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End of Hereditary Peers in the House of Lords: A Historic Reform in British Parliamentary Democracy

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...

UPSC Current Affairs in Hindi : 16 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख संकलन : 16 अप्रैल 2025

यह रहा लेख का विश्लेषणात्मक और UPSC GS-3 (आंतरिक सुरक्षा)निबंध लेखन के अनुकूल विस्तृत संस्करण:


शीर्षक-1: 26/11 मुंबई हमला: एक राज्य प्रायोजित आतंकवाद और रणनीतिक भ्रम की साजिश

(UPSC GS-3: आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ और आतंकवाद)

भूमिका:

26/11 का मुंबई आतंकी हमला भारत के इतिहास में एक ऐसा त्रासद क्षण था जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद के स्वरूप और अंतरराष्ट्रीय रणनीति पर गहरे प्रश्न खड़े किए। यह हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, राज्य-प्रायोजित साजिश थी, जिसे वैश्विक स्तर पर भ्रम फैलाने और भारत को अस्थिर करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया।

पाकिस्तान की रणनीति: भ्रम की पृष्ठभूमि

इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक अशोक प्रसाद के अनुसार, पाकिस्तान ने इस हमले को "घरेलू असंतोष" का रूप देने की कोशिश की थी। इसके लिए पहले से ही देश के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मुजाहिदीन (IM) द्वारा सिलसिलेवार बम धमाके कराए गए। यह संगठन, यद्यपि "स्वदेशी" बताया गया, असल में कराची से नियंत्रित होता था और इसका संबंध लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से था।

राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का स्वरूप:

  • पाकिस्तान ने न केवल आतंकवादियों को प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरों में धोखा देने हेतु योजनाबद्ध रूप से इसे 'भारतीय मुसलमानों की प्रतिक्रिया' दर्शाने की कोशिश की।
  • इसके माध्यम से उसकी दोहरी रणनीति थी — एक ओर भारत में धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देना और दूसरी ओर आतंकवाद में अपनी भूमिका को छिपाना।

भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया:

  • भारत की एजेंसियों द्वारा अजमल कसाब को जीवित पकड़ना एक निर्णायक मोड़ था, जिसने पाकिस्तान की झूठी कहानी को नष्ट कर दिया।
  • कसाब के कबूलनामे और तकनीकी सबूतों ने पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब किया और उसे वैश्विक स्तर पर शर्मिंदा होना पड़ा।

आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव:

  • इस हमले ने भारत की तटीय सुरक्षा, खुफिया समन्वय और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र की खामियों को उजागर किया।
  • इसके बाद NIA (National Investigation Agency) की स्थापना, NSG हब्स का विकेंद्रीकरण, और मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) के माध्यम से इंटेलिजेंस साझा करने की प्रणाली को मजबूती दी गई।

वैश्विक सन्दर्भ में संदेश:

26/11 जैसे हमले यह बताते हैं कि आतंकवाद केवल सीमाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि एक वैश्विक संकट है। जब तक कुछ राष्ट्र आतंकवाद को रणनीतिक उपकरण की तरह प्रयोग करते रहेंगे, तब तक विश्व में शांति संभव नहीं।

निष्कर्ष:

मुंबई हमला न केवल भारत की पीड़ा है, बल्कि यह एक उदाहरण है कि किस प्रकार राज्य प्रायोजित आतंकवाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर हमला कर सकता है। भारत ने जिस तरह इस हमले के बाद अपने सुरक्षा ढांचे को सशक्त किया, वह अन्य राष्ट्रों के लिए भी प्रेरणा है। वैश्विक समुदाय को अब यह समझने की ज़रूरत है कि आतंकवाद के खिलाफ केवल शब्द नहीं, ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है — विशेषकर उन राष्ट्रों के विरुद्ध जो उसे आश्रय देते हैं।


नीचे 26/11 मुंबई आतंकी हमले और उससे संबंधित संभावित UPSC GS-3 और निबंध लेखन के दृष्टिकोण से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न:


GS-3 (आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद और खुफिया प्रणाली से संबंधित प्रश्न):

  1. "26/11 मुंबई हमला भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।" इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा करें।
  2. राज्य प्रायोजित आतंकवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए, 26/11 हमले के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका का विश्लेषण करें।
  3. भारतीय मुजाहिदीन (IM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे संगठनों की गतिविधियों के माध्यम से भारत में आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर चर्चा करें।
  4. 26/11 के बाद भारत ने आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु किन प्रमुख संस्थागत सुधारों को अपनाया?
  5. "आतंकवाद से निपटने में खुफिया समन्वय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।" उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
  6. भारत की तटीय सुरक्षा व्यवस्था में 26/11 के बाद हुए सुधारों पर प्रकाश डालिए।
  7. राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की भूमिका और प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें।

निबंध लेखन के संभावित शीर्षक:

  1. "26/11: एक आतंकवादी हमला या एक रणनीतिक युद्ध?"
  2. "राज्य प्रायोजित आतंकवाद और वैश्विक सुरक्षा की चुनौतियाँ"
  3. "आतंकवाद के विरुद्ध भारत की नीति: अनुभव, सुधार और भविष्य की दिशा"
  4. "जब सुरक्षा चूक बन गई राष्ट्रीय आपदा: 26/11 की सीख"
  5. "आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय राजनीति: दोषारोपण से समाधान तक"

2-हिंदूफोबिया के खिलाफ कानून: क्या भारत को भी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए?

