सिल्क रोड से आगे: उज़्बेकिस्तान के साथ भारत के मजबूत होते रिश्ते से जुड़ी 5 चौंकाने वाली बातें
1. प्रस्तावना: मध्य एशियाई कूटनीति का नया अध्याय
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उज़्बेकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "दोस्तलिक" (Friendship) ऑर्डर से सम्मानित किया जाना यूरेशियाई कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। यह सम्मान केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मध्य एशिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश के साथ भारत की गहरी होती साझेदारी की मान्यता है। क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक महत्व के कारण उज़्बेकिस्तान भारत की व्यापक महाद्वीपीय महत्वाकांक्षाओं में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह भू-आवेष्ठित (Landlocked) देश इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सिल्क रोड के ऐतिहासिक आकर्षण से परे, यह संबंध एक सुविचारित और आधुनिक रणनीतिक गठबंधन का प्रतिनिधित्व करता है। भू-राजनीतिक दृष्टि से यह साझेदारी भारत की "कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति" का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो दक्षिण एशिया की समुद्री शक्ति को यूरेशिया के संसाधन-संपन्न हृदयस्थल से जोड़ती है।
2. प्रमुख निष्कर्ष 1: "डबल लैंडलॉक्ड" होने की दुर्लभ स्थिति
उज़्बेकिस्तान विश्व के केवल दो "डबल लैंडलॉक्ड" देशों में से एक है। इसका अर्थ है कि यह ऐसे देशों से घिरा हुआ है जो स्वयं भी समुद्र से सीधे नहीं जुड़े हैं। इसके पड़ोसी देश हैं: कज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान।
ताशकंद के लिए यह भौगोलिक स्थिति लॉजिस्टिक्स की दृष्टि से एक बड़ी चुनौती है। इसलिए भारत जैसी समुद्री संपर्क क्षमता वाली अर्थव्यवस्था के साथ साझेदारी उसके लिए रणनीतिक आवश्यकता बन गई है।
इस भौगोलिक अलगाव को तोड़ने के लिए उज़्बेकिस्तान भारत को "खुले समुद्र तक पहुँच का सबसे छोटा मार्ग" मानता है। चूँकि पाकिस्तान के रास्ते पारंपरिक भू-मार्ग राजनीतिक कारणों से अवरुद्ध हैं, इसलिए चाबहार बंदरगाह (ईरान) और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसी परियोजनाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई हैं। इनका उद्देश्य क्षेत्रीय अस्थिरता को दरकिनार कर उज़्बेकिस्तान को सीधे हिंद महासागर से जोड़ना है।
3. प्रमुख निष्कर्ष 2: "दोस्तलिक" सिर्फ एक शब्द नहीं है
"दोस्तलिक" शब्द का अर्थ है "मित्रता"। लेकिन कूटनीति की दुनिया में इस सम्मान का महत्व इससे कहीं अधिक है। ऐसे प्रतीकात्मक सम्मान व्यापार, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग की दिशा में मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत देते हैं।
सम्मान स्वीकार करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा:
"यह सम्मान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान है।"
यह बयान दर्शाता है कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल औपचारिक यात्राओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक स्थायी और बहु-आयामी साझेदारी में बदल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शावकत मिर्ज़ियोयेव के नेतृत्व में "दोस्तलिक" की भावना अब केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि ठोस द्विपक्षीय नीति का आधार बन चुकी है।
4. प्रमुख निष्कर्ष 3: ताशकंद 1966 की ऐतिहासिक विरासत
