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Dhar Bhojshala Verdict: High Court Decision, Political Reactions and Social Impact Analysis

 धार भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट के फैसले, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक प्रभावों का गहन विश्लेषण धार की ऐतिहासिक भोजशाला पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय केवल एक धार्मिक स्थल से जुड़ा कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत की ऐतिहासिक चेतना, न्यायिक व्यवस्था और सामाजिक संतुलन की गंभीर परीक्षा भी है। सदियों से विवादों, दावों और भावनात्मक बहसों के केंद्र में रही भोजशाला अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां न्यायपालिका ने वैज्ञानिक साक्ष्यों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस फैसले ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम समाधान का मार्ग अदालतों और संविधान से होकर ही गुजरता है। भोजशाला का इतिहास केवल एक इमारत का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें ज्ञान, शिक्षा और आस्था का गहरा समन्वय दिखाई देता है। माना जाता है कि परमार वंश के महान राजा भोज के काल में यह स्थान विद्या और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र था। समय के साथ राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवर्तनों ने इसकी पहचान को विवादों में बदल...

UPSC Current Affairs in Hindi : 20 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख विश्लेषण व संकलन: 20 अप्रैल 2025

1-संपादकीय: लोकतंत्र में मर्यादा और संस्थाओं का सम्मान आवश्यक

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसकी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और मर्यादा में निहित है। संसद, कार्यपालिका, और न्यायपालिका — इन तीनों स्तंभों का आपसी संतुलन ही लोकतंत्र को जीवंत और स्थिर बनाता है। ऐसे में जब कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थान की आलोचना करता है, तो यह न केवल एक संस्थान पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन को भी चुनौती देता है।

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना इसी तरह का एक उदाहरण है, जिसने राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में हलचल मचा दी। हालाँकि, इस प्रकरण में जो बात प्रशंसनीय रही, वह थी भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा की त्वरित प्रतिक्रिया। उन्होंने दोनों नेताओं की टिप्पणियों को उनका “व्यक्तिगत मत” बताते हुए पार्टी को उनसे अलग कर लिया और न्यायपालिका के प्रति पूर्ण सम्मान प्रकट किया।

यह कदम दर्शाता है कि सत्तारूढ़ दल भी यह समझता है कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार होते हुए भी कुछ मर्यादाएँ अनिवार्य हैं। न्यायपालिका पर विश्वास केवल एक संवैधानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जनमानस की आस्था का केंद्र भी है। यदि राजनीतिक दल स्वयं उस विश्वास को कमज़ोर करने लगें, तो इससे लोकतंत्र की नींव ही डगमगाने लगती है।

जेपी नड्डा का वक्तव्य न केवल राजनीतिक मर्यादा का परिचायक है, बल्कि यह एक सशक्त संदेश भी देता है कि पार्टी की आधिकारिक नीति व्यक्तिगत बयानों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यह उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक उदाहरण है जो संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहते हुए अपने नेताओं की ज़िम्मेदारियों को लेकर सजग रहना चाहते हैं।

आज जब भारतीय लोकतंत्र कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है—संस्थागत हस्तक्षेप, ध्रुवीकरण, और वैचारिक संघर्षों के बीच—तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदारी से पेश आए। लोकतंत्र की गरिमा केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के सम्मान और परस्पर संतुलन से सुरक्षित रहती है।

अंततः, न्यायपालिका की आलोचना यदि संविधानसम्मत सीमाओं में हो तो स्वीकार्य हो सकती है, परंतु जब यह आलोचना राजनीतिक मंचों से होकर संस्थागत अवमानना की ओर बढ़ने लगे, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन जाती है। ऐसे में राजनीतिक दलों की जवाबदेही और परिपक्वता ही देश की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा कर सकती है। भाजपा द्वारा समय पर उठाया गया यह कदम इसी परिपक्वता का संकेत है।

यह रहा ब्लॉग पोस्ट के रूप में तैयार किया गया वही लेख, थोड़ा और सहज, पठनीय और ऑनलाइन पाठकों के अनुकूल भाषा में:


2-उत्तराखंड में 'आदर्श संस्कृत ग्राम योजना' – हर जिले में बोलेगी संस्कृत!

उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में एक अनोखी और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण योजना को मंज़ूरी दी है – आदर्श संस्कृत ग्राम योजना। इस योजना के तहत राज्य के हर जिले में एक गांव को चुना जाएगा, जहां के लोग संस्कृत सीखेंगे और उसे दैनिक जीवन में बोलचाल की भाषा के रूप में अपनाएंगे।

संस्कृत: उत्तराखंड की आत्मा से जुड़ी भाषा

क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड ने संस्कृत को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दे रखा है? यह राज्य वैदिक परंपराओं, ऋषियों की तपोभूमि और प्राचीन ग्रंथों की जन्मस्थली रहा है। यहां की संस्कृति और जीवनशैली में आज भी संस्कृत की झलक मिलती है।

योजना का मकसद क्या है?

सरकार चाहती है कि संस्कृत सिर्फ किताबों या मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि लोग इसे बोलचाल और संवाद की भाषा के रूप में इस्तेमाल करें। इसके लिए:

  • हर जिले में एक गांव को 'आदर्श संस्कृत ग्राम' बनाया जाएगा।
  • ग्रामीणों को संस्कृत बोलने, पढ़ने और समझने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • इस योजना का क्रियान्वयन शिक्षा विभाग और संस्कृत संस्थानों के सहयोग से होगा।

पहले से चल रही संस्कृत को बढ़ावा देने वाली योजनाएं

उत्तराखंड सरकार पहले भी संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कई कदम उठा चुकी है, जैसे:

  • छात्राओं और SC/ST विद्यार्थियों को संस्कृत विषय लेने पर विशेष छात्रवृत्ति दी जाती है।
  • राज्य के संस्कृत विद्यालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

क्या मिल सकता है इस योजना से?

  1. संस्कृत को नया जीवन – यह योजना संस्कृत को केवल पवित्र भाषा नहीं, जीवन की भाषा बनाएगी।
  2. सांस्कृतिक पहचान मजबूत – लोग अपनी जड़ों से जुड़ेंगे और परंपराएं जीवंत होंगी।
  3. शैक्षणिक और रोजगार के अवसर – संस्कृत जानने वाले युवाओं के लिए नई संभावनाएं खुलेंगी।
  4. पर्यटन को बढ़ावा – संस्कृत ग्राम विदेशी पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।

अंत में...

'आदर्श संस्कृत ग्राम योजना' उत्तराखंड का एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम है। अगर यह योजना सफल रही, तो न केवल संस्कृत का पुनर्जागरण होगा, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को भी नया जीवन मिलेगा। और हो सकता है, एक दिन हमें पूरे देश में संस्कृत बोलते गांव दिखाई दें!

संस्कृत में कहें – "सर्वे भवन्तु सुखिनः" – और इस पहल को शुभकामनाएं दें!


3-अमरावती: रिन्यूएबल एनर्जी आधारित भारत का भविष्य और सतत शहरी विकास की दिशा में एक मॉडल प्रयास

परिचय

भारत जैसे विकासशील देश में जहां ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है, वहां नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) पर आधारित विकास मॉडल भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और सतत शहरी विकास (Sustainable Urban Development) के लिए अत्यंत आवश्यक है। आंध्र प्रदेश की नयी राजधानी अमरावती इसी दिशा में एक साहसिक पहल है, जो पूरी तरह रिन्यूएबल एनर्जी से संचालित दुनिया का पहला शहर बनने की ओर अग्रसर है। यह परियोजना न केवल भारत की ऊर्जा नीति को नई दिशा देती है, बल्कि यह भविष्य के स्मार्ट और हरित शहरों (Green Cities) का आदर्श भी प्रस्तुत करती है।


