भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इज़राइल दौरा: रणनीतिक साझेदारी की नई ऊँचाइयों की ओर
परिचय
भारत और इज़राइल के बीच का रिश्ता पिछले तीन दशकों में एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी में विकसित हुआ है, जो रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि और नवाचार जैसे क्षेत्रों पर आधारित है। 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से दोनों देशों ने वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में एक-दूसरे का साथ दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2017 का ऐतिहासिक दौरा पहला ऐसा मौका था जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इज़राइल पहुंचे, और अब फरवरी 2026 में उनका दूसरा राज्य स्तरीय दौरा इस साझेदारी को और मजबूत करने का प्रतीक बन गया है। 25 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री मोदी इज़राइल पहुंचे, जहां दो दिवसीय यात्रा के दौरान दोनों देशों के नेताओं ने भविष्योन्मुखी सहयोग पर चर्चा की। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर है, और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की परीक्षा हो रही है।
दौरे की पृष्ठभूमि और रणनीतिक महत्व
यह यात्रा इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निमंत्रण पर हुई, जो मोदी के 2017 के दौरे के लगभग नौ साल बाद है। मोदी ने इज़राइल पहुंचते ही नेतन्याहू से मुलाकात की, जहां दोनों नेताओं ने रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा की और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा आर्थिक सहयोग पर विस्तृत वार्ता की। एक ऐतिहासिक कदम के रूप में, मोदी ने इज़राइल की संसद (Knesset) को संबोधित किया, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए पहला अवसर है। इसके अलावा, उन्होंने होलोकॉस्ट स्मृति स्थल Yad Vashem का दौरा किया और इज़राइल के राष्ट्रपति Isaac Herzog से भेंट की।
यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक भू-राजनीति में भारत की उभरती भूमिका को भी दर्शाता है। दोनों देशों ने "विशेष रणनीतिक साझेदारी" को और उन्नत करने पर सहमति जताई, जिसमें संयुक्त रक्षा उत्पादन, निवेश सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आतंकवाद विरोधी सहयोग शामिल हैं। मोदी की यात्रा ऐसे समय में हुई जब इज़राइल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार बना हुआ है, और दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। यह दौरा भारत की "मल्टी-एलाइनमेंट" नीति का प्रमाण है, जहां वह विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है।
क्षेत्रीय संदर्भ: अमेरिका-ईरान तनाव की छाया
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने इस दौरे को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के निकट बड़े पैमाने पर नौसैनिक बल तैनात किया है, जबकि ईरान का परमाणु कार्यक्रम वार्ताओं में रुकावट का सामना कर रहा है। अमेरिकी हमले की आशंका से इज़राइल और पूरे क्षेत्र में युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। ईरान द्वारा इज़राइल या अमेरिकी ठिकानों पर प्रतिक्रिया की संभावना से खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और रेमिटेंस पर असर पड़ सकता है।
भारत ने इस स्थिति में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। एक तरफ इज़राइल के साथ मजबूत रक्षा और प्रौद्योगिकी संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह का विकास और ऊर्जा सहयोग महत्वपूर्ण हैं। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में ईरान पर हमलों की निंदा से भारत ने दूरी बनाई, जो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का उदाहरण है। यह दौरा भारत को क्षेत्रीय शांति बनाए रखने और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का अवसर प्रदान करता है, जबकि वैश्विक अस्थिरता में उसकी भूमिका को मजबूत करता है।
द्विपक्षीय सहयोग के प्रमुख आयाम
भारत-इज़राइल साझेदारी बहुआयामी है, और इस दौरे ने इन क्षेत्रों में नई ऊर्जा भरी है। निम्नलिखित प्रमुख आयाम हैं:
1. रक्षा और सुरक्षा:
इज़राइल भारत का प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता है। ड्रोन प्रौद्योगिकी, मिसाइल रक्षा प्रणालियां और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ा है। इस दौरे में संयुक्त उत्पादन पर नए समझौते की संभावना है, जो भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल को मजबूत करेगा।
2. प्रौद्योगिकी और नवाचार:
AI, कृषि तकनीक (जैसे ड्रिप सिंचाई), जल प्रबंधन और स्टार्टअप इकोसिस्टम में सहयोग प्रमुख है। दोनों देशों ने संयुक्त नवाचार कार्यक्रमों पर चर्चा की, जो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा।
3. आर्थिक और व्यापारिक संबंध:
द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि हो रही है, विशेषकर रक्षा और उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में। निवेश सुरक्षा समझौते से भारतीय कंपनियां इज़राइल के बाजार में अधिक सक्रिय होंगी।
4. आतंकवाद विरोधी और क्षेत्रीय स्थिरता:
दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हैं। इस दौरे में खुफिया साझाकरण और सैन्य अभ्यास पर जोर दिया गया, जो मध्य पूर्व की चुनौतियों से निपटने में सहायक होगा।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 25-26 फरवरी 2026 का इज़राइल दौरा दोनों देशों के संबंधों में एक मील का पत्थर है। यह न केवल द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देता है, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित विदेश नीति को भी मजबूत करता है। अमेरिका-ईरान टकराव की पृष्ठभूमि में यह यात्रा भारत के लिए क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करने की चुनौती पेश करती है। भविष्य में, भारत-इज़राइल साझेदारी विकास, सुरक्षा और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावशाली साबित होगी, जो दोनों देशों को मजबूत बनाएगी। यह दौरा साबित करता है कि भारत अब एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर एक प्रमुख खिलाड़ी है, जो अपनी शर्तों पर दुनिया से जुड़ रहा है।
With Reuters and Indian Inputs
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