 भूमिका:

आज के समय में जब धार्मिक सहिष्णुता और विविधता को वैश्विक समाज की शक्ति माना जाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ देशों और समुदायों में धार्मिक घृणा और भेदभाव की घटनाएँ चिंता का विषय बनती जा रही हैं। ऐसे ही एक गंभीर लेकिन कम चर्चित विषय – ‘हिंदूफोबिया’ – के खिलाफ अमेरिका के जॉर्जिया राज्य द्वारा लाया गया बिल न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि यह एक नई सोच और चेतना का संकेत भी देता है। यह कदम अब वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या भारत जैसे बहुधार्मिक और लोकतांत्रिक राष्ट्र को भी इस दिशा में कोई पहल करनी चाहिए?

 जॉर्जिया का ऐतिहासिक कदम: पहला 'हिंदूफोबिया' बिल 

मार्च 2024 में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य ने ‘हिंदूफोबिया’ के खिलाफ एक विशेष बिल पेश कर दुनिया का पहला ऐसा क्षेत्र बनने का गौरव प्राप्त किया, जिसने हिंदू-विरोधी भेदभाव को कानूनी रूप से मान्यता दी। इस कानून के तहत अब हिंदू धर्म या समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने, हिंसा करने, या सामाजिक बहिष्कार जैसे कृत्यों को राज्य की घृणा अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों में कार्रवाई का स्पष्ट आधार मिलेगा।

इस बिल को अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों – रिपब्लिकन और डेमोक्रेट – का समर्थन मिला, जो यह दर्शाता है कि यह कानून किसी एक समुदाय का पक्ष नहीं लेता, बल्कि एक सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों की रक्षा का प्रयास है।

 क्या अन्य देशों में है ऐसा कोई कानून?

दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले देशों में भी धार्मिक घृणा के खिलाफ कानून मौजूद हैं, लेकिन ‘हिंदूफोबिया’ को विशेष रूप से परिभाषित करने वाला कानून अब तक नहीं था।

कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में धार्मिक घृणा के विरुद्ध कानून तो हैं, लेकिन हिंदू धर्म के खिलाफ घृणा या हमलों को अब तक विशेष पहचान नहीं मिली थी।

कनाडा में हिंदू मंदिरों पर हमलों और मूर्ति तोड़े जाने की घटनाएँ सामने आईं, परंतु उन्हें ‘हिंदूफोबिया’ के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य हेट क्राइम के रूप में देखा गया।

भारतवंशी प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव के चलते अब इन देशों में हिंदूफोबिया की पहचान और दंडात्मक कार्रवाई की माँग भी उठने लगी है।

 भारत में ऐसी किसी कानून की जरूरत क्यों है?

भारत में संविधान द्वारा हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है, लेकिन फिर भी हिंदू धर्म को लेकर फैलाई जा रही विकृत जानकारियाँ, हिंदू प्रतीकों और परंपराओं का उपहास, और राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी समय-समय पर सामने आती रही है।

 1. धार्मिक बहुलता में संतुलन ज़रूरी:

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सभी धर्मों को बराबरी का सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। अगर इस्लामोफोबिया और एंटी-सेमिटिज्म पर कानून बन सकते हैं, तो हिंदूफोबिया को नजरअंदाज करना न्यायोचित नहीं है।

 2. मीडिया और सोशल मीडिया में हिंदू-विरोधी कंटेंट:

कुछ फिल्में, वेबसीरीज, सोशल मीडिया पोस्ट्स और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में हिंदू धर्म और संस्कृति को एकतरफा नकारात्मक रूप में पेश किया जाता है, जो समाज में विभाजन को जन्म देता है।

 3. प्रवासी हिंदू समुदाय की सुरक्षा:

भारत से बाहर बसे करोड़ों हिंदू आज सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत यदि 'हिंदूफोबिया' के खिलाफ कोई क़ानून लाता है तो यह वैश्विक स्तर पर एक संदेश होगा कि हिंदू धर्म के अनुयायी भी कानूनी सुरक्षा के हक़दार हैं।