भारत की ऊर्जा नीति और अमरावती की भूमिका

भारत सरकार की ऊर्जा नीति पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय स्रोतों पर केंद्रित रही है। इंटरनेशनल सोलर एलायंस की अगुवाई से लेकर 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा लक्ष्य तक, भारत ने वैश्विक मंच पर ग्रीन एनर्जी के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है। अमरावती की परियोजना, जिसमें 2700 मेगावाट रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन की योजना है, इस नीति का जीवंत उदाहरण है।

यह शहर सौर, पवन और पनबिजली जैसे स्रोतों से अपनी समस्त ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य रखता है। इससे न केवल जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी।


सतत शहरी विकास की दिशा में एक मॉडल शहर

अमरावती की योजना सतत शहरी विकास का आदर्श प्रस्तुत करती है। इसमें पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों, ऊर्जा दक्ष इमारतों, हरित परिवहन और जल प्रबंधन जैसे अनेक आयाम शामिल हैं। जब एक संपूर्ण शहर अपनी बिजली की जरूरत केवल नवीकरणीय स्रोतों से पूरी करता है, तो यह शहरी नियोजन और पर्यावरणीय न्याय का सशक्त उदाहरण बन जाता है।

यह पहल अन्य राज्यों और देशों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती है कि किस प्रकार नवाचार और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को एक साथ जोड़कर भविष्य के स्मार्ट सिटी तैयार किए जा सकते हैं।


रिन्यूएबल एनर्जी आधारित शहरीकरण की संभावनाएं और चुनौतियां

भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की अपार संभावनाएं हैं — विशेषकर सौर और पवन ऊर्जा में। लेकिन इन स्रोतों को शहरी संरचना में समाहित करने में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे:

  • स्थायी वित्तीय निवेश की आवश्यकता
  • ऊर्जा भंडारण (Storage) की तकनीकी बाधाएं
  • गठनात्मक समन्वय और नीति का अभाव
  • सामाजिक जागरूकता की कमी

इन बाधाओं को दूर करते हुए अमरावती जैसी परियोजनाएं यह साबित कर सकती हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ यह परिवर्तन संभव है।


निष्कर्ष

अमरावती की योजना भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरणीय चेतना और शहरी नियोजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह पहल हमें यह सिखाती है कि कैसे नवाचार और सतत विकास एक साथ मिलकर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, जो हरित, स्वच्छ और समावेशी हो। यदि यह परियोजना अपने लक्ष्य को पूर्ण रूप से प्राप्त कर पाती है, तो अमरावती न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक प्रेरणास्रोत मॉडल बनकर उभरेगी।


टैग्स: #RenewableEnergy #Amaravati #SustainableDevelopment #GreenCity #SmartCityIndia #UPSC #EnvironmentPolicy


4-भारत में चीतों को मिला नया आशियाना: गांधी सागर अभयारण्य 

हाल ही में भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम को एक नई गति मिली है, जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दो चीतों – 'प्रभास' और 'पावक' – को गांधी सागर अभयारण्य में छोड़ा। यह कदम भारत की जैव विविधता संरक्षण नीति के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है।

चीतों की भारत में वापसी: एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

चीते भारत में 1952 में विलुप्त घोषित कर दिए गए थे। दशकों बाद, भारत सरकार ने ‘Project Cheetah’ योजना के अंतर्गत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाकर उन्हें पुनः भारतीय भूमि पर बसाने की पहल की। इसका पहला चरण कुनो नेशनल पार्क (मध्य प्रदेश) में शुरू किया गया था।

अब गांधी सागर अभयारण्य इस योजना का दूसरा प्रमुख केंद्र बन गया है, जिससे यह देश का दूसरा चीता पुनर्वास केंद्र बन चुका है।

गांधी सागर अभयारण्य की भूमिका

गांधी सागर अभयारण्य, मध्य प्रदेश के मंदसौर और नीमच जिलों में फैला हुआ है। यहाँ चीतों के लिए अनुकूल पर्यावरण, घास के मैदान, वन्यजीवों की भरपूर उपस्थिति और वैज्ञानिक निगरानी की व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की गई हैं। इससे न केवल चीतों का सुरक्षित आवास सुनिश्चित होगा, बल्कि स्थानीय जैव विविधता भी समृद्ध होगी।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने X (पूर्व ट्विटर) पर कहा, "एमपी की धरती जैव विविधता को संरक्षित करने का आदर्श केंद्र बन चुकी है।"

