण: कई राज्यों में प्रति लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या न्यूनतम अनुशंसित स्तर (50 प्रति लाख) से काफी कम है।
  • GS Paper 2 – Judiciary Reforms के तहत इसे न्याय प्रणाली की बाधाओं के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

3. जेल प्रणाली में असमानता और अत्यधिक भीड़भाड़

  • रिपोर्ट बताती है कि देश की जेलों में 75% से अधिक कैदी विचाराधीन हैं, जिनमें अधिकांश सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से आते हैं।
  • जेलों में महिला बंदियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।
  • GS Paper 2 और GS Paper 3 में Prison Reforms, Human Rights & Internal Security जैसे विषयों में इसे प्रत्यक्ष उदाहरण के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

4. कानूनी सहायता तक सीमित पहुँच

  • रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि निःशुल्क कानूनी सहायता प्रणाली (Legal Aid Services), जो गरीबों और वंचितों के लिए न्याय का एकमात्र माध्यम हो सकती है, वह खर्च और सेवाओं दोनों के मामले में कमजोर है।
  • Social Justice और Access to Justice जैसे उत्तरों में यह रिपोर्ट नीति-निर्माण में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

विवेचन: न्याय का मतलब केवल कानून नहीं, बल्कि पहुँच और समान भागीदारी भी है

India Justice Report 2025 यह स्पष्ट करती है कि भारत में न्याय केवल संविधानिक आदर्शों पर आधारित न होकर प्रशासनिक इच्छाशक्ति, संसाधनों की उपलब्धता और समावेशी सोच पर भी निर्भर है।

यह रिपोर्ट बताती है कि केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य लगातार न्याय प्रणाली में सुधार की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, वहीं बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अभी भी मूलभूत संरचनात्मक सुधारों से दूर हैं। यह भारत के संघीय ढांचे में कार्यान्वयन की विषमता (Asymmetry in Governance) को भी उजागर करता है।


UPSC के लिए लेखन में उपयोग योग्य कथन और वाक्यांश:

  • “Justice is not merely the enforcement of law, but the assurance of accessibility, efficiency and empathy.”
  • “India’s justice system reflects not only procedural gaps but structural inequalities rooted in gender and class.”
  • “Data-based reports like IJR bridge the gap between perception and reality in public policy.”

निष्कर्ष:

भारत न्याय रिपोर्ट 2025 हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी न्याय प्रणाली वास्तव में "सभी के लिए न्याय" (Justice for All) के आदर्श को साकार कर रही है?
UPSC जैसे परीक्षाओं में, जहां उत्तर केवल जानकारी नहीं, बल्कि विश्लेषण और समाधान पर आधारित होते हैं, इस रिपोर्ट से प्राप्त बिंदु न्यायिक सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक समावेशिता पर बहुमूल्य सामग्री प्रदान करते हैं।

एक प्रभावी उत्तरकार के रूप में, हमें इस रिपोर्ट को केवल आँकड़ों की सूची नहीं, बल्कि एक नीति-उन्मुख दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, जो भारत को एक समावेशी और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाने की दिशा में मार्गदर्शन करे।


दैनिक समसामयिकी: 15 अप्रैल 2025👈

✍️ARVIND SINGH PK REWA
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“इस्लामिक नाटो” की परिकल्पना: तुर्की के हथियार, सऊदी धन और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक उभरते रक्षा गठजोड़ का विश्लेषण प्रस्तावना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन स्थिर नहीं होते; वे समय, खतरे और हितों के अनुसार बदलते रहते हैं। हाल के वर्षों में मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिवेश में तेज़ी से परिवर्तन हुआ है। इसी संदर्भ में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संभावित रक्षा-सहयोग को कुछ विश्लेषक “इस्लामिक नाटो” जैसी संज्ञा देने लगे हैं। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य संगठन नहीं है, फिर भी तीनों देशों के पूरक सामर्थ्य — तुर्की की रक्षा-तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक नए रणनीतिक त्रिकोण की संभावना को जन्म देते हैं। यह लेख इस संभावित रक्षा गठजोड़ की पृष्ठभूमि, इसके कारक, संभावित स्वरूप और वैश्विक राजनीति पर इसके प्रभावों का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1. भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में शक्ति संतुलन पश्चिमी देशों से धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप की प्रभुत्ववादी भूम...

Trump’s Greenland Ambition and Europe Tariff Crisis: A New Geopolitical Flashpoint in 2026

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा 18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ...

Trump’s Gaza “Board of Peace”: Power, Peacebuilding and the Future of Post-War Reconstruction

ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग प्रस्तावना 17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है। पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरा...

Jimmy Lai Case: Hong Kong National Security Law, Press Freedom and Global Human Rights Debate

हांगकांग–चीन संबंध और जिमी लाई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रेस स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का समग्र अकादमिक विश्लेषण भूमिका हांगकांग आज केवल एक वैश्विक वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, कानून और मानवाधिकारों के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है। इसकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक अतीत, “एक देश–दो प्रणाली” की अवधारणा और हाल के वर्षों में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की भूमिका को समग्रता में देखना आवश्यक है। जिमी लाई का मामला इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और प्रेस स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। 1. हांगकांग–चीन संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) चीन का पारंपरिक हिस्सा हांगकांग प्राचीन काल से चीनी साम्राज्यों का हिस्सा रहा। यह मुख्यतः मछली पकड़ने और स्थानीय व्यापार पर आधारित क्षेत्र था। मिंग और चिंग राजवंशों के समय इसे दक्षिण चीन का सामान्य तटीय इलाका माना जाता था। (ख) अफीम युद्ध और ब्रिटिश उपनिवेश 19वीं सदी में अफीम युद्धों ने हांगकांग के भाग्य को बदल दिया। 1842 की नानजि...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Gig Workers in India: Pain, Challenges and 10-Minute Delivery Crisis in Quick Commerce Sector

भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...

Trump’s “Board of Peace”: From Gaza Plan to Global Conflict Resolution

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...