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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs in Hindi : 20 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख विश्लेषण व संकलन: 20 अप्रैल 2025

1-संपादकीय: लोकतंत्र में मर्यादा और संस्थाओं का सम्मान आवश्यक

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसकी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और मर्यादा में निहित है। संसद, कार्यपालिका, और न्यायपालिका — इन तीनों स्तंभों का आपसी संतुलन ही लोकतंत्र को जीवंत और स्थिर बनाता है। ऐसे में जब कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थान की आलोचना करता है, तो यह न केवल एक संस्थान पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन को भी चुनौती देता है।

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना इसी तरह का एक उदाहरण है, जिसने राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में हलचल मचा दी। हालाँकि, इस प्रकरण में जो बात प्रशंसनीय रही, वह थी भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा की त्वरित प्रतिक्रिया। उन्होंने दोनों नेताओं की टिप्पणियों को उनका “व्यक्तिगत मत” बताते हुए पार्टी को उनसे अलग कर लिया और न्यायपालिका के प्रति पूर्ण सम्मान प्रकट किया।

यह कदम दर्शाता है कि सत्तारूढ़ दल भी यह समझता है कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार होते हुए भी कुछ मर्यादाएँ अनिवार्य हैं। न्यायपालिका पर विश्वास केवल एक संवैधानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जनमानस की आस्था का केंद्र भी है। यदि राजनीतिक दल स्वयं उस विश्वास को कमज़ोर करने लगें, तो इससे लोकतंत्र की नींव ही डगमगाने लगती है।

जेपी नड्डा का वक्तव्य न केवल राजनीतिक मर्यादा का परिचायक है, बल्कि यह एक सशक्त संदेश भी देता है कि पार्टी की आधिकारिक नीति व्यक्तिगत बयानों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यह उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक उदाहरण है जो संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहते हुए अपने नेताओं की ज़िम्मेदारियों को लेकर सजग रहना चाहते हैं।

आज जब भारतीय लोकतंत्र कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है—संस्थागत हस्तक्षेप, ध्रुवीकरण, और वैचारिक संघर्षों के बीच—तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदारी से पेश आए। लोकतंत्र की गरिमा केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के सम्मान और परस्पर संतुलन से सुरक्षित रहती है।

अंततः, न्यायपालिका की आलोचना यदि संविधानसम्मत सीमाओं में हो तो स्वीकार्य हो सकती है, परंतु जब यह आलोचना राजनीतिक मंचों से होकर संस्थागत अवमानना की ओर बढ़ने लगे, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन जाती है। ऐसे में राजनीतिक दलों की जवाबदेही और परिपक्वता ही देश की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा कर सकती है। भाजपा द्वारा समय पर उठाया गया यह कदम इसी परिपक्वता का संकेत है।

यह रहा ब्लॉग पोस्ट के रूप में तैयार किया गया वही लेख, थोड़ा और सहज, पठनीय और ऑनलाइन पाठकों के अनुकूल भाषा में:


2-उत्तराखंड में 'आदर्श संस्कृत ग्राम योजना' – हर जिले में बोलेगी संस्कृत!

उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में एक अनोखी और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण योजना को मंज़ूरी दी है – आदर्श संस्कृत ग्राम योजना। इस योजना के तहत राज्य के हर जिले में एक गांव को चुना जाएगा, जहां के लोग संस्कृत सीखेंगे और उसे दैनिक जीवन में बोलचाल की भाषा के रूप में अपनाएंगे।

संस्कृत: उत्तराखंड की आत्मा से जुड़ी भाषा

क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड ने संस्कृत को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दे रखा है? यह राज्य वैदिक परंपराओं, ऋषियों की तपोभूमि और प्राचीन ग्रंथों की जन्मस्थली रहा है। यहां की संस्कृति और जीवनशैली में आज भी संस्कृत की झलक मिलती है।

योजना का मकसद क्या है?

सरकार चाहती है कि संस्कृत सिर्फ किताबों या मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि लोग इसे बोलचाल और संवाद की भाषा के रूप में इस्तेमाल करें। इसके लिए:

  • हर जिले में एक गांव को 'आदर्श संस्कृत ग्राम' बनाया जाएगा।
  • ग्रामीणों को संस्कृत बोलने, पढ़ने और समझने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • इस योजना का क्रियान्वयन शिक्षा विभाग और संस्कृत संस्थानों के सहयोग से होगा।

पहले से चल रही संस्कृत को बढ़ावा देने वाली योजनाएं

उत्तराखंड सरकार पहले भी संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कई कदम उठा चुकी है, जैसे:

  • छात्राओं और SC/ST विद्यार्थियों को संस्कृत विषय लेने पर विशेष छात्रवृत्ति दी जाती है।
  • राज्य के संस्कृत विद्यालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

क्या मिल सकता है इस योजना से?