Project Cheetah का उद्देश्य और महत्व

  • विलुप्त हो चुके चीतों की भारत में पुनः स्थापना
  • पारिस्थितिक तंत्र की बहाली
  • पर्यावरणीय जागरूकता और पर्यटन को बढ़ावा
  • भारत को वन्यजीव संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर प्रतिष्ठित करना

यह परियोजना वैश्विक सहयोग, आधुनिक तकनीक और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त भागीदारी का उदाहरण है।


मुख्य परीक्षा के संभावित प्रश्न और उत्तर

1. भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य और महत्व क्या है? गांधी सागर अभयारण्य की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर:
भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन बहाल करना, विलुप्त प्रजातियों की वापसी करना और जैव विविधता को समृद्ध करना है। गांधी सागर अभयारण्य इस दिशा में दूसरा बड़ा केंद्र बना है, जो पर्याप्त वन क्षेत्र, शिकार प्रजातियों और वैज्ञानिक प्रबंधन प्रणाली से सुसज्जित है। यह स्थान प्रोजेक्ट चीता के सफल क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।


2. मध्य प्रदेश के कौन-कौन से अभयारण्य चीतों के पुनर्वास का केंद्र बन चुके हैं?

उत्तर:
मध्य प्रदेश में अब तक दो प्रमुख स्थल चीतों के पुनर्वास हेतु चिन्हित किए गए हैं:

  1. कुनो नेशनल पार्क (शिवपुरी ज़िला)
  2. गांधी सागर अभयारण्य (मंदसौर एवं नीमच ज़िले)
    इन दोनों स्थानों पर चीतों के लिए उपयुक्त जैविक और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ पाई जाती हैं।

3. 'प्रभास' और 'पावक' नामक चीतों से जुड़ी हाल की घटना का उल्लेख करें। यह घटना भारत में जैव विविधता संरक्षण से कैसे जुड़ी है?

उत्तर:
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 14 अप्रैल 2024 को ‘प्रभास’ और ‘पावक’ नामक चीतों को गांधी सागर अभयारण्य में छोड़ा। यह घटना भारत में वन्यजीव पुनर्वास कार्यक्रम को गति देने का प्रतीक है। यह जैव विविधता को संरक्षित रखने, विलुप्त प्रजातियों की वापसी और पारिस्थितिकीय स्थिरता को बहाल करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है।


4. "वन्यजीव संरक्षण में भारत की नई पहलें: चीतों की घर वापसी एक उदाहरण" – इस कथन पर टिप्पणी करें।

उत्तर:
भारत ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक साहसिक कदम उठाते हुए चीतों की घर वापसी की ऐतिहासिक पहल की है। Project Cheetah जैसे प्रयासों से न केवल विलुप्त प्रजातियों की वापसी संभव हुई है, बल्कि भारत की वैश्विक छवि भी एक पर्यावरणीय प्रहरी के रूप में उभर रही है। गांधी सागर जैसे नए स्थलों की पहचान यह दर्शाती है कि भारत दीर्घकालिक और सतत जैव संरक्षण की दिशा में संकल्पबद्ध है।


तथ्य आधारित प्रश्न (Objective Type)

  1. गांधी सागर अभयारण्य किस राज्य में स्थित है?
    उत्तर:  मध्य प्रदेश

  2. ‘प्रोजेक्ट चीता’ योजना के अंतर्गत चीतों को पुनः बसाने की पहली कोशिश किस नेशनल पार्क में की गई थी?
    उत्तर: कुनो नेशनल पार्क


निष्कर्ष

भारत में चीतों की वापसी केवल एक वन्यजीव पुनर्वास की घटना नहीं है, यह भारत के पर्यावरणीय दृष्टिकोण की पुनर्परिभाषा है। गांधी सागर अभयारण्य का चयन इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है कि हम केवल अतीत के गौरव को पुनः प्राप्त ही नहीं कर रहे, बल्कि भविष्य के लिए भी एक स्थायी मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।



