G7 से आगे: क्यों 2026 का नई दिल्ली BRICS शिखर सम्मेलन वैश्विक राजनीति का नया अध्याय है
एक समय था जब विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा लगभग पूरी तरह पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित की जाती थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था और G7 जैसे मंच वैश्विक निर्णयों के केंद्र थे। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक तक आते-आते शक्ति संतुलन में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अब केवल नियमों का पालन करने वाली नहीं, बल्कि उन्हें बनाने में भी हिस्सेदारी चाहती हैं।
इसी परिवर्तन का सबसे सशक्त प्रतीक 2026 का नई दिल्ली BRICS शिखर सम्मेलन माना जा रहा है। यह सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि उस नई विश्व व्यवस्था की झलक है जिसमें वैश्विक दक्षिण (Global South) अपनी आवाज़ को अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित करना चाहता है। BRICS देशों ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों के बढ़े हुए प्रतिनिधित्व और अधिक संतुलित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।
ऊर्जा राजनीति का नया केंद्र
BRICS के विस्तार ने इसे केवल एक आर्थिक समूह नहीं रहने दिया है। रूस, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादकों की भागीदारी ने इसे विश्व की सबसे प्रभावशाली ऊर्जा साझेदारियों में बदल दिया है। आज जब मध्य-पूर्व संघर्षों, समुद्री व्यापार मार्गों की असुरक्षा और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से जूझ रहा है, तब BRICS देशों के बीच सहयोग एक वैकल्पिक ऊर्जा सुरक्षा ढाँचा प्रस्तुत करता है।
इस सहयोग ने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं को भी नई गति दी है। ये परियोजनाएँ भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया के बीच व्यापार एवं ऊर्जा संपर्क को मजबूत करती हैं तथा पश्चिमी नियंत्रित समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने की क्षमता रखती हैं।
भारत और चीन: प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग
BRICS की सबसे रोचक और जटिल कहानी भारत और चीन के संबंधों में दिखाई देती है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद है, फिर भी वैश्विक मंचों पर सहयोग की एक व्यावहारिक समझ दिखाई देती है।
चीन विश्व का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र है, लेकिन उसे घरेलू आर्थिक चुनौतियों और वृद्ध होती जनसंख्या का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर भारत विश्व की सबसे युवा बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार और मजबूत सेवा क्षेत्र के कारण वैश्विक निवेशकों का आकर्षण बन रहा है। ऐसी स्थिति में दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का यह मिश्रण BRICS की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी "सॉफ्ट पावर" है। भारतीय प्रवासी समुदाय, सूचना प्रौद्योगिकी, योग, बॉलीवुड और लोकतांत्रिक छवि ने भारत को वैश्विक स्तर पर विशेष विश्वसनीयता प्रदान की है। वहीं चीन अपनी औद्योगिक क्षमता और निर्यात शक्ति के कारण विश्व अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।
डॉलर प्रभुत्व को चुनौती
BRICS की सबसे चर्चित पहलों में से एक है डी-डॉलराइजेशन अर्थात वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना। सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ विकसित करने और पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क पर निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
इसी संदर्भ में "BRICS Pay" जैसी अवधारणाएँ सामने आई हैं, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय भुगतान को अधिक स्वतंत्र और बहुपक्षीय बनाना है। हालांकि यह प्रक्रिया आसान नहीं है। BRICS देशों के भीतर भी मुद्रा नेतृत्व को लेकर मतभेद मौजूद हैं। भारत स्पष्ट रूप से किसी युआन-प्रधान व्यवस्था का समर्थन नहीं करता और रुपये तथा UPI आधारित भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देना चाहता है। यह दर्शाता है कि भारत डॉलर के विकल्प की तलाश तो कर रहा है, लेकिन किसी नए आर्थिक प्रभुत्व को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक: वैकल्पिक वित्तीय ढाँचा
BRICS का न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) इस उभरती व्यवस्था का वित्तीय आधार बनता जा रहा है। शंघाई स्थित यह बैंक विकासशील देशों को आधारभूत संरचना और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे IMF और विश्व बैंक के विकल्प के रूप में देखा जाता है, जहाँ विकासशील देशों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
भारत की अनूठी भूमिका: एक "Bridging Power"
2026 शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत की भूमिका है। भारत उन कुछ देशों में शामिल है जो एक साथ कई वैश्विक मंचों पर प्रभावी उपस्थिति रखते हैं। वह QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ है, वहीं BRICS और SCO जैसे मंचों में रूस और चीन के साथ भी सहयोग करता है।
यही कारण है कि भारत को अक्सर "Bridging Power" अर्थात पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के बीच सेतु के रूप में देखा जाता है। भारत की विदेश नीति का मूल आधार "Strategic Autonomy" है, जिसके तहत वह राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है, न कि किसी एक शक्ति समूह के प्रभाव में।
भारत की कोशिश है कि BRICS एक "Non-West" मंच बने, लेकिन "Anti-West" मंच न बने। वह वैश्विक संस्थाओं में सुधार की वकालत करता है, परंतु पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध भी बनाए रखना चाहता है।
क्या बहुध्रुवीय विश्व का उदय हो चुका है?
आज BRICS विश्व की लगभग 45 प्रतिशत आबादी और वैश्विक GDP (PPP) के लगभग 35 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
यह आँकड़े संकेत देते हैं कि वैश्विक शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे अटलांटिक क्षेत्र से इंडो-पैसिफिक और वैश्विक दक्षिण की ओर स्थानांतरित हो रहा है। नई दिल्ली BRICS शिखर सम्मेलन इसी ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है।
फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। भारत-चीन प्रतिस्पर्धा, सदस्य देशों के भिन्न राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय संघर्ष और आर्थिक असमानताएँ BRICS की एकजुटता की परीक्षा लेंगी।
निष्कर्ष
2026 का नई दिल्ली BRICS शिखर सम्मेलन केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि बदलते हुए वैश्विक शक्ति-संतुलन का प्रतीक है। यह उस विश्व की घोषणा है जहाँ उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अधिक प्रतिनिधित्व, अधिक न्यायसंगत वैश्विक शासन और अधिक संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मांग कर रही हैं।
हालाँकि यह यात्रा आसान नहीं होगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि एकध्रुवीय विश्व की जगह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय अब केवल संभावना नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वास्तविकता है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि BRICS वैश्विक दक्षिण के सपनों को नई दिशा देता है या आंतरिक विरोधाभासों के कारण उसकी गति सीमित हो जाती है। भारत, इस परिवर्तन के केंद्र में खड़ा होकर, शायद इस नए विश्व की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनने जा रहा है।
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