  1. संस्कृत को नया जीवन – यह योजना संस्कृत को केवल पवित्र भाषा नहीं, जीवन की भाषा बनाएगी।
  2. सांस्कृतिक पहचान मजबूत – लोग अपनी जड़ों से जुड़ेंगे और परंपराएं जीवंत होंगी।
  3. शैक्षणिक और रोजगार के अवसर – संस्कृत जानने वाले युवाओं के लिए नई संभावनाएं खुलेंगी।
  4. पर्यटन को बढ़ावा – संस्कृत ग्राम विदेशी पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।

अंत में...

'आदर्श संस्कृत ग्राम योजना' उत्तराखंड का एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम है। अगर यह योजना सफल रही, तो न केवल संस्कृत का पुनर्जागरण होगा, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को भी नया जीवन मिलेगा। और हो सकता है, एक दिन हमें पूरे देश में संस्कृत बोलते गांव दिखाई दें!

संस्कृत में कहें – "सर्वे भवन्तु सुखिनः" – और इस पहल को शुभकामनाएं दें!


3-अमरावती: रिन्यूएबल एनर्जी आधारित भारत का भविष्य और सतत शहरी विकास की दिशा में एक मॉडल प्रयास

परिचय

भारत जैसे विकासशील देश में जहां ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है, वहां नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) पर आधारित विकास मॉडल भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और सतत शहरी विकास (Sustainable Urban Development) के लिए अत्यंत आवश्यक है। आंध्र प्रदेश की नयी राजधानी अमरावती इसी दिशा में एक साहसिक पहल है, जो पूरी तरह रिन्यूएबल एनर्जी से संचालित दुनिया का पहला शहर बनने की ओर अग्रसर है। यह परियोजना न केवल भारत की ऊर्जा नीति को नई दिशा देती है, बल्कि यह भविष्य के स्मार्ट और हरित शहरों (Green Cities) का आदर्श भी प्रस्तुत करती है।


भारत की ऊर्जा नीति और अमरावती की भूमिका

भारत सरकार की ऊर्जा नीति पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय स्रोतों पर केंद्रित रही है। इंटरनेशनल सोलर एलायंस की अगुवाई से लेकर 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा लक्ष्य तक, भारत ने वैश्विक मंच पर ग्रीन एनर्जी के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है। अमरावती की परियोजना, जिसमें 2700 मेगावाट रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन की योजना है, इस नीति का जीवंत उदाहरण है।

यह शहर सौर, पवन और पनबिजली जैसे स्रोतों से अपनी समस्त ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य रखता है। इससे न केवल जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी।


सतत शहरी विकास की दिशा में एक मॉडल शहर

अमरावती की योजना सतत शहरी विकास का आदर्श प्रस्तुत करती है। इसमें पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों, ऊर्जा दक्ष इमारतों, हरित परिवहन और जल प्रबंधन जैसे अनेक आयाम शामिल हैं। जब एक संपूर्ण शहर अपनी बिजली की जरूरत केवल नवीकरणीय स्रोतों से पूरी करता है, तो यह शहरी नियोजन और पर्यावरणीय न्याय का सशक्त उदाहरण बन जाता है।

यह पहल अन्य राज्यों और देशों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती है कि किस प्रकार नवाचार और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को एक साथ जोड़कर भविष्य के स्मार्ट सिटी तैयार किए जा सकते हैं।


रिन्यूएबल एनर्जी आधारित शहरीकरण की संभावनाएं और चुनौतियां

भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की अपार संभावनाएं हैं — विशेषकर सौर और पवन ऊर्जा में। लेकिन इन स्रोतों को शहरी संरचना में समाहित करने में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे:

  • स्थायी वित्तीय निवेश की आवश्यकता
  • ऊर्जा भंडारण (Storage) की तकनीकी बाधाएं
  • गठनात्मक समन्वय और नीति का अभाव
  • सामाजिक जागरूकता की कमी

इन बाधाओं को दूर करते हुए अमरावती जैसी परियोजनाएं यह साबित कर सकती हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ यह परिवर्तन संभव है।


निष्कर्ष

अमरावती की योजना भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरणीय चेतना और शहरी नियोजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह पहल हमें यह सिखाती है कि कैसे नवाचार और सतत विकास एक साथ मिलकर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, जो हरित, स्वच्छ और समावेशी हो। यदि यह परियोजना अपने लक्ष्य को पूर्ण रूप से प्राप्त कर पाती है, तो अमरावती न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक प्रेरणास्रोत मॉडल बनकर उभरेगी।


टैग्स: #RenewableEnergy #Amaravati #SustainableDevelopment #GreenCity #SmartCityIndia #UPSC #EnvironmentPolicy


4-भारत में चीतों को मिला नया आशियाना: गांधी सागर अभयारण्य 

हाल ही में भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम को एक नई गति मिली है, जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दो चीतों – 'प्रभास' और 'पावक' – को गांधी सागर अभयारण्य में छोड़ा। यह कदम भारत की जैव विविधता संरक्षण नीति के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है।

चीतों की भारत में वापसी: एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

चीते भारत में 1952 में विलुप्त घोषित कर दिए गए थे। दशकों बाद, भारत सरकार ने ‘Project Cheetah’ योजना के अंतर्गत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाकर उन्हें पुनः भारतीय भूमि पर बसाने की पहल की। इसका पहला चरण कुनो नेशनल पार्क (मध्य प्रदेश) में शुरू किया गया था।