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✍️ARVIND SINGH PK REWA

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UNEP उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2024: पेरिस समझौते की सीमा से आगे बढ़ती दुनिया का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन भूमिका जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा जारी उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2024 ने स्पष्ट कर दिया है कि पेरिस समझौते (2015) में तय 1.5°C तापमान सीमा का अस्थायी उल्लंघन अब लगभग निश्चित है। यह रिपोर्ट किसी नए संकट की घोषणा नहीं करती, बल्कि उस संकट की पुष्टि करती है जिसकी चेतावनी पिछले कई वर्षों से दी जा रही थी — कि वैश्विक नीतियाँ विज्ञान की गति से नहीं चल रहीं। पेरिस समझौते का मूल लक्ष्य था कि औद्योगिक युग से पहले के औसत तापमान की तुलना में वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखा जाए। यह लक्ष्य इसलिए तय किया गया क्योंकि इसी सीमा के भीतर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। किंतु UNEP की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि मानवता इस सीमा के बहुत करीब पहुँच चुकी है और मौजूदा प्रयास अपर्याप्त हैं। उत्सर्जन अंतराल: अवधारणा और महत्व “उत्सर्जन अंतराल” (Emis...

उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक: विकास की नई राह

 जम्मू-कश्मीर के परिवहन और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का सफल परीक्षण उल्लेखनीय है। 272 किलोमीटर लंबा यह रेल मार्ग केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक-आर्थिक विकास का प्रतीक है। परियोजना का महत्व यह रेल मार्ग दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों से गुजरता है, जहां नदियों, घाटियों और घने जंगलों ने इसे इंजीनियरिंग का चमत्कार बना दिया है। परियोजना का उद्देश्य न केवल कश्मीर घाटी को शेष भारत से जोड़ना है, बल्कि उस क्षेत्र के लाखों निवासियों को बेहतर परिवहन सुविधाएं देना भी है। इस रेल नेटवर्क की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं: 1. कनेक्टिविटी में सुधार: जम्मू और श्रीनगर के बीच यात्रा का समय घटेगा और आपातकालीन स्थितियों में तीव्र प्रतिक्रिया सुनिश्चित होगी। 2. आर्थिक समृद्धि: रेल मार्ग से पर्यटन को नया प्रोत्साहन मिलेगा, जो जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। साथ ही, कृषि और हस्तशिल्प के क्षेत्र को भी व्यापक बाजार तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। 3. सामाजिक लाभ: इस रेल परियोजना से कश्मीर घाटी के दू...

Indian Rupee Hits Record Low Amid US Trade Deal Absence, FII Outflows and Global Tariff Uncertainty

भारतीय रुपया का अवमूल्यन: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अनुपस्थिति में अर्थव्यवस्था की नई परीक्षा भूमिका: एक मुद्रा, अनेक संकेत 16 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91 के स्तर को पार करते हुए अपने अब तक के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट केवल एक विनिमय दर की खबर नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-आर्थिक तनाव, व्यापार कूटनीति की विफलता, पूंजी प्रवाह की अस्थिरता और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सीमाओं को उजागर करने वाला संकेतक है। विशेष रूप से भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अनुपस्थिति ने इस अवमूल्यन को एक नीतिगत प्रश्न में बदल दिया है—क्या भारत वैश्विक व्यापार व्यवस्था में रणनीतिक रूप से पिछड़ रहा है? रुपये के अवमूल्यन का वैश्विक-घरेलू संदर्भ रुपये की कमजोरी को केवल घरेलू आर्थिक कारकों से समझना अधूरा होगा। वर्ष 2025 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संरक्षणवाद की वापसी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का वर्ष रहा है। अमेरिका द्वारा गैर-FTA देशों पर उच्च टैरिफ वैश्विक पूंजी का सुरक्षित डॉलर परिसंपत्तियों की ओर पलायन फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति एशियाई मुद्राओं प...