 *क्या भारत में ऐसा कानून बन सकता है?* 

तकनीकी रूप से, हाँ।

भारत का संविधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26, धार्मिक समानता और स्वतंत्रता की बात करता है। भारतीय दंड संहिता में भी कई धाराएँ हैं जो धार्मिक घृणा, भावना आहत करने या सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी हैं (जैसे IPC धारा 153A, 295A)। लेकिन अब आवश्यकता है एक विशेष और स्पष्ट कानून की, जो 'हिंदूफोबिया' जैसे कृत्यों को नामित करे और प्रभावी ढंग से दंडनीय बनाए।

हालांकि, यह प्रयास धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक संतुलन के साथ किया जाना चाहिए, ताकि यह किसी एक धर्म के पक्ष में पक्षपात न लगे। इसे ‘धार्मिक घृणा निरोधक कानून’ की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसमें हिंदूफोबिया के साथ-साथ इस्लामोफोबिया, क्रिश्चियनफोबिया आदि को भी शामिल किया जाए।

 निष्कर्ष: 

हिंदूफोबिया’ के खिलाफ अमेरिका के जॉर्जिया राज्य का कदम एक वैचारिक और कानूनी क्रांति का प्रारंभ हो सकता है। यह न केवल हिंदू समुदाय को पहचान और सुरक्षा देता है, बल्कि यह अन्य देशों को भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वे धार्मिक विविधता के साथ न्याय कर पा रहे हैं।

भारत, जो कि हिंदू धर्म की जन्मभूमि है, उसे न केवल अपने नागरिकों बल्कि वैश्विक हिंदू समुदाय की भावनाओं और सुरक्षा के लिए भी एक सक्रिय और संरक्षक भूमिका निभानी चाहिए। समय आ गया है कि भारत एक उदाहरण बने – कानून के माध्यम से हर धर्म के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी देने वाला एक सशक्त राष्ट्र।


3-वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत के बिजली उपकरण उद्योग के लिए एक रणनीतिक अवसर

हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया है कि चीन पर अमेरिकी टैरिफ और वहाँ बढ़ती उत्पादन लागत के चलते भारत के लिए बिजली उपकरण उद्योग के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने का एक उल्लेखनीय अवसर उत्पन्न हुआ है। यह विश्लेषण न केवल भारत की निर्यात क्षमताओं को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में उभरते परिवर्तनों की ओर भी संकेत करता है।

चीन पर अमेरिकी टैरिफ: भारत के लिए अवसर

अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए टैरिफ, विशेष रूप से ट्रंप युग से लेकर वर्तमान तक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पुनर्संरचना की प्रक्रिया को तेज कर चुके हैं। इसमें चीन पर निर्भरता कम करने की नीति अपनाई जा रही है, जिसे 'चीन +1 रणनीति' कहा जाता है। इसका सीधा लाभ उन देशों को हो सकता है जो उत्पादन और निर्यात की दृष्टि से प्रतिस्पर्धी विकल्प प्रदान कर सकते हैं – भारत उनमें अग्रणी हो सकता है।

भारत की शक्ति और संभावनाएँ

भारत के पास पहले से ही एक मजबूत और विविधीकृत बिजली उपकरण उद्योग है, जिसमें ट्रांसफॉर्मर, पावर केबल, मोटर, गियरबॉक्स और अन्य औद्योगिक उपकरणों का उत्पादन शामिल है। नीति आयोग के अनुसार, भारत 2035 तक $25 बिलियन से अधिक मूल्य के बिजली उपकरण निर्यात करने की क्षमता रखता है। यह न केवल निर्यात आधारित विकास को बल देगा, बल्कि रोजगार, नवाचार और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी सशक्त करेगा।

नीति आयोग के सुझाव और आवश्यक सुधार

नीति आयोग ने इस अवसर का लाभ उठाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

  • उद्योग के लिए अनुकूल नीति ढाँचा: निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं, टैक्स रियायतों और व्यापार समझौतों के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार किया जा सकता है।
  • बुनियादी ढांचे में सुधार: लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा आपूर्ति और उद्योगों के लिए औद्योगिक क्लस्टर का विकास।
  • तकनीकी नवाचार और अनुसंधान: गुणवत्ता मानकों का उन्नयन और नवाचार पर बल देने से भारत को वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने में सहायता मिलेगी।
  • कौशल विकास: प्रशिक्षित श्रमिक बल के अभाव में उत्पादन की गुणवत्ता और गति प्रभावित हो सकती है, अतः स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों का विस्तार आवश्यक है।

चुनौतियाँ और आवश्यक सावधानियाँ

हालाँकि अवसर बड़ा है, लेकिन भारत को कुछ प्रमुख चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा:

  • कच्चे माल की आपूर्ति में निर्भरता
  • उच्च वित्तीय लागत
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों की चुनौती
  • गुणवत्तापूर्ण ब्रांड पहचान की कमी

इन चुनौतियों के समाधान के लिए एक समन्वित रणनीति की आवश्यकता है जिसमें सरकार, उद्योग और अनुसंधान संस्थान मिलकर कार्य करें।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम

भारत के बिजली उपकरण उद्योग के पास वर्तमान वैश्विक व्यापारिक माहौल में अपनी भूमिका सशक्त करने का एक स्वर्णिम अवसर है। यदि इस अवसर को नीति निर्माण, औद्योगिक निवेश और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से साध लिया जाए, तो भारत न केवल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि एक निर्यात महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने भी आ सकता है। यह “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियानों को गति देने वाला एक ठोस स्तंभ सिद्ध हो सकता है।


4-तमिलनाडु ने राज्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए पैनल का गठन किया

— केंद्र के साथ बढ़ते मतभेदों के बीच तमिलनाडु की संघीय स्वायत्तता की पहल

भूमिका:

हाल के वर्षों में भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर बहस तेज होती गई है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु ने बार-बार यह चिंता जताई है कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु सरकार ने राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए एक विशेष पैनल का गठन किया है।

पैनल की प्रकृति और उद्देश्य:

तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित यह पैनल संविधान के अनुच्छेदों के तहत राज्यों को प्राप्त अधिकारों की रक्षा करने, केंद्र द्वारा जारी नीतियों के विश्लेषण की समीक्षा करने और संभावित संवैधानिक उल्लंघनों की पहचान करने के लिए कार्य करेगा। यह विशेषज्ञ समिति कानूनी, प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से सलाह प्रदान करेगी, जिससे राज्य अपनी नीतियों में अधिक मजबूती के साथ केंद्र के समक्ष अपना पक्ष रख सके।

संघीय ढांचे पर प्रभाव:

भारत का संविधान एक संघीय ढांचा प्रस्तुत करता है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के लिए अधिकारों का पृथक्करण किया गया है। लेकिन बीते समय में, जीएसटी परिषद में राज्यों की सीमित भूमिका, राज्यपालों की भूमिका में बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप, केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता और नई शिक्षा नीति जैसे विषयों पर राज्यों को पर्याप्त परामर्श न मिलना, राज्यों की असंतोषजनक स्थिति को दर्शाता है। तमिलनाडु का यह कदम न केवल राज्य हितों की रक्षा की दिशा में एक प्रयास है, बल्कि यह पूरे संघीय ढांचे को पुनर्संतुलित करने की ओर एक संकेत भी है।

राजनीतिक संदर्भ और विपक्षी एकजुटता:

डीएमके के नेतृत्व में तमिलनाडु सरकार पहले भी "संघीय मोर्चा" जैसे विचारों को सामने ला चुकी है। हाल ही में विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ में तमिलनाडु की सक्रिय भागीदारी भी केंद्र के एकाधिकारवादी रुझानों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष की ओर संकेत करती है। यह पैनल अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान के दायरे में रहते हुए सक्रिय कदम उठाएं।

निष्कर्ष:

तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित यह पैनल न केवल एक राज्य के अधिकारों की रक्षा का प्रयास है, बल्कि यह भारतीय संघवाद के भविष्य को लेकर उठ रही चिंताओं की अभिव्यक्ति भी है। यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल प्रस्तुत कर सकती है कि कैसे वे संवैधानिक ढांचे में रहकर केंद्र के साथ शक्ति संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रयास कर सकते हैं। संघीय भारत की मजबूती तभी संभव है जब सभी घटक इकाइयाँ — केंद्र और राज्य — आपसी सम्मान, सहयोग और संवैधानिक मर्यादा का पालन करें।

यह विषय UPSC और अन्य राज्य सेवा परीक्षाओं के लिए समसामयिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे जुड़े कुछ संभावित प्रश्न निम्नलिखित हैं:

मुख्य परीक्षा (UPSC Mains) हेतु संभावित प्रश्न:

  1. "संघीय ढांचे की रक्षा हेतु राज्यों की सक्रियता भारतीय लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक है?" — इस कथन के आलोक में तमिलनाडु द्वारा गठित पैनल की भूमिका का विश्लेषण करें।

  2. तमिलनाडु द्वारा राज्यों के अधिकारों की रक्षा हेतु पैनल गठन को भारत में 'सहकारी संघवाद' बनाम 'प्रतिस्पर्धी संघवाद' की बहस से कैसे जोड़ा जा सकता है?

  3. राज्यपालों की भूमिका और केंद्र के हस्तक्षेप के मुद्दे भारतीय संघवाद को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? हाल के उदाहरणों सहित उत्तर दीजिए।

  4. "भारत में वास्तविक संघवाद तभी संभव है जब राज्यों को नीति-निर्माण में सक्रिय भागीदारी मिले।" — इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा करें।

  5. भारतीय संविधान के किन प्रावधानों के तहत राज्यों को संघीय स्वायत्तता प्राप्त है? क्या वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इनकी पुनर्व्याख्या आवश्यक है?


