Skip to main content

MENU👈

Show more

Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

  राजनीति शास्त्र (Polity & Political Science) की तैयारी को बनाएं आसान और सटीक! क्या आप UPSC, State PCS, UGC NET, PGT या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? सही मार्गदर्शन और बेहतरीन स्टडी मटेरियल के लिए विजिट करें: 🌐 www.politypoint.com Polity Point ही क्यों चुनें? विस्तृत एवं सरल नोट्स: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था और राजनीतिक सिद्धांत की आसान भाषा में समझ। परीक्षा-उन्मुख सामग्री: पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) का विश्लेषण और ट्रेंड के अनुसार स्टडी मटेरियल। क्विज़ और टेस्ट सीरीज़: अपनी तैयारी का सही आकलन करने के लिए नियमित अभ्यास प्रश्न। करंट अफेयर्स से जुड़ाव: राजव्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का सटीक कवरेज। 🎯 आज ही अपनी सफलता की नींव रखें! अभ्यास शुरू करने और अपनी तैयारी को अगली स्तर पर ले जाने के लिए अभी वेबसाइट पर जाएँ: 👉 www.politypoint.com (स्मार्ट स्टडी करें, सफलता हासिल करें!)

Iran Protests 2025–2026: Economic Crisis, Currency Crash and Rising Public Unrest

2025–2026 ईरान विरोध प्रदर्शन: आर्थिक संकट से उपजी जन-आक्रोश की नई लहर

प्रस्तावना

दिसंबर 2025 के उत्तरार्ध में शुरू होकर जनवरी 2026 तक जारी रहने वाले ईरान के विरोध प्रदर्शन केवल कुछ दिनों की असंतोष-लहर नहीं थे, बल्कि वे उस गहरे आर्थिक और सामाजिक संघर्ष का विस्फोट थे जो वर्षों से भीतर-ही-भीतर पनप रहा था। राजधानी तेहरान के बाजारों में दुकानदारों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही छात्रों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग तक फैल गया। यह उभार 2022 के महसा अमीनी विरोधों के बाद सबसे बड़ा और सबसे व्यापक जन-आंदोलन माना जा रहा है, जहाँ आर्थिक पीड़ा राजनीतिक अविश्वास में बदलती हुई दिखाई दी।


आर्थिक संकट: असंतोष की जड़

ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से प्रतिबंधों, सीमित निवेश, तेल-राजस्व की अनिश्चितता और संस्थागत अक्षमताओं का बोझ ढो रही है। 2025 में इज़रायल के साथ 12-दिवसीय संघर्ष, वैश्विक कूटनीतिक दबाव और ऊर्जा व्यापार में गिरावट ने स्थिति को और नाजुक बना दिया।

दिसंबर 2025 के अंत तक ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से गिरकर लगभग 1.42–1.45 मिलियन रियाल प्रति डॉलर के स्तर पर पहुँच गया। यह उस दौर से कई गुना खराब स्थिति को दर्शाता है जब 2022 में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के कार्यभार संभालने के समय रियाल लगभग 4.30 लाख प्रति डॉलर के आसपास था।

तेज़ी से बढ़ती महँगाई ने आम लोगों की जिंदगी को गहराई से प्रभावित किया। दिसंबर 2025 में मुद्रास्फीति 42% के पार पहुँच गई — खाद्य पदार्थों, ईंधन, दवाई और आवश्यक वस्तुओं की लागत सामान्य परिवारों की पहुँच से बाहर जाने लगी। सरकार द्वारा प्रस्तुत 2026 के बजट में करों में 62% वृद्धि और सीमित तेल-राजस्व का अनुमान जनता के आक्रोश को और भड़काने वाला साबित हुआ।

यह स्पष्ट हो चुका था कि समस्या केवल आर्थिक नहीं रही — यह सामाजिक असमानता, प्रशासनिक अविश्वसनीयता और शासन-व्यवस्था से गहरे असंतोष का प्रश्न बन चुकी थी।


प्रदर्शन का विकास: बाज़ार से विश्वविद्यालय तक

28 दिसंबर 2025 को तेहरान के जुमहूरी क्षेत्र में मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर विरोध की शुरुआत की। यह प्रतीकात्मक कदम जल्द ही सामूहिक स्वरूप ले बैठा। अगले ही दिन तेहरान के ग्रैंड बाज़ार के व्यापारी भी इसमें शामिल हो गए — वही बाज़ार जिसे कभी इस्लामी क्रांति का सामाजिक आधार माना जाता था।

