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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India–France Strategic Partnership in a Multipolar World: How It Is Redefining India’s Global Power Status

बहुध्रुवीय विश्व में भारत–फ्रांस का उभार

भारत की पुनर्परिभाषित वैश्विक रणनीतिक स्थिति

(UPSC-उन्मुख विश्लेषणात्मक लेख)

भूमिका: बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत की उभरती भूमिका

21वीं सदी का अंतरराष्ट्रीय तंत्र तीव्र गति से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है, जहाँ एकध्रुवीय वर्चस्व के स्थान पर बहुपक्षीय संतुलन, लचीली साझेदारियाँ और मुद्दा-आधारित सहयोग निर्णायक बनते जा रहे हैं। यूक्रेन संकट, ग़ाज़ा युद्ध, ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि न तो कठोर सैन्य गठबंधन टिकाऊ हैं और न ही किसी एक शक्ति का दीर्घकालिक प्रभुत्व।

इसी परिप्रेक्ष्य में भारत–फ्रांस संबंध केवल एक द्विपक्षीय साझेदारी नहीं रह गए हैं, बल्कि भारत की वैश्विक रणनीतिक पहचान को नया आयाम देने वाली धुरी के रूप में उभरे हैं। फरवरी 2026 में फ्रांसीसी राष्ट्रपति की मुंबई यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री के साथ हुए व्यापक समझौतों ने इस रिश्ते को “Special Global Strategic Partnership” के स्तर तक उन्नत किया। यह उन्नयन भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच का प्रतीक है—जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक भूमिका को भी सुदृढ़ किया जा रहा है।


1. रणनीतिक स्वायत्तता: गुटनिरपेक्षता से आगे का भारत

शीत युद्ध काल की गुटनिरपेक्षता (NAM) आज रणनीतिक स्वायत्तता में रूपांतरित हो चुकी है। भारत की विदेश नीति का केंद्रीय सूत्र अब यह है कि वह “न तो किसी का अनुयायी बने, न ही किसी का विरोधी”—बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णयकर्ता के रूप में कार्य करे।

फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग इस स्वायत्तता का महत्वपूर्ण स्तंभ है।

  • राफेल विमानों की अतिरिक्त खरीद पर चर्चा,
  • स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण में सहयोग,
  • AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के लिए इंजन विकास,

इन पहलों से भारत किसी एक शक्ति—चाहे अमेरिका हो या रूस—पर निर्भरता से मुक्त होता है। NATO का सदस्य होने के बावजूद फ्रांस की स्वतंत्र विदेश नीति भारत की रणनीतिक संस्कृति से गहराई से मेल खाती है। मैक्रों द्वारा प्रतिपादित “तीसरे मार्ग” का विचार—न अमेरिकी वर्चस्व, न चीनी आधिपत्य—भारत की बहुध्रुवीय सोच का ही विस्तार है। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ को तकनीकी बल मिलता है और रक्षा क्षेत्र में विविधीकरण संभव होता है।


2. पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन: भारत की ‘ब्रिज पावर’ भूमिका

भारत–फ्रांस साझेदारी भारत को पूर्व (रूस–चीन) और पश्चिम (अमेरिका–यूरोप) के बीच एक संतुलनकारी सेतु (Bridge Power) के रूप में स्थापित करती है।

  • अमेरिका के साथ भारत का सहयोग मुख्यतः सुरक्षा और उन्नत तकनीक पर आधारित है।
  • रूस के साथ संबंध ऐतिहासिक और रक्षा-केंद्रित हैं।
  • जबकि फ्रांस के साथ साझेदारी मूल्य-आधारित (लोकतंत्र, बहुपक्षवाद) और रणनीति-आधारित (इंडो–पैसिफिक सुरक्षा, रक्षा उत्पादन) दोनों है।

मुंबई में मैक्रों–मोदी वार्ता के दौरान रक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और कौशल विकास सहित 20 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इससे भारत को यूरोपीय संघ में वैचारिक दबाव से मुक्त होकर गहरी पैठ मिलती है और वह G20, UNSC सुधार तथा जलवायु कूटनीति जैसे मंचों पर स्वतंत्र स्वर बनाए रख पाता है। फ्रांस के सहयोग से भारत वैश्विक दक्षिण की प्रभावी आवाज़ बनकर उभर रहा है।


3. इंडो–पैसिफिक में भारत–फ्रांस धुरी

इंडो–पैसिफिक क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का केंद्र है, जहाँ चीन की आक्रामक समुद्री नीतियाँ गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही हैं। फ्रांस इस क्षेत्र में केवल बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि रेज़िडेंट पावर है—रेयूनियन द्वीप, न्यू कैलेडोनिया और फ्रेंच पोलिनेशिया के कारण।

भारत और फ्रांस का साझा दृष्टिकोण—मुक्त, खुला और नियम-आधारित इंडो–पैसिफिक—क्षेत्रीय स्थिरता का आधार है। संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, समुद्री डोमेन अवेयरनेस और हिंद महासागर में समन्वय भारत को Net Security Provider की भूमिका में सशक्त बनाते हैं। यह सहयोग का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक है।


4. प्रौद्योगिकी और नवाचार: शक्ति का नया स्रोत

2026 को India–France Innovation Year घोषित किया जाना भारत की हार्ड पावर और सॉफ्ट पावर के समन्वय का संकेत है।
AI, क्लीन एनर्जी, स्पेस, डिजिटल हेल्थ और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में सहयोग—

  • Indo-French Centre for AI in Health,
  • एयरोनॉटिक्स स्किलिंग हब,
  • ग्रीन हाइड्रोजन और न्यूक्लियर एनर्जी परियोजनाएँ—

भारत को तकनीकी उपभोक्ता से तकनीकी निर्माता की दिशा में अग्रसर कर रही हैं। ‘मेक इन इंडिया’ को फ्रांसीसी नवाचार से जोड़कर भारत वैश्विक वैल्यू-चेन हब के रूप में उभर रहा है, जिससे आर्थिक स्वायत्तता और प्रतिस्पर्धी लाभ दोनों सुदृढ़ होते हैं।


5. बहुपक्षवाद और वैश्विक शासन में साझेदारी

भारत और फ्रांस—संयुक्त राष्ट्र सुधार, जलवायु न्याय और वैश्विक दक्षिण की आवाज़—पर समान दृष्टिकोण रखते हैं। फ्रांस का UNSC का स्थायी सदस्य होना भारत के लिए रणनीतिक समर्थन का स्रोत है। आतंकवाद-रोधी सहयोग और जलवायु लचीलापन जैसे क्षेत्रों में समझौते इस बहुपक्षीय समन्वय को और मज़बूत करते हैं, जिससे भारत की वैश्विक वैधता बढ़ती है।


निष्कर्ष: भारत की नई वैश्विक पहचान

भारत–फ्रांस साझेदारी आज भारत को स्वायत्त निर्णयकर्ता, इंडो–पैसिफिक शक्ति और वैश्विक नवाचार भागीदार के रूप में पुनर्परिभाषित कर रही है। यह न तो तात्कालिक है, न ही प्रतिक्रियात्मक—बल्कि भारत की दीर्घकालिक रणनीति का अभिन्न हिस्सा है।

प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, “भारत–फ्रांस साझेदारी केवल द्विपक्षीय हित नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता की शक्ति है।”
UPSC के दृष्टिकोण से, यह संबंध भारत की विदेश नीति की परिपक्वता को दर्शाते हैं—जहाँ रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद और नवाचार भारत के वैश्विक नेतृत्व की कुंजी बनकर उभर रहे हैं।

With India today Inputs 

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