Trump Administration Prepares Expanded Military Strike on Iran: Geopolitical Risks and Global Impact 2026
ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान पर संभावित विस्तारित सैन्य हमले की तैयारी: एक गहन भू-राजनीतिक विश्लेषण
प्रस्तावना: युद्ध और कूटनीति के बीच खड़ा मध्य पूर्व
फरवरी 2026 में मध्य पूर्व की सामरिक हलचल ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर अस्थिरता की दहलीज पर ला खड़ा किया है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान ने क्षेत्र में अभूतपूर्व सैन्य जमावड़ा किया है, जिसे कई विश्लेषक ईरान के विरुद्ध संभावित “विस्तारित सैन्य अभियान” की तैयारी के रूप में देख रहे हैं।
यह स्थिति केवल दो देशों के बीच शक्ति-प्रदर्शन नहीं है; यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता की परीक्षा है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमला होगा या नहीं—बल्कि यह है कि यदि हुआ, तो उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अविश्वास की लंबी विरासत
अमेरिका–ईरान संबंध 1979 की इस्लामी क्रांति से ही तनावपूर्ण रहे हैं। 2015 में हुआ परमाणु समझौता (JCPOA) इस तनाव को कम करने का एक प्रयास था। किंतु 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने और “अधिकतम दबाव” नीति लागू करने के बाद स्थिति फिर बिगड़ गई।
2025 में अमेरिका–इज़राइल की संयुक्त कार्रवाइयों के बाद भी ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। अब 2026 में, दूसरे कार्यकाल में लौटे ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया है कि केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं; यदि वार्ता विफल रही तो सैन्य विकल्प खुले हैं।
सैन्य जमावड़ा: संकेत या पूर्वाभ्यास?
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप तैनात किए हैं—USS Abraham Lincoln और USS Gerald R. Ford। इनके साथ विध्वंसक, क्रूजर, परमाणु पनडुब्बियां, स्ट्राइक एयरक्राफ्ट और रिफ्यूलिंग टैंकर शामिल हैं।
यह तैनाती केवल “सर्जिकल स्ट्राइक” की तैयारी नहीं दर्शाती; यह हफ्तों या महीनों तक चलने वाले विस्तारित अभियान की संभावना को इंगित करती है।
सैन्य दृष्टि से यह तीन संभावित परिदृश्यों की ओर इशारा करता है:
- सीमित हवाई हमले – परमाणु ठिकानों और मिसाइल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना।
- विस्तारित वायु-नौसैनिक अभियान – ईरान की सैन्य संरचना को व्यापक क्षति पहुँचाना।
- क्षेत्रीय संघर्ष – जिसमें प्रॉक्सी और सहयोगी देश शामिल हों।
रणनीतिक उद्देश्य: दबाव, निरोध या निर्णायक प्रहार?
ट्रंप प्रशासन के संभावित उद्देश्य बहुस्तरीय हैं:
1. परमाणु कार्यक्रम का पूर्ण विघटन
ईरान को अधिक कठोर शर्तों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करना।
2. क्षेत्रीय प्रभाव में कमी
ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क—विशेषकर हिजबुल्लाह और हूती—को कमजोर करना।
3. इज़राइल की सुरक्षा
इज़राइल की सुरक्षा अमेरिकी रणनीति का केंद्रीय तत्व है।
4. घरेलू राजनीतिक सन्देश
“निर्णायक नेतृत्व” की छवि बनाना।
ईरान की संभावित प्रतिक्रिया: असममित युद्ध की रणनीति
ईरान प्रत्यक्ष युद्ध में अमेरिकी सैन्य शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकता, किंतु उसके पास कई असममित विकल्प हैं:
- बैलिस्टिक मिसाइल हमले
- साइबर हमले
- प्रॉक्सी नेटवर्क के माध्यम से क्षेत्रीय अस्थिरता
- होर्मुज जलडमरूमध्य में अवरोध
होर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व के लगभग 20% तेल का परिवहन होता है। यदि इसे अवरुद्ध किया गया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है।
वैश्विक प्रभाव: ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और शक्ति-संतुलन
1. तेल बाज़ार में उछाल
ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि से विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी।
2. परमाणु अप्रसार व्यवस्था पर प्रश्न
यदि सैन्य कार्रवाई के बाद भी ईरान परमाणु कार्यक्रम जारी रखता है, तो अन्य देश अपने परमाणु विकल्प पर विचार कर सकते हैं।
3. महाशक्ति प्रतिस्पर्धा
रूस और चीन ईरान को कूटनीतिक या सीमित समर्थन दे सकते हैं, जिससे संघर्ष व्यापक भू-राजनीतिक टकराव में बदल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और वैधता का प्रश्न
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना बड़े पैमाने पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादास्पद होगा। इससे “नियम-आधारित व्यवस्था” की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
यदि यह पूर्व-निरोधात्मक हमला माना गया, तो भविष्य में अन्य देश भी इसी तर्क का प्रयोग कर सकते हैं—जिससे वैश्विक स्थिरता कमजोर होगी।
निष्कर्ष: निर्णायक क्षण की ओर
2026 का यह संकट केवल अमेरिका और ईरान के बीच टकराव नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की परीक्षा है।
यदि वार्ता सफल होती है, तो यह दबाव-के-जरिए-शांति का उदाहरण होगा। यदि असफल होती है, तो मध्य पूर्व एक व्यापक संघर्ष में फँस सकता है—जिसके आर्थिक, सामरिक और मानवीय परिणाम दूरगामी होंगे।
विश्व समुदाय के लिए प्राथमिकता स्पष्ट है: कूटनीति को अंतिम अवसर दिया जाए, क्योंकि एक बार व्यापक युद्ध आरंभ हो गया, तो उसका नियंत्रण किसी के हाथ में नहीं रहेगा।
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