सड़कों पर गूँजते नारे आंदोलन के चरित्र को स्पष्ट कर रहे थे —

“डरो मत, हम सब एक साथ हैं”
“आजादी”
“तानाशाह मुर्दाबाद”

चंद दिनों में यह उभार तेहरान की सीमाएँ लाँघकर इस्फहान, शिराज और मशहद जैसे प्रमुख शहरों तक फैल गया। विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों ने विरोध-सभा आयोजित कीं, अभिव्यक्ति की मांग और आर्थिक सुधार की माँग को खुलकर सामने रखा।

कुछ स्थानों पर प्रदर्शन उग्र भी हुए — परन्तु अधिकांश जगहों पर यह आंदोलन संगठित, शांतिपूर्ण और प्रतिरोध-आधारित नागरिक भागीदारी का रूप लिए रहा।


सरकारी प्रतिक्रिया: नियंत्रण और संवाद के बीच संतुलन

सरकार ने प्रारंभिक चरण में दंगा-नियंत्रण बल, आँसू गैस और गिरफ्तारियों का सहारा लिया, परंतु व्यापक दमन से बचने का प्रयास भी दिखाई दिया। राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने विरोधियों के साथ संवाद की बात कही और मुद्रा-विनियोजन संकट के मद्देनज़र केंद्रीय बैंक के गवर्नर मोहम्मद रेज़ा फारजिन का इस्तीफ़ा स्वीकार करते हुए नए गवर्नर की नियुक्ति की।

31 दिसंबर को कई प्रांतों में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया — उद्देश्य था भीड़ के जमाव को कम करना और तनाव घटाना।

फिर भी विरोध की धारा यह संकेत दे रही थी कि केवल प्रशासनिक कदम पर्याप्त नहीं होंगे; नागरिकों को विश्वसनीय आर्थिक रोडमैप और संरचनात्मक सुधारों का भरोसा चाहिए।


राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: सत्ता-संरचना पर प्रश्नचिन्ह

शुरुआत आर्थिक दर्द से हुई, लेकिन आंदोलन धीरे-धीरे शासन-व्यवस्था के प्रति असंतोष के व्यापक विमर्श में बदल गया।
विशेषतः व्यापारी वर्ग की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण थी — वही वर्ग जो दशकों से स्थिरता और वैधता का आधार माना जाता था।

छात्र और युवा पीढ़ी, जिनकी भागीदारी 2022 के विरोधों का प्रमुख आधार रही, एक बार फिर सड़कों पर थी। इससे स्पष्ट संकेत गया कि:

  • आर्थिक संकट ने राजनीतिक वैधता को चुनौती दी है
  • सामाजिक अनुबंध (State–Citizen trust) दरक रहा है
  • पीढ़ीगत आकांक्षाएँ बदल चुकी हैं

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाएँ भी चर्चा में रहीं, हालांकि ईरानी नेतृत्व इसे बाहरी हस्तक्षेप के आख्यान के रूप में प्रस्तुत करता रहा।


भविष्य की दिशाएँ: संकट, संभावना और पुनर्निर्माण

जनवरी 2026 तक आंदोलन यह स्पष्ट संदेश दे चुका है कि ईरान की समस्या केवल मुद्रा अवमूल्यन या महँगाई का सांख्यिकीय प्रश्न नहीं — यह रोज़गार, गरिमा, समानता और राजनीतिक सहभागिता का प्रश्न है।

यदि सरकार:

  • पारदर्शी आर्थिक सुधार
  • सामाजिक सुरक्षा उपाय
  • संस्थागत उत्तरदायित्व
  • और वास्तविक संवाद

की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाती, तो यह असंतोष लंबे समय तक simmering unrest के रूप में कायम रह सकता है।

यह स्थिति न केवल ईरान के आंतरिक स्थायित्व के लिए, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और वैश्विक राजनीति के लिए भी गहरे निहितार्थ रखती है।


निष्कर्ष

2025–2026 के ईरानी विरोध प्रदर्शन उस ऐतिहासिक क्षण की तरह हैं, जहाँ आर्थिक दबाव सामाजिक पीड़ा में और सामाजिक पीड़ा राजनीतिक प्रश्नों में बदल जाती है। यह आंदोलन एक चेतावनी भी है — कि यदि शासन संरचनाएँ समय के साथ स्वयं को रूपांतरित नहीं करतीं, तो परिवर्तन सड़क से माँगा जाता है।