निबंध लेखन हेतु संभावित विषय:

  • "संघीय भारत में राज्यों की भूमिका: अधिकार बनाम वास्तविकता"
  • "संघवाद का भविष्य: क्या राज्य अपनी पहचान खो रहे हैं?"
  • "राज्यों का सशक्तिकरण: लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने की दिशा में एक कदम"

5-भारत न्याय रिपोर्ट 2025: समावेशी न्याय प्रणाली की कसौटी पर भारतीय राज्य – UPSC के दृष्टिकोण से एक विश्लेषणात्मक लेख

भूमिका

भारत न्याय रिपोर्ट (India Justice Report - IJR) 2025 ने एक बार फिर देश की न्याय प्रणाली की वास्तविक स्थिति को तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर सामने रखा है। यह कोई सरकारी रिपोर्ट नहीं है, लेकिन Tata Trusts के नेतृत्व में कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट अब नीतिगत विमर्श, सुधारात्मक दृष्टिकोण और UPSC जैसे परीक्षाओं में लेखन का सशक्त स्रोत बन चुकी है। यह रिपोर्ट न केवल पुलिस, न्यायपालिका, जेल प्रणाली और कानूनी सहायता के चार स्तंभों का मूल्यांकन करती है, बल्कि लैंगिक न्याय, सामाजिक समावेश, प्रशासनिक दक्षता, और राज्यों की प्रतिबद्धता जैसे बिंदुओं पर भी ध्यान केंद्रित करती है।


प्रमुख निष्कर्ष – UPSC की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बिंदु:

1. लैंगिक न्याय की अनदेखी – पुलिस बल में महिलाएं नदारद

रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि देश का कोई भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश पुलिस बल में निर्धारित महिला आरक्षण (20–33%) को पूरा नहीं कर पाया

  • यह दर्शाता है कि महिला सशक्तिकरण के नीतिगत वादों और वास्तविक क्रियान्वयन में गहरी खाई है।
  • UPSC GS Paper 2 में Governance & Women Empowerment विषयों के उत्तरों में इसे सशक्त उदाहरण के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • महिला अपराधों की जाँच, रिपोर्टिंग और पीड़िता के प्रति संवेदनशीलता सीधे तौर पर पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ी है।

2. न्यायपालिका में भारी लंबित मामले और संसाधनों की कमी

  • रिपोर्ट के अनुसार देश की अधिकांश न्यायालयों में जजों की भारी कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, और मामलों का अत्यधिक लंबित होना एक गंभीर समस्या है।
  • उदाहरण: कई राज्यों में प्रति लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या न्यूनतम अनुशंसित स्तर (50 प्रति लाख) से काफी कम है।
  • GS Paper 2 – Judiciary Reforms के तहत इसे न्याय प्रणाली की बाधाओं के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

3. जेल प्रणाली में असमानता और अत्यधिक भीड़भाड़

  • रिपोर्ट बताती है कि देश की जेलों में 75% से अधिक कैदी विचाराधीन हैं, जिनमें अधिकांश सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से आते हैं।
  • जेलों में महिला बंदियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।
  • GS Paper 2 और GS Paper 3 में Prison Reforms, Human Rights & Internal Security जैसे विषयों में इसे प्रत्यक्ष उदाहरण के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

4. कानूनी सहायता तक सीमित पहुँच

  • रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि निःशुल्क कानूनी सहायता प्रणाली (Legal Aid Services), जो गरीबों और वंचितों के लिए न्याय का एकमात्र माध्यम हो सकती है, वह खर्च और सेवाओं दोनों के मामले में कमजोर है।
  • Social Justice और Access to Justice जैसे उत्तरों में यह रिपोर्ट नीति-निर्माण में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

विवेचन: न्याय का मतलब केवल कानून नहीं, बल्कि पहुँच और समान भागीदारी भी है

India Justice Report 2025 यह स्पष्ट करती है कि भारत में न्याय केवल संविधानिक आदर्शों पर आधारित न होकर प्रशासनिक इच्छाशक्ति, संसाधनों की उपलब्धता और समावेशी सोच पर भी निर्भर है।

यह रिपोर्ट बताती है कि केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य लगातार न्याय प्रणाली में सुधार की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, वहीं बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अभी भी मूलभूत संरचनात्मक सुधारों से दूर हैं। यह भारत के संघीय ढांचे में कार्यान्वयन की विषमता (Asymmetry in Governance) को भी उजागर करता है।


UPSC के लिए लेखन में उपयोग योग्य कथन और वाक्यांश:

  • “Justice is not merely the enforcement of law, but the assurance of accessibility, efficiency and empathy.”
  • “India’s justice system reflects not only procedural gaps but structural inequalities rooted in gender and class.”
  • “Data-based reports like IJR bridge the gap between perception and reality in public policy.”

