भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता: “सभी सौदों की माँ” की ओर एक ऐतिहासिक कदम
परिचय
दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के 2026 सत्र में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन का एक वाक्य वैश्विक मीडिया की सुर्खियों में छा गया—उन्होंने भारत–यूरोपीय संघ (EU) के प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी “सभी सौदों की माँ” कहा। यह कोई साधारण राजनयिक अतिशयोक्ति नहीं थी, बल्कि उस विशाल आर्थिक और रणनीतिक संभावना की ओर संकेत था, जो इस समझौते के जरिए साकार हो सकती है।
यह समझौता लगभग 2 अरब लोगों के बाजार को जोड़ देगा और वैश्विक जीडीपी के लगभग एक चौथाई हिस्से को एक साझा व्यापारिक ढांचे में समेटेगा। एक ओर भारत, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है, और दूसरी ओर यूरोपीय संघ, जो तकनीक, विनिर्माण, हरित ऊर्जा और उच्च मानकों वाले नियामक ढांचे के लिए जाना जाता है—इन दोनों का मिलन वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नया संतुलन पैदा कर सकता है।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अस्थिर दौर से गुजर रही है—संरक्षणवाद बढ़ रहा है, भू-राजनीतिक तनाव गहराते जा रहे हैं और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा नए रूप ले रही है। ऐसे में भारत–EU FTA केवल एक आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक वक्तव्य भी है।
वर्षों से लंबित, अब निर्णायक मोड़ पर
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी। शुरुआती वर्षों में उत्साह तो था, लेकिन कृषि, डेयरी, ऑटोमोबाइल, डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार और श्रम–पर्यावरण मानकों जैसे मुद्दों पर मतभेद इतने गहरे थे कि 2013 के बाद वार्ताएं लगभग ठप हो गईं।
करीब एक दशक के ठहराव के बाद 2022 में दोनों पक्षों ने फिर से बातचीत शुरू की। इसके पीछे कई कारण थे—कोविड के बाद टूटी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं, चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की यूरोपीय इच्छा, और भारत की बढ़ती आर्थिक–राजनीतिक हैसियत।
अब 2026 में यह प्रक्रिया निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। संकेत मिल रहे हैं कि गणतंत्र दिवस समारोह और भारत–EU शिखर सम्मेलन से पहले या उसके आसपास इस समझौते की घोषणा हो सकती है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी इसे “मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स” कहा है, जो सरकार की गंभीरता को दर्शाता है।
समझौते का आर्थिक महत्व
यह मुक्त व्यापार समझौता केवल टैरिफ घटाने तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें चार बड़े स्तंभ होंगे—माल (goods), सेवाएं (services), निवेश (investment) और नियामक सहयोग (regulatory cooperation)।
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माल और टैरिफ में कमी
भारत के लिए यह समझौता कपड़ा, चमड़ा, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, आईटी हार्डवेयर और कृषि-प्रसंस्कृत वस्तुओं को यूरोपीय बाजार में सस्ते और प्रतिस्पर्धी ढंग से पहुंचाने का रास्ता खोलेगा। वहीं, यूरोप को अपने ऑटोमोबाइल, मशीनरी, लग्जरी सामान और हरित तकनीक को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी। -
सेवाओं में अवसर
भारत की आईटी, फिनटेक, कंसल्टिंग और प्रोफेशनल सेवाएं पहले से ही यूरोप में मौजूद हैं, लेकिन यह समझौता वीजा, पेशेवर मान्यता और डेटा फ्लो से जुड़े नियमों को आसान बना सकता है। इससे भारतीय पेशेवरों और स्टार्टअप्स को बड़ा लाभ होगा। -
निवेश और तकनीक हस्तांतरण
यूरोपीय कंपनियां भारत में हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, बायोटेक और उन्नत विनिर्माण में निवेश बढ़ा सकती हैं। इससे “मेक इन इंडिया” और “मेक फॉर द वर्ल्ड” दोनों को बल मिलेगा। -