अब गांधी सागर अभयारण्य इस योजना का दूसरा प्रमुख केंद्र बन गया है, जिससे यह देश का दूसरा चीता पुनर्वास केंद्र बन चुका है।

गांधी सागर अभयारण्य की भूमिका

गांधी सागर अभयारण्य, मध्य प्रदेश के मंदसौर और नीमच जिलों में फैला हुआ है। यहाँ चीतों के लिए अनुकूल पर्यावरण, घास के मैदान, वन्यजीवों की भरपूर उपस्थिति और वैज्ञानिक निगरानी की व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की गई हैं। इससे न केवल चीतों का सुरक्षित आवास सुनिश्चित होगा, बल्कि स्थानीय जैव विविधता भी समृद्ध होगी।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने X (पूर्व ट्विटर) पर कहा, "एमपी की धरती जैव विविधता को संरक्षित करने का आदर्श केंद्र बन चुकी है।"

Project Cheetah का उद्देश्य और महत्व

  • विलुप्त हो चुके चीतों की भारत में पुनः स्थापना
  • पारिस्थितिक तंत्र की बहाली
  • पर्यावरणीय जागरूकता और पर्यटन को बढ़ावा
  • भारत को वन्यजीव संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर प्रतिष्ठित करना

यह परियोजना वैश्विक सहयोग, आधुनिक तकनीक और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त भागीदारी का उदाहरण है।


मुख्य परीक्षा के संभावित प्रश्न और उत्तर

1. भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य और महत्व क्या है? गांधी सागर अभयारण्य की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर:
भारत में चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन बहाल करना, विलुप्त प्रजातियों की वापसी करना और जैव विविधता को समृद्ध करना है। गांधी सागर अभयारण्य इस दिशा में दूसरा बड़ा केंद्र बना है, जो पर्याप्त वन क्षेत्र, शिकार प्रजातियों और वैज्ञानिक प्रबंधन प्रणाली से सुसज्जित है। यह स्थान प्रोजेक्ट चीता के सफल क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।


2. मध्य प्रदेश के कौन-कौन से अभयारण्य चीतों के पुनर्वास का केंद्र बन चुके हैं?

उत्तर:
मध्य प्रदेश में अब तक दो प्रमुख स्थल चीतों के पुनर्वास हेतु चिन्हित किए गए हैं:

  1. कुनो नेशनल पार्क (शिवपुरी ज़िला)
  2. गांधी सागर अभयारण्य (मंदसौर एवं नीमच ज़िले)
    इन दोनों स्थानों पर चीतों के लिए उपयुक्त जैविक और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ पाई जाती हैं।

3. 'प्रभास' और 'पावक' नामक चीतों से जुड़ी हाल की घटना का उल्लेख करें। यह घटना भारत में जैव विविधता संरक्षण से कैसे जुड़ी है?

उत्तर:
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 14 अप्रैल 2024 को ‘प्रभास’ और ‘पावक’ नामक चीतों को गांधी सागर अभयारण्य में छोड़ा। यह घटना भारत में वन्यजीव पुनर्वास कार्यक्रम को गति देने का प्रतीक है। यह जैव विविधता को संरक्षित रखने, विलुप्त प्रजातियों की वापसी और पारिस्थितिकीय स्थिरता को बहाल करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है।


4. "वन्यजीव संरक्षण में भारत की नई पहलें: चीतों की घर वापसी एक उदाहरण" – इस कथन पर टिप्पणी करें।

उत्तर:
भारत ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक साहसिक कदम उठाते हुए चीतों की घर वापसी की ऐतिहासिक पहल की है। Project Cheetah जैसे प्रयासों से न केवल विलुप्त प्रजातियों की वापसी संभव हुई है, बल्कि भारत की वैश्विक छवि भी एक पर्यावरणीय प्रहरी के रूप में उभर रही है। गांधी सागर जैसे नए स्थलों की पहचान यह दर्शाती है कि भारत दीर्घकालिक और सतत जैव संरक्षण की दिशा में संकल्पबद्ध है।


तथ्य आधारित प्रश्न (Objective Type)

  1. गांधी सागर अभयारण्य किस राज्य में स्थित है?
    उत्तर:  मध्य प्रदेश

  2. ‘प्रोजेक्ट चीता’ योजना के अंतर्गत चीतों को पुनः बसाने की पहली कोशिश किस नेशनल पार्क में की गई थी?
    उत्तर: कुनो नेशनल पार्क


निष्कर्ष

भारत में चीतों की वापसी केवल एक वन्यजीव पुनर्वास की घटना नहीं है, यह भारत के पर्यावरणीय दृष्टिकोण की पुनर्परिभाषा है। गांधी सागर अभयारण्य का चयन इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है कि हम केवल अतीत के गौरव को पुनः प्राप्त ही नहीं कर रहे, बल्कि भविष्य के लिए भी एक स्थायी मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।



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✍️ARVIND SINGH PK REWA

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जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

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भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...