निष्कर्ष:

भारत न्याय रिपोर्ट 2025 हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी न्याय प्रणाली वास्तव में "सभी के लिए न्याय" (Justice for All) के आदर्श को साकार कर रही है?
UPSC जैसे परीक्षाओं में, जहां उत्तर केवल जानकारी नहीं, बल्कि विश्लेषण और समाधान पर आधारित होते हैं, इस रिपोर्ट से प्राप्त बिंदु न्यायिक सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक समावेशिता पर बहुमूल्य सामग्री प्रदान करते हैं।

एक प्रभावी उत्तरकार के रूप में, हमें इस रिपोर्ट को केवल आँकड़ों की सूची नहीं, बल्कि एक नीति-उन्मुख दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, जो भारत को एक समावेशी और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाने की दिशा में मार्गदर्शन करे।


दैनिक समसामयिकी: 15 अप्रैल 2025👈

✍️ARVIND SINGH PK REWA
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महिला आरक्षण, परिसीमन और लोकतंत्र की परीक्षा: संसद में पराजय के मायने भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं रह जाती, बल्कि राजनीतिक शक्ति, संघीय संतुलन और संवैधानिक नैतिकता की वास्तविक परीक्षा का केंद्र बन जाती है। हाल ही में लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की पराजय ऐसा ही एक निर्णायक क्षण है—जहां एक ओर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का वादा था, तो दूसरी ओर परिसीमन के जरिए सत्ता संतुलन बदलने की आशंकाएं। यह घटना केवल एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि उस सहमति की विफलता है, जो किसी भी बड़े संवैधानिक परिवर्तन के लिए अनिवार्य होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम संस्थागत सहमति प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने इस विधेयक को “नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया। सरकार का तर्क था कि 33% महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए सीटों का पुनर्गठन और परिसीमन आवश्यक है। किन्तु समस्या इस उद्देश्य में नहीं, बल्कि इसके साधनों में निहित थी। विपक्ष ने इस प्रस्ताव को एक व्यापक राजनीतिक परियोजना के रूप में देखा,...

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अमेरिका-ईरान परमाणु समझौता: सीजफायर के बाद ट्रंप का दावा—ईरान सौंप सकता है संवर्धित यूरेनियम अप्रैल 2026 के इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक शक्ति-संतुलन की कसौटी बनकर उभरा है। लगभग दो महीने तक चले अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच भीषण संघर्ष, उसके बाद घोषित दो सप्ताह के अस्थायी संघर्षविराम, और अब उसके समाप्त होते ही उभरते नए दावे—ये सभी घटनाएं केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाली हैं। इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किया गया “न्यूक्लियर डस्ट” संबंधी दावा चर्चा के केंद्र में है, जिसने कूटनीति, सुरक्षा और परमाणु राजनीति के नए आयाम खोल दिए हैं। “न्यूक्लियर डस्ट” का अर्थ और राजनीतिक संकेत ट्रंप द्वारा प्रयुक्त शब्द “न्यूक्लियर डस्ट” कोई तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। इसका आशय ईरान के उस संवर्धित यूरेनियम भंडार से है, जो उसकी परमाणु क्षमता का मूल आधार रहा है। यदि वास्तव में ईरान इस सामग्री को सौंपने के लिए सहमत हुआ है, तो यह केवल एक सामरिक समझौता नहीं, बल्कि उसकी परमाणु नीति में एक ऐतिहासिक म...

Women Reservation & Delimitation Bills 2026: A Turning Point in India’s Democratic Representation

लोकसभा में नया सामाजिक अनुबंध: प्रतिनिधित्व, संघवाद और राजनीति का पुनर्संतुलन नई दिल्ली के सत्ता-गलियारों में आज जो कुछ घटित हो रहा है, वह केवल तीन विधेयकों की औपचारिक प्रस्तुति भर नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप में एक संभावित संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को प्रभावी बनाने और सीटों के पुनर्विन्यास हेतु प्रस्तुत प्रस्ताव, प्रतिनिधित्व के प्रश्न को एक नए आयाम में स्थापित करते हैं—जहाँ न्याय, जनसंख्या, और संघीय संतुलन एक-दूसरे से टकराते भी हैं और पूरक भी बनते हैं। प्रतिनिधित्व का विस्तार या शक्ति का पुनर्वितरण? सरकार द्वारा प्रस्तावित सीटों का विस्तार—543 से बढ़ाकर संभावित 850—पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक समावेशन की दिशा में एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है। तर्क स्पष्ट है: यदि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करना है, तो मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना समग्र संख्या बढ़ाना अधिक न्यायसंगत होगा। परंतु यह विस्तार केवल संख्यात्मक नहीं है; यह सत्ता-संतुलन के पुनर्निर्धारण का माध्यम भी बन सकता है। परिसीमन की प्रक्रिया, जो जनसंख्या के आधार ...

Hormuz Strait Blockade 2026: US-Iran Tensions Escalate, Global Oil Supply and Maritime Security at Risk

होर्मूज की नाकाबंदी: समुद्री भू-राजनीति का विस्फोटक क्षण पश्चिम एशिया की उथल-पुथल भरी भू-राजनीति एक बार फिर वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में आ खड़ी हुई है। में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी की शुरुआत ने न केवल क्षेत्रीय तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन को भी गंभीर चुनौती दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्देश पर उठाया गया यह कदम उस विफल कूटनीति का परिणाम है, जिसने इस्लामाबाद में हुए वार्ताओं के बावजूद किसी स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त नहीं किया। रणनीतिक जलडमरूमध्य का सैन्यीकरण होर्मूज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है, आज सैन्य प्रतिस्पर्धा का मंच बन गया है। अमेरिका द्वारा युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर्स और लड़ाकू विमानों की तैनाती इस बात का संकेत है कि यह केवल “नौवहन की स्वतंत्रता” सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं, बल्कि ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। ईरान के लिए यह जलडमरूमध्य उसकी सामरिक ताकत का प्रतीक है, जबकि अमेरिका के लिए यह वैश्विक समुद्री व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न। यह टकराव उस व्याप...

India’s Landmark Electoral Reforms 2026: Delimitation, Lok Sabha Expansion & Women’s Reservation Explained

भारत में ऐतिहासिक चुनावी सुधार 2026: परिसीमन, लोकसभा विस्तार और 33% महिला आरक्षण का पूरा विश्लेषण भारतीय लोकतंत्र समय-समय पर ऐसे निर्णायक मोड़ों से गुजरता रहा है, जब संस्थागत ढांचे को बदलती सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता सामने आती है। वर्ष 2026 में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत तीन महत्वपूर्ण विधेयक—परिसीमन प्रक्रिया में परिवर्तन, लोकसभा की सदस्य संख्या का विस्तार, और महिला आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन—इसी क्रम में एक व्यापक संरचनात्मक पुनर्संतुलन का संकेत देते हैं। ये प्रस्ताव केवल तकनीकी सुधार नहीं हैं, बल्कि प्रतिनिधित्व, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक समावेशन के प्रश्नों को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास भी हैं। सबसे प्रमुख प्रस्ताव लोकसभा की सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने का है। यह विस्तार अपने आप में अभूतपूर्व है और इसका सीधा संबंध संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने से है। यह स्पष्ट करता है कि सरकार महिला आरक्षण को प्रतीकात्मक स्तर से आगे बढ़ाकर वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण के रूप में स्थापित करना चाहती है। यदि यह प्रस...

Strait of Hormuz Crisis 2026: Impact on Global Energy & India

अमेरिका–ईरान गतिरोध और होर्मुज़ का संकट: ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और रणनीतिक विवेक की परीक्षा अप्रैल 2026 का तीसरा सप्ताह वैश्विक भू-राजनीति में एक बार फिर उस मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ युद्ध और कूटनीति के बीच की रेखा धुंधली पड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान में वार्ता के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भेजने की घोषणा और उसके तुरंत बाद तेहरान का दोटूक इनकार—यह केवल एक विफल संवाद नहीं, बल्कि गहरे अविश्वास की परिणति है। इस बीच, Strait of Hormuz (होर्मुज़ जलडमरूमध्य) का पुनः बंद होना उस वैश्विक ऊर्जा तंत्र को झकझोर रहा है, जिस पर आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं टिकी हुई हैं। कूटनीति की सीमाएँ और शक्ति-राजनीति का उभार इस संकट की जड़ें केवल परमाणु कार्यक्रम या आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं हैं; यह उस व्यापक शक्ति-संतुलन का प्रश्न है, जिसमें अमेरिका अपना वैश्विक नेतृत्व बचाए रखना चाहता है और ईरान अपनी क्षेत्रीय स्वायत्तता। वाशिंगटन का रुख: अमेरिका होर्मुज़ को एक "तकनीकी मुद्दा" मानकर इसे परमाणु वार्ता से अलग रखना चाहता है। उसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध रखना है। तेहरान क...

Asha Bhosle: The Melodic Queen of Indian Music – Life, Iconic Songs & Timeless Legacy

आशा भोसले: सुरों की मल्लिका और भारतीय संगीत की अमर आवाज़ | Life, Songs, Legacy सुरों की मल्लिका, भारतीय संगीत की अमर आवाज़—आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। थकान और फेफड़ों के संक्रमण के कारण 11 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती होने के एक दिन बाद मल्टीपल ऑर्गन फेलियर से उनका निधन हो गया। उनकी यह विदाई संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है, जिसकी मधुरता ने आठ दशकों से अधिक समय तक करोड़ों भारतीय दिलों को छुआ और विश्व पटल पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वे स्वरसम्राट दिनानाथ मंगेशकर की पुत्री और स्वरकोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। संगीत परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका सफर आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने बचपन से ही गायकी की राह अपनाई। उनका पहला गाना 1948 में फिल्म 'चुनरिया' का "सावन आया" था, लेकिन असली पहचान उन्हें 1950-60 के दशक में मिली। शुरू में बहनों की छाया में छोटी-छोटी भूमिकाओं और स...

