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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs in Hindi : 24 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख विश्लेषण व संकलन: 24 अप्रैल 2025


1-भारत का सिंधु जल संधि स्थगन निर्णय: एक रणनीतिक, नैतिक और कूटनीतिक विश्लेषण

भारत द्वारा 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय दक्षिण एशिया के रणनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ दर्शाता है। यह लेख इस निर्णय का विश्लेषण रणनीति, नैतिकता, कूटनीति और आंतरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से करता है।

रणनीतिक दृष्टिकोण

  • यह निर्णय पाकिस्तान द्वारा बढ़ते आतंकवादी हमलों और निरंतर उकसावे की प्रतिक्रिया में एक कड़ा संदेश है।
  • जल एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संसाधन है; भारत अब इस शक्ति का प्रयोग कर पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है।
  • यह निर्णय भारत की गैर-सैन्य रणनीतिक साधनों के प्रयोग की नीति को दर्शाता है।
  • यह सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत की दबावकारी कूटनीति (coercive diplomacy) का हिस्सा है।

नैतिक दृष्टिकोण

  • यह निर्णय एक नैतिक द्वंद्व को जन्म देता है—राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम अंतरराष्ट्रीय जल संधियों के मानवीय दायित्व।
  • आलोचकों का मानना है कि जल को कभी हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए, जबकि समर्थकों के अनुसार नागरिकों की सुरक्षा प्राथमिक नैतिक जिम्मेदारी है।
  • संधि के चलते रहने के बावजूद पाकिस्तान द्वारा निरंतर युद्ध और आतंक फैलाना इसके नैतिक औचित्य पर प्रश्न उठाता है।

कूटनीतिक प्रभाव

  • यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित कर सकता है।
  • हालांकि, भारत पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत कर इस निर्णय का औचित्य सिद्ध कर सकता है।
  • यह संधि के पुनर्समीक्षा और भारत-केंद्रित शर्तों पर पुनर्रचना का अवसर भी प्रदान करता है।

आंतरिक सुरक्षा और नागरिक-सैन्य समन्वय

  • यह निर्णय भारत की राजनीतिक और रणनीतिक संस्थाओं के बीच बढ़ते समन्वय को दर्शाता है।
  • इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारत अब उकसावे की स्थिति में अपनी नीति बदलने को तैयार है।
  • यह निर्णय "आक्रामक संयम" (Assertive Restraint) की नई भारतीय रणनीति को मजबूत करता है, जिसमें धैर्य तो है, लेकिन निर्णायक कार्रवाई की पूरी क्षमता भी।

निष्कर्ष

सिंधु जल संधि का स्थगन केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर उठाया गया रणनीतिक कदम है। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता की दृष्टि से जटिल अवश्य है, परंतु यह भारत की सुरक्षा नीति में बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाता है। ऐसे निर्णय न केवल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित करते हैं, बल्कि पुराने कूटनीतिक ढांचों की प्रासंगिकता को भी चुनौती देते हैं।



2-शिमला समझौते का निलंबन: दक्षिण एशिया की शांति पर मंडराता संकट

भूमिका:

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हुए आतंकवादी हमले ने भारत-पाक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर दी है। इस हमले के बाद पाकिस्तान ने 1972 के ऐतिहासिक शिमला समझौते को निलंबित कर दिया और भारतीय विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया है। इस घटनाक्रम ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को झकझोर दिया है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की शांति, स्थिरता और सुरक्षा को चुनौती दे दी है।


शिमला समझौता: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

शिमला समझौता, 2 जुलाई 1972 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुआ था। यह समझौता 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद हुआ था, जिसमें बांग्लादेश का गठन हुआ था। इसके प्रमुख प्रावधान थे:

  • द्विपक्षीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण वार्ता द्वारा किया जाएगा।
  • नियंत्रण रेखा (LOC) की स्थिति को बदला नहीं जाएगा।
  • बल प्रयोग या बल की धमकी का प्रयोग नहीं किया जाएगा।

यह समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच एक बुनियादी शांति संरचना की नींव था।


वर्तमान घटनाक्रम: क्यों निलंबित हुआ शिमला समझौता?

पाकिस्तान ने यह कदम क्यों उठाया?

  1. आंतरिक दबाव: पहलगