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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Supreme Court vs Executive: Judicial Review of President’s Assent Sparks Constitutional Debate

संपादकीय लेख: "संवैधानिक संतुलन बनाम न्यायिक सक्रियता: राष्ट्रपति की स्वीकृति पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की पृष्ठभूमि में एक विमर्श"


भूमिका:

भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला तीन स्वतंत्र स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिकी है। ये सभी स्तंभ संविधान की सीमाओं में रहकर कार्य करते हैं, परंतु जब एक स्तंभ दूसरे के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करता प्रतीत होता है, तो ‘संवैधानिक संतुलन’ की कसौटी पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति एवं राज्यपाल द्वारा राज्य विधेयकों पर दी जाने वाली स्वीकृति को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। इस निर्णय की प्रतिक्रिया में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तीखी आपत्ति जताई और इसे ‘कार्यपालिका के अधिकारों पर अतिक्रमण’ करार दिया।

यह लेख इसी संवैधानिक बहस को केंद्र में रखते हुए कार्यपालिका की स्वायत्तता, न्यायिक सक्रियता, संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के संतुलन की खोज करता है।


संवैधानिक पृष्ठभूमि: राष्ट्रपति की विधायी स्वीकृति

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 201 राज्य विधेयकों को राष्ट्रपति के पास स्वीकृति हेतु भेजने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। परंतु इसमें राष्ट्रपति के निर्णय की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है। यही स्थिति राज्यपालों के संदर्भ में भी है, जिसके कारण कई विधेयक वर्षों तक ‘पॉकेट वीटो’ की स्थिति में पड़े रहते हैं, जिससे राज्य सरकारों की विधायी प्रक्रिया बाधित होती है।

तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक याचिका में यह मुद्दा उठाया गया था कि राज्यपाल ने 10 विधेयकों पर वर्षों से कोई निर्णय नहीं लिया। इसी के आलोक में सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया कि राष्ट्रपति को विधेयकों पर तीन माह के भीतर निर्णय लेना होगा, और यदि निर्णय नहीं लिया गया तो इसे न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत लाया जा सकता है।


न्यायिक समीक्षा बनाम कार्यपालिका की स्वायत्तता

उपरोक्त निर्णय पर उपराष्ट्रपति धनखड़ की आपत्ति यह है कि कार्यपालिका की संवैधानिक गरिमा पर न्यायपालिका द्वारा अतिक्रमण किया गया है। उनका तर्क है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे पद विवेकाधीन निर्णय लेते हैं, और इन पर समयबद्ध निर्णय की बाध्यता संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है।

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का रुख यह है कि संविधान में किसी भी संवैधानिक पद को असीमित विवेकाधिकार नहीं दिया गया है, और यदि कोई संवैधानिक अधिकारी विधायिका की प्रक्रिया को बाधित करता है, तो न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक शासन की भावना को पुष्ट करता है।


अनुच्छेद 142 और न्यायिक सक्रियता की बहस

उप-राष्ट्रपति ने विशेष रूप से अनुच्छेद 142 को निशाना बनाते हुए कहा कि यह न्यायपालिका को "न्यायिक मिसाइल" की तरह उपयोग करने का औजार बन गया है। अनुच्छेद 142 न्यायपालिका को "पूर्ण न्याय" सुनिश्चित करने की शक्ति देता है, लेकिन इसकी सीमाओं को लेकर हमेशा से बहस रही है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब कार्यपालिका और विधायिका किसी संवैधानिक या नैतिक दायित्व को निभाने में विफल होती हैं, तब न्यायपालिका ही एकमात्र विकल्प बन जाती है। हालांकि यह भी आवश्यक है कि न्यायिक सक्रियता न्यायिक अतिक्रमण में न बदल जाए।


FIR की असमानता और न्यायपालिका की जवाबदेही पर प्रश्न

धनखड़ ने एक और मुद्दा उठाया—न्यायपालिका की जवाबदेही। उन्होंने एक न्यायाधीश के निवास पर मिली भारी नकदी की जांच में देरी का उदाहरण देते हुए यह प्रश्न उठाया कि क्या न्यायपालिका के लिए अलग नियम हैं? उनका तर्क है कि जब देश के किसी भी नागरिक पर बिना अनुमति FIR दर्ज हो सकती है, तो न्यायाधीशों पर क्यों नहीं?

यह एक गंभीर प्रश्न है, जो न्यायपालिका में आंतरिक जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हालांकि न्यायाधीशों के विरुद्ध कार्यवाही की प्रक्रिया संविधान में प्रत्यक्ष रूप से नहीं दी गई है, लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा के चलते इसके लिए इन-हाउस मैकेनिज्म कार्य करता है। यह आवश्यक है कि इस व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी व जनोन्मुखी बनाया जाए।


संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता

इस पूरे विवाद का केंद्रीय बिंदु यह है कि संवैधानिक संस्थाएं एक-दूसरे पर नियंत्रण रखें, लेकिन अतिक्रमण नहीं करें। कार्यपालिका की स्वायत्तता, विधायिका की संप्रभुता और न्यायपालिका की निगरानी शक्ति—ये तीनों तब तक सार्थक हैं, जब तक संतुलन बना रहे।