Pariksha Pe Charcha 2026: PM Modi’s Motivational Message for Students on Exams, Skills, Balance & Success

परीक्षा पे चर्चा 2026: परीक्षा से आगे जीवन की तैयारी का राष्ट्रीय संवाद परीक्षा का समय आते ही देश के करोड़ों छात्रों के मन में एक ही सवाल गूंजने लगता है— क्या मैं सफल हो पाऊँगा? इसी प्रश्न, इसी तनाव और इसी अनिश्चितता को संवाद और आत्मविश्वास में बदलने का मंच है ‘परीक्षा पे चर्चा’ । 6 फरवरी 2026 को आयोजित परीक्षा पे चर्चा के 9वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधी बातचीत की। सुबह 10 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में दिल्ली, गुजरात के देवमोगरा, तमिलनाडु के कोयंबटूर, छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के गुवाहाटी से जुड़े छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण दूरदर्शन, पीएम मोदी के यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किया गया। इस बार 4.5 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि आज का छात्र केवल परीक्षा टिप्स नहीं, बल्कि जीवन मार्गदर्शन चाहता है। 🌱 सपने देखें, लेकिन एक्शन के साथ प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरक था— “सपने न देखना जुर्म है, लेकिन सिर्फ सपनों की गुनगुनाहट से काम नहीं चलता।” उन्हों...

UPSC 2024 Topper Shakti Dubey’s Strategy: 4-Point Study Plan That Led to Success in 5th Attempt

UPSC 2024 टॉपर शक्ति दुबे की रणनीति: सफलता की चार सूत्रीय योजना से सीखें स्मार्ट तैयारी का मंत्र लेखक: Arvind Singh PK Rewa | Gynamic GK परिचय: हर साल UPSC सिविल सेवा परीक्षा लाखों युवाओं के लिए एक सपना और संघर्ष बनकर सामने आती है। लेकिन कुछ ही अभ्यर्थी इस कठिन परीक्षा को पार कर पाते हैं। 2024 की टॉपर शक्ति दुबे ने न सिर्फ परीक्षा पास की, बल्कि एक बेहद व्यावहारिक और अनुशासित दृष्टिकोण के साथ सफलता की नई मिसाल कायम की। उनका फोकस केवल घंटों की पढ़ाई पर नहीं, बल्कि रणनीतिक अध्ययन पर था। कौन हैं शक्ति दुबे? शक्ति दुबे UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 की टॉपर हैं। यह उनका पांचवां  प्रयास था, लेकिन इस बार उन्होंने एक स्पष्ट, सीमित और परिणामोन्मुख रणनीति अपनाई। न उन्होंने कोचिंग की दौड़ लगाई, न ही घंटों की संख्या के पीछे भागीं। बल्कि उन्होंने “टॉपर्स के इंटरव्यू” और परीक्षा पैटर्न का विश्लेषण कर अपनी तैयारी को एक फोकस्ड दिशा दी। शक्ति दुबे की UPSC तैयारी की चार मजबूत आधारशिलाएँ 1. सुबह की शुरुआत करेंट अफेयर्स से उन्होंने बताया कि सुबह उठते ही उनका पहला काम होता था – करेंट अफेयर्...

National Interest Over Permanent Friends or Foes: India’s Shifting Strategic Compass

राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि: भारत की बदलती कूटनीतिक दिशा प्रस्तावना : : न मित्र स्थायी, न शत्रु अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण बार-बार यह स्पष्ट करता है कि विश्व राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न ही कोई स्थायी शत्रु। यदि कुछ स्थायी है, तो वह है प्रत्येक राष्ट्र का राष्ट्रीय हित (National Interest) । बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यही राष्ट्रीय हित कूटनीतिक रुख, विदेश नीति के निर्णय और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को निर्धारित करता है। वर्तमान समय में भारत की विदेश नीति इसी सिद्धांत का मूर्त रूप प्रतीत हो रही है। जहाँ एक ओर भारत और अमेरिका के बीच कुछ असहजता और मतभेद देखने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन, सीमा विवाद और गहरी अविश्वास की खाई के बावजूद संवाद और संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं। यह परिदृश्य एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि भावनात्मक स्तर पर मित्रता या शत्रुता से परे जाकर, अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार केवल और केवल हित-आधारित यथार्थवाद है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भारत के विदेश नीति इतिहास में यह कथन अनेक बार सत्य सिद्ध हुआ ...