With Reuters Inputs 

Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

  राजनीति शास्त्र (Polity & Political Science) की तैयारी को बनाएं आसान और सटीक! क्या आप UPSC, State PCS, UGC NET, PGT या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? सही मार्गदर्शन और बेहतरीन स्टडी मटेरियल के लिए विजिट करें: 🌐 www.politypoint.com Polity Point ही क्यों चुनें? विस्तृत एवं सरल नोट्स: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था और राजनीतिक सिद्धांत की आसान भाषा में समझ। परीक्षा-उन्मुख सामग्री: पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) का विश्लेषण और ट्रेंड के अनुसार स्टडी मटेरियल। क्विज़ और टेस्ट सीरीज़: अपनी तैयारी का सही आकलन करने के लिए नियमित अभ्यास प्रश्न। करंट अफेयर्स से जुड़ाव: राजव्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का सटीक कवरेज। 🎯 आज ही अपनी सफलता की नींव रखें! अभ्यास शुरू करने और अपनी तैयारी को अगली स्तर पर ले जाने के लिए अभी वेबसाइट पर जाएँ: 👉 www.politypoint.com (स्मार्ट स्टडी करें, सफलता हासिल करें!)

चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध: टैरिफ बढ़ोतरी पर चीन का जवाबी वार

चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध की नई लहर — वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी हाल ही में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध एक बार फिर तेज़ हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा चीनी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाने के कदम का चीन ने तीखा जवाब दिया है — टैरिफ में बढ़ोतरी, निर्यात नियंत्रण, और अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ प्रतिरोधात्मक कार्रवाई के रूप में। यह टकराव केवल दो वैश्विक शक्तियों के बीच का आर्थिक संघर्ष नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी भी है। चीन का जवाब—कूटनीतिक संयम से व्यावसायिक आक्रामकता तक चीन ने अमेरिकी LNG, कोयला, और वाहनों पर टैरिफ लगाकर संकेत दिया है कि वह अपने घरेलू बाज़ार की रक्षा के लिए तैयार है। साथ ही, 'अविश्वसनीय इकाई' सूची और गूगल जैसी कंपनियों की जांच यह दर्शाती है कि चीन अब केवल जवाब देने की मुद्रा में नहीं, बल्कि अमेरिका के कॉर्पोरेट हितों पर सीधा वार करने की नीति पर काम कर रहा है। अमेरिका की रणनीति—चुनावी राजनीति या दीर्घकालिक नीति? यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह टैरिफ नीति राष्ट्रपति चुनावों की पृष्ठभू...

अमेरिकी जन्मजात नागरिकता विवाद

  संवैधानिक मूल्यों बनाम कार्यकारी आदेश - जन्मजात नागरिकता पर नया विवाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जन्मजात नागरिकता (Birthright Citizenship) और 'बर्थ टूरिज्म' (Birth Tourism) को सीमित करने के उद्देश्य से दो नए कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर करना अमेरिकी संविधान और कार्यपालिका के बीच जारी एक गहरे संवैधानिक और कानूनी संघर्ष का प्रतीक है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके पिछले व्यापक आदेश को असंवैधानिक करार दिए जाने के बावजूद, ट्रम्प प्रशासन द्वारा उठाया गया यह नया कदम राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोन से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। Click here for Podcast संविधान की आत्मा और चौदहवां संशोधन अमेरिकी संविधान का चौदहवां संशोधन (14th Amendment), जो 1868 में गृहयुद्ध के बाद लागू किया गया था, स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि अमरीका में पैदा हुआ या प्राकृतिक रूप से नागरिक बना हर व्यक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका का नागरिक है। ऐतिहासिक रूप से इसका मुख्य उद्देश्य दास प्रथा के उन्मूलन के बाद पूर्व दासों और उनके बच्चों को नागरिकता का पूर्ण अधिकार ...

Supreme Court’s Historic Opinion (2025): Clarifying Governors’ Powers, Legislative Process, and the Protection of India’s Federal Balance

सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक मत : राज्यपालों की शक्तियाँ, संघीय संतुलन और संवैधानिक मर्यादा का न्यायिक पुनर्पुष्टि प्रस्तावना भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति-संतुलन का ऐसा तंत्र निर्मित करता है, जहाँ सहयोग, संवाद और संवैधानिक मर्यादा सर्वोपरि हैं। इसी को “सहकारी संघवाद” कहा जाता है। परंतु जब राज्यपाल—जो स्वयं केंद्र के नामित प्रतिनिधि होते हैं—विधायी प्रक्रिया में बिना उचित कारण हस्तक्षेप या लंबी देरी करते हैं, तो यह संतुलन डगमगाने लगता है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में यही घर्षण सामने आया, जिससे यह प्रश्न उठा कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की सीमा क्या है, और न्यायपालिका की भूमिका कहाँ तक है? 20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की पाँच-सदस्यीय संविधान पीठ ने इन्हीं जटिल प्रश्नों पर राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर अपना मत दिया। यह मत न केवल संवैधानिक व्याख्या का नया मानदंड है, बल्कि संघवाद और न्यायिक संयम के सिद्धांतों को भी सुदृढ़ करता है। विवाद का उद्भव : संघवाद की परीक्षा तमिलनाडु, केरल, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे कई र...

The Mysterious Death of Zubeen Garg: Tragedy of Assam’s Cultural Icon and Questions Over Administrative Negligence

जुबिन गर्ग: असम की आत्मा की आवाज़, जिसकी मौत ने कई सवाल छोड़े पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक हृदय में जब कोई सुर टूटता है, तो वह केवल एक आवाज़ नहीं जाती—वह एक युग की भावनाओं को भी मौन कर देता है। जुबिन गर्ग की अचानक मृत्यु ने असम ही नहीं, पूरे उत्तर-पूर्व को भीतर तक झकझोर दिया है। “या अली” की गूंज, “मोमोर चोखोटे” की मिठास और असमिया अस्मिता के प्रतीक उस स्वर के साथ जाने वाला यह अध्याय अब रहस्यमय सवालों से घिरा हुआ है। 🎵 संगीत से सामाजिक चेतना तक का सफर 1972 में मेघालय के तुरा में जन्मे जुबिन गर्ग ने बाल्यावस्था में ही संगीत को जीवन बना लिया था। असमिया संगीत में उन्होंने जो आत्मा फूंकी, वह केवल कला नहीं थी—वह असम की सांस्कृतिक चेतना थी। हिंदी, असमिया, बंगाली, नेपाली, तमिल—हर भाषा में उन्होंने अपनी रचनात्मक पहचान छोड़ी। लेकिन उन्हें असम का ‘जननायक’ उस समय कहा गया जब उन्होंने अपने गीतों और मंचों से सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक अधिकारों की आवाज़ उठाई। 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ असम में जब जनता सड़कों पर थी, तब जुबिन गर्ग ने भी अपने संगीत से विरोध को स्वर...

Manipur GST Second Amendment Bill 2025: Impact on India’s Federal Fiscal Coordination

मणिपुर जीएसटी द्वितीय संशोधन विधेयक 2025: भारत के संघीय राजकोषीय समन्वय पर प्रभाव सार भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था, 2017 में लागू होने के बाद से, एक विभाजित अप्रत्यक्ष कर प्रणाली से एकीकृत, पारदर्शी और सहकारी संघवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रही है। हाल में 1 दिसंबर 2025 को लोकसभा द्वारा पारित मणिपुर वस्तु एवं सेवा कर (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2025 यह दर्शाता है कि राज्य-स्तरीय कानूनों को केंद्र के साथ कितनी निरंतरता से समन्वित रखना आवश्यक है। यह विधेयक 7 अक्टूबर 2025 को लागू अध्यादेश का स्थान लेता है, जो 56वीं जीएसटी परिषद द्वारा तय दर-तर्कसंगतिकरण (rate rationalization) को लागू करने हेतु जारी किया गया था। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन, शीतकालीन सत्र की जटिल संसदीय पृष्ठभूमि और परोक्ष कर सुधारों के व्यापक संदर्भ—सभी मिलकर इस विधायी कार्रवाई को संघवाद, कार्यपालिका-विधायिका संतुलन तथा राजकोषीय संघवाद की दृष्टि से विश्लेषण योग्य बनाते हैं। यह लेख विधेयक की प्रमुख विशेषताओं, इसके विधायी मार्ग, तथा भारत के कर-परिदृश्य पर इसके प्रभावों का अध्ययन करता है। 1. प्रस्तावना भार...