  • न्यायपालिका की भूमिका संविधान की व्याख्या और मूल अधिकारों की रक्षा है।
  • कार्यपालिका की भूमिका नीतियों को लागू करना और प्रशासन चलाना है।
  • विधायिका की भूमिका कानून निर्माण है।

जब एक संस्था दूसरी की भूमिका निभाने लगे, तब लोकतंत्र संकट में पड़ जाता है।


निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय संवैधानिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, परंतु उपराष्ट्रपति की चेतावनी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो संस्थानों के बीच संवेदनशील संतुलन की ओर इशारा करती है। दोनों पक्षों की चिंताएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि भारतीय लोकतंत्र को अब संस्थागत उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, और संतुलित शक्तियों की आवश्यकता है।

यह बहस केवल विधेयकों की स्वीकृति तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की दिशा तय करने वाली है।


यह समसामयिक विषय UPSC Mains - GS Paper 2 (Governance, Constitution, Polity) और Essay दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। नीचे इससे संबंधित कुछ संभावित प्रश्न दिए गए हैं:


UPSC Mains – GS Paper 2 संभावित प्रश्न:

  1. “संवैधानिक पदाधिकारियों की स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन ही लोकतंत्र की आत्मा है।” सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय और उपराष्ट्रपति की प्रतिक्रिया के संदर्भ में विवेचना करें।

  2. राष्ट्रपति और राज्यपाल की विधायी स्वीकृति (Assent) पर न्यायिक समीक्षा की क्या सीमाएँ और संभावनाएँ हैं? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के आलोक में चर्चा करें।

  3. धारा 142 और न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) के संदर्भ में उपराष्ट्रपति द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं की समीक्षा करें। क्या यह न्यायपालिका की असीम शक्तियों का उदाहरण है?

  4. “Pocket Veto जैसी अवधारणाएँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित कर सकती हैं।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा करें, विशेष रूप से राज्यपालों की भूमिका को ध्यान में रखते हुए।

  5. संविधान के अनुच्छेद 201 और 143 के तहत राष्ट्रपति की भूमिका को स्पष्ट करते हुए, कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंधों पर चर्चा करें।


Essay के लिए संभावित विषय:

  1. “Institutional Balance is the Essence of Constitutional Democracy.”
  2. “Judicial Review vs Executive Discretion: A Tug of Constitutional Morality.”
  3. “The Role of Judiciary in Strengthening Democratic Accountability.”
  4. “Democracy at Crossroads: Executive Decisions under Judicial Lens.”

पार्ट-2: राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायपालिका पर टिप्पणी: संवैधानिक मर्यादाओं और लोकतांत्रिक संतुलन पर विमर्श— समसामयिक लेख (UPSC GS पेपर 2 / निबंध लेखन हेतु उपयोगी)

भूमिका:

भारत का संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट विभाजन और संतुलन सुनिश्चित करता है। प्रत्येक अंग की अपनी सीमाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित हैं। परंतु हाल ही में राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल द्वारा उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की टिप्पणी पर की गई आलोचना ने इस संतुलन पर एक नई बहस छेड़ दी है।

प्रसंग:

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में न्यायपालिका द्वारा राष्ट्रपति को निर्णय लेने की समयसीमा बताए जाने को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने संकेत दिया कि यह कार्यपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कपिल सिब्बल ने इसे "असंवैधानिक" बताया और कहा कि उन्होंने पहले कभी किसी राज्यसभा अध्यक्ष को इस प्रकार के राजनीतिक बयान देते नहीं देखा।

संवैधानिक दृष्टिकोण:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50 न्यायपालिका की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट को यह अधिकार प्राप्त है कि वे कार्यपालिका या विधायिका के किसी निर्णय की समीक्षा कर सकें यदि वह संविधान के विरुद्ध हो।

राज्यसभा के सभापति का पद एक संवैधानिक पद है, और उनसे अपेक्षित होता है कि वे गैर-पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक रूप से तटस्थ रहें। यदि ऐसे पदों से राजनीतिक टिप्पणी आए तो यह लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित कर सकता है।

संस्थागत गरिमा और मर्यादा का प्रश्न:

किसी भी संवैधानिक पद की गरिमा उसके आचरण और वाणी से निर्धारित होती है। जब ऐसे पदों से सार्वजनिक मंचों पर न्यायपालिका की आलोचना होती है, तो इससे न केवल संस्थागत टकराव की स्थिति बनती है, बल्कि जनता के बीच भ्रम और अविश्वास भी उत्पन्न हो सकता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन की आवश्यकता:

भारत की लोकतांत्रिक सफलता का आधार संवैधानिक संस्थाओं के बीच परस्पर सम्मान और संतुलन है। यदि कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका – कोई भी अंग अपनी सीमाओं से आगे बढ़े, तो लोकतांत्रिक संतुलन में विकृति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में, संवाद और संवैधानिक मूल्यों का पालन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

उपराष्ट्रपति द्वारा की गई टिप्पणी और उस पर कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या संवैधानिक पदों की गरिमा एवं संस्थागत संतुलन सुरक्षित हैं? भारत जैसे लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच स्वस्थ संबंध ही राष्ट्र की स्थायित्व की गारंटी हैं। अतः प्रत्येक संवैधानिक पदधारी को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हुए, मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।



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