ट्रम्प की टैरिफ नीति: भारत के लिए नया आर्थिक संकट या केवल परीक्षा की घड़ी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति ने वैश्विक व्यापार को नया मोड़ दे दिया है। भारत, जो अमेरिका का एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार माना जाता रहा है, अब 50 प्रतिशत टैरिफ की चपेट में फंस गया है। यह कदम न केवल द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालेगा। ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि भारत का रूस से सस्ता तेल खरीदना यूक्रेन युद्ध को 'ईंधन' दे रहा है, लेकिन यह दावा कई सवाल खड़े करता है—क्यों केवल भारत को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि चीन जैसे अन्य बड़े आयातक बच गए हैं? यह टैरिफ युद्ध भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक कठिन परीक्षा है, जहां एक ओर निर्यात पर संकट मंडरा रहा है, वहीं दूसरी ओर आत्मनिर्भरता की राहें खुल रही हैं।
ट्रम्प का यह फैसला अप्रत्याशित नहीं है। अप्रैल 2025 में उन्होंने 'मुक्ति दिवस' घोषित कर वैश्विक आयात पर 10 प्रतिशत बेसलाइन टैरिफ लगाया था, जिसे बाद में देश-विशेष दरों में बदल दिया गया। भारत पर पहले 25 प्रतिशत टैरिफ 7 अगस्त से लागू हो चुका था, जो अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करने का हिस्सा था। लेकिन 6 अगस्त को जारी एक्जीक्यूटिव ऑर्डर ने इसे दोगुना कर 50 प्रतिशत कर दिया, जिसमें 25 प्रतिशत 'दंड' रूस से तेल खरीदने के लिए है। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, क्योंकि भारत का रूस से तेल आयात (2024-25 में 1.75 मिलियन बैरल प्रतिदिन) मॉस्को की युद्ध मशीनरी को मजबूत कर रहा है। लेकिन भारत का विदेश मंत्रालय इसे 'अनुचित, असंगत और अविवेकपूर्ण' बता चुका है। मंत्रालय ने कहा कि अन्य देश भी रूसी तेल खरीद रहे हैं, फिर भारत को क्यों सजा? यह दोहरा मापदंड वैश्विक व्यापार के नियमों—जैसे डब्ल्यूटीओ—का उल्लंघन करता प्रतीत होता है।
इस टैरिफ का भारत पर तत्काल प्रभाव स्पष्ट है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, जहां 2024-25 में 86.5 अरब डॉलर का सामान भेजा गया। कुल निर्यात का 18 प्रतिशत अमेरिका जाता है, जो जीडीपी का 2.2 प्रतिशत है। 50 प्रतिशत टैरिफ से अधिकांश वस्तुएं अमेरिकी बाजार में अकल्पनीय रूप से महंगी हो जाएंगी। टेक्सटाइल, जो भारत के कुल निर्यात का 28 प्रतिशत है और अमेरिका को 36.61 अरब डॉलर का सामान बेचता है, सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। तिरुपुर जैसे केंद्रों में कारखाने आधे क्षमता पर चल रहे हैं, और 1 लाख से अधिक नौकरियां खतरे में हैं। इसी तरह, सूरत के हीरे-जवाहरात उद्योग, जो 10 अरब डॉलर का निर्यात करता है, में मशीनें धूल खा रही हैं—1.75 लाख मजदूर बेरोजगार हो सकते हैं। झींगा मछली निर्यात, जो अमेरिका को 3 अरब डॉलर का है, 60 प्रतिशत से अधिक टैरिफ का शिकार होगा, जिससे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के 5 लाख किसानों की आजीविका पर संकट है।
फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र फिलहाल छूट पा चुके हैं—भारत अमेरिका को 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं सप्लाई करता है—लेकिन ट्रम्प ने 150-250 प्रतिशत टैरिफ की धमकी दी है। आईटी क्षेत्र पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ेगा, क्योंकि ट्रम्प अमेरिकी कंपनियों को भारत से निवेश वापस बुलाने का दबाव डाल सकते हैं। मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार, जीडीपी वृद्धि 0.3 प्रतिशत घट सकती है, और 2025-26 में निर्यात 40-50 प्रतिशत गिर सकता है। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू खपत पर टिकी है (60 प्रतिशत जीडीपी), इसलिए कुल प्रभाव सीमित रहेगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने कहा है कि वह अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए उपाय करेगा, जैसे ब्याज दरें कम करना।
ट्रम्प का यह कदम अमेरिका के लिए भी महंगा साबित हो सकता है। भारतीय सामान महंगे होने से अमेरिकी उपभोक्ताओं को दवाओं, कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक्स पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। अमेरिकी खुदरा विक्रेता पहले ही भारतीय आपूर्तिकर्ताओं से बात कर रहे हैं, लेकिन विकल्प ढूंढना मुश्किल है। ट्रम्प का दावा है कि टैरिफ अमेरिकी नौकरियां बचाएंगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्रास्फीति बढ़ाएगा और वैश्विक व्यापार को अस्थिर करेगा। भारत ने जवाबी कार्रवाई से इनकार किया है, लेकिन 2019 में अमेरिकी सेब और बादाम पर टैरिफ लगाए थे। अब, यूके, ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ एफटीए पर जोर दिया जा रहा है, और ब्रिक्स के माध्यम से रुपया व्यापार बढ़ाने की योजना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वे 'भारी कीमत चुकाने को तैयार' हैं, लेकिन किसानों और छोटे व्यवसायों की रक्षा प्राथमिकता है। यह टैरिफ युद्ध भारत की कूटनीतिक परीक्षा है—क्या मोदी ट्रम्प को मनाएंगे, या आत्मनिर्भर भारत को नई दिशा देंगे? ट्रम्प की नीति 'व्यापारिक साम्राज्यवाद' का रूप ले चुकी है, जो सहयोगी देशों को भी निशाना बना रही है। भारत को विविधीकरण पर ध्यान देना चाहिए: नए बाजार तलाशें, उत्पादकता बढ़ाएं, और डब्ल्यूटीओ जैसे मंचों पर चुनौती दें। लंबे समय में, यह संकट भारत को अधिक लचीला बना सकता है, लेकिन अल्पकालिक दर्द अपरिहार्य है। वैश्विक व्यापार में संतुलन बहाल करने की जरूरत है, जहां दबाव की बजाय संवाद हो।
(संपादकीय टिप्पणी: ट्रम्प की टैरिफ रणनीति अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देती है, लेकिन यह वैश्विक स्थिरता को खतरे में डाल रही है। भारत को अपनी संप्रभुता बनाए रखते हुए स्मार्ट कूटनीति अपनानी चाहिए।)
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