नियामक सहयोग
यूरोपीय संघ अपने कड़े पर्यावरण, श्रम और उपभोक्ता सुरक्षा मानकों के लिए जाना जाता है। इन मानकों के साथ तालमेल भारत को वैश्विक बाजार में अधिक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी बना सकता है।
भू-राजनीतिक संदर्भ: ट्रंप, ग्रीनलैंड और वैश्विक अनिश्चितता
इस समझौते का महत्व तब और बढ़ जाता है जब हम इसे मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में देखते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक बयानबाजी और यूरोप पर संभावित टैरिफ की धमकियों ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है।
ट्रंप का यह रुख दर्शाता है कि अमेरिका फिर से संरक्षणवाद और एकतरफा फैसलों की ओर झुक रहा है। ऐसे में यूरोप के लिए भारत जैसा बड़ा, लोकतांत्रिक और उभरता बाजार रणनीतिक विकल्प बन जाता है। वहीं भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा के बीच अपने विकल्पों को विविध बनाए।
यानी भारत–EU FTA केवल व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक नया ध्रुव तैयार करने की कोशिश है—जहां सहयोग, नियम-आधारित व्यवस्था और बहुपक्षवाद को प्राथमिकता दी जाए।
“क्या हम राजाओं के युग में लौट आए हैं?”
विदेश नीति विशेषज्ञ सी. राजा मोहन का यह सवाल केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि उस वैश्विक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है, जहां व्यक्तिगत नेताओं की इच्छाएं संस्थागत प्रक्रियाओं पर भारी पड़ने लगी हैं।
ट्रंप जैसे नेता बहुपक्षीय संस्थाओं को कमजोर करते हैं और व्यक्तिगत सौदेबाजी को प्राथमिकता देते हैं। इससे वैश्विक व्यवस्था अस्थिर और अनिश्चित होती है। इसके विपरीत भारत–EU जैसा समझौता नियम-आधारित, संस्थागत और दीर्घकालिक सहयोग का उदाहरण है।
यह टकराव दो दृष्टिकोणों का है—एक ओर “व्यक्ति-केन्द्रित शक्ति”, दूसरी ओर “संस्था-केन्द्रित सहयोग”। भारत और यूरोप का साथ आना इस दूसरे रास्ते को मजबूत करता है।
भारत के लिए रणनीतिक अवसर
भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपनाता आया है—यानी किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर न रहना। भारत–EU FTA इस नीति को नया आयाम देता है।
इससे भारत को:
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक केंद्रीय भूमिका मिलेगी,
- तकनीक और निवेश का नया स्रोत मिलेगा,
- और अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन साधने का अवसर मिलेगा।
साथ ही, यह समझौता भारत को हरित अर्थव्यवस्था और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य में एक अहम खिलाड़ी बना सकता है।
निष्कर्ष: सच में “मदर ऑफ ऑल डील्स”?
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता अगर अपने मौजूदा स्वरूप में लागू होता है, तो यह निस्संदेह केवल दो अर्थव्यवस्थाओं का सौदा नहीं होगा। यह उस सोच का प्रतीक होगा, जिसमें सहयोग को टकराव से ऊपर रखा जाता है, और नियमों को मनमानी पर।
एक ओर दुनिया में व्यक्तिगत शक्ति और संरक्षणवाद की प्रवृत्ति दिख रही है, वहीं दूसरी ओर भारत–EU जैसी पहलें बताती हैं कि बहुपक्षवाद अभी मरा नहीं है। दावोस 2026 इसी संघर्ष का मंच है—क्या दुनिया “राजाओं के युग” की ओर जाएगी या सहयोग और संस्थाओं के युग को आगे बढ़ाएगी?
भारत के लिए यह समझौता केवल आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका को परिभाषित करने वाला कदम है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो “मदर ऑफ ऑल डील्स” सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक नया अध्याय बन सकता है।
With The Indian Express Inputs
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