​5 Years of Taliban Rule: Inside Afghanistan’s Silent Humanitarian Crisis

ध्वज के साए में पाँच वर्ष: अफ़ग़ानिस्तान के नए अध्याय का दोहरा सच काबुल की धूल भरी सड़कों पर, यह शहर एक गहरे अंतरद्वंद्व को जी रहा है। एक तरफ देखें तो जीत की नुमाइश करती एक सत्ता दिखाई देती है: हवा में लहराते विशाल बैनर, करीने से आयोजित सैन्य परेड और एक महाशक्ति के जाने के बाद पीछे छूटे घातक हथियारों का भयानक प्रभाव। दूसरी तरफ देखें तो ज़िंदा रहने की एक शांत, हताश जंग नज़र आती है। तालिबान की सत्ता में वापसी के पाँच साल बाद, नेतृत्व का "भव्य जश्न" अफ़ग़ानिस्तान की जनता पर टूटे मानवीय संकट से बिल्कुल अलग थलग खड़ा है। एक विश्लेषक के लिए सवाल अब यह नहीं रहा कि तालिबान ने सत्ता कैसे हासिल की, बल्कि सवाल यह है कि वे एक ऐसे देश पर शासन कैसे चलाएंगे जहाँ "सफलता" का दायरा सैन्य परेडों तक सीमित है, जबकि जनता एक अभूतपूर्व आर्थिक तबाही का सामना कर रही है। "स्थिरता" और अस्तित्व का विरोधाभास बीते आधे दशक को लेकर तालिबान का यही दावा रहा है कि उन्होंने देश को पूरी तरह बहाल कर दिया है। वे दशकों लंबे गृहयुद्ध के खात्मे और एक "मजबूत केंद्रीय सरकार" की स्थापना को अप...

Supreme Court Verdict on Sexual Assault: Pajama String Act Constitutes Attempt to Rape, Allahabad HC Order Overturned

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘पायजामा की डोरी खोलना बलात्कार का प्रयास है’ — न्यायिक संवेदनशीलता की पुनर्स्थापना हाल ही में  Supreme Court of India ने यौन अपराधों से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और नैतिक रूप से चुनौतीपूर्ण मामले में ऐसा फैसला दिया है, जिसने न केवल Allahabad High Court  के एक विवादास्पद आदेश को पलट दिया, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टि और पीड़ित-केंद्रित सोच को भी नए सिरे से स्थापित किया। यह निर्णय केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि न्यायिक विवेक, नैतिक जिम्मेदारी और समाज के प्रति न्यायपालिका की जवाबदेही का सशक्त उदाहरण है। 1. मामले की पृष्ठभूमि: जब अपराध को ‘तैयारी’ कह दिया गया उत्तर प्रदेश की इस घटना में एक 11 वर्षीय नाबालिग बच्ची के साथ दो आरोपियों द्वारा अत्यंत घृणित कृत्य किए गए— बच्ची के स्तनों को पकड़ना उसकी पायजामा की डोरी खोलना उसे जबरन कल्वर्ट (पुलिया) के नीचे खींचने का प्रयास ट्रायल कोर्ट ने इस आचरण को POCSO अधिनियम के अंतर्गत बलात्कार का प्रयास मानते हुए गंभीर धाराओं में संज्ञान लिया। लेकिन 17 मार्च ...

A Calculated Strike Against India's Pluralism: Lessons from the Pahalgam Tragedy

भारत की बहुलतावादी आत्मा पर सुनियोजित प्रहार : पहलगाम त्रासदी से सीख जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हालिया आतंकी हमला महज हिंसा की एक सामान्य घटना नहीं थी। यह भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान पर किया गया एक सुनियोजित और गहरा प्रहार था — एक ऐसा प्रयास जो सामाजिक अविश्वास को बढ़ाने, सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने और भारत की बहुलतावादी छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से किया गया। 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या — जिनमें से कई को धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया — इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आतंक का उद्देश्य केवल जानमाल का नुकसान नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक संतुलन को अस्थिर करना भी था। यह त्रासदी न केवल मानवीय दृष्टिकोण से अत्यंत दुखद है, बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक, राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ भी हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि इस घटना के पीछे की गहरी परतों को समझा जाए और भविष्य के लिए एक सशक्त रणनीति तैयार की जाए। सामाजिक ताने-बाने पर हमला धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाना आतंकवाद की पुरानी रणनीति रही है। 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन ने यह दिखा दिया था कि कैसे सांप्रदा...