भारत-उज़्बेकिस्तान संबंधों की मजबूत नींव वर्तमान दौर से कहीं पहले रखी गई थी। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है 1966 का ताशकंद समझौता।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान शांति वार्ता के लिए ताशकंद में मिले थे। इस ऐतिहासिक घटना ने उज़्बेकिस्तान को दक्षिण एशियाई मामलों में एक तटस्थ और स्थिर मंच के रूप में स्थापित किया।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विरासत दोनों देशों के बीच विश्वास की एक ऐसी नींव प्रदान करती है जो क्षेत्र के अन्य कई देशों के साथ उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि दोनों राष्ट्र आधुनिक चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास और सहयोग की भावना के साथ कर पा रहे हैं।
5. प्रमुख निष्कर्ष 4: यूरेनियम और ऊर्जा सुरक्षा का समीकरण
उज़्बेकिस्तान प्राकृतिक गैस, महत्वपूर्ण खनिजों और विशेष रूप से यूरेनियम के विशाल भंडारों से समृद्ध है। भारत के लिए, जो तीव्र औद्योगिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, ये संसाधन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विशेष रूप से, उज़्बेकिस्तान से मिलने वाला यूरेनियम भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे विश्वसनीय साझेदारों से परमाणु ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करना उसकी रणनीतिक प्राथमिकता बनती जा रही है।
इस संसाधन-संपन्नता ने उज़्बेकिस्तान को भारत की "कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति" का एक महत्वपूर्ण प्रवेशद्वार बना दिया है, जहाँ व्यापार और ऊर्जा सहयोग दीर्घकालिक सुरक्षा साझेदारी में परिवर्तित हो रहे हैं।
6. प्रमुख निष्कर्ष 5: "डस्टलिक" – रक्षा सहयोग के माध्यम से कूटनीति
भारत और उज़्बेकिस्तान की साझेदारी अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं है। यह रक्षा और सुरक्षा सहयोग के क्षेत्र में भी विकसित हो चुकी है, जिसका प्रमुख उदाहरण है "डस्टलिक" संयुक्त सैन्य अभ्यास।
दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच यह सैन्य सहयोग क्षेत्रीय अस्थिरता, विशेषकर अफ़ग़ानिस्तान से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियों, का सामना करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों देशों की साझा रुचि यह सुनिश्चित करना है कि उग्रवाद और आतंकवाद का प्रभाव सीमाओं के पार न फैले।
इस रक्षा सहयोग के प्रमुख आयाम हैं:
• आतंकवाद-रोधी अभियान
कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में चरमपंथी खतरों का मुकाबला करने हेतु संयुक्त अभ्यास।
• साइबर सुरक्षा
महत्वपूर्ण डिजिटल ढाँचे को राज्य और गैर-राज्य साइबर खतरों से सुरक्षित रखने के लिए सहयोग।
• खुफिया जानकारी साझा करना
कट्टरपंथ, सीमा-पार अपराध और आतंकवादी गतिविधियों पर वास्तविक समय में सूचना विनिमय।
निष्कर्ष: स्वर्णिम मार्ग का भविष्य
भारत और उज़्बेकिस्तान की साझेदारी तेजी से ऐसे क्षेत्रीय संतुलन का रूप ले रही है जहाँ पारंपरिक रूप से चीन और रूस का प्रभाव अधिक रहा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच पर बढ़ते सहयोग के साथ भारत एक ऐसे रणनीतिक साझेदार के रूप में उभर रहा है जो पारदर्शिता, डिजिटल सहयोग और संप्रभुता के सम्मान पर आधारित संबंधों की वकालत करता है।
आने वाले वर्षों में इस साझेदारी की सफलता काफी हद तक INSTC के विस्तार और व्यापार गलियारों के डिजिटलीकरण पर निर्भर करेगी।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है: क्या यह "डबल लैंडलॉक्ड" साझेदारी यूरेशिया के भू-राजनीतिक नक्शे को बदल सकती है?
यदि संसाधन-संपन्न मध्य एशियाई क्षेत्र और भारत जैसी उभरती समुद्री शक्ति का यह गठबंधन सफल होता है, तो भारत और उज़्बेकिस्तान मिलकर एक अधिक संतुलित, जुड़ी हुई और स्थिर यूरेशियाई व्यवस्था का खाका तैयार कर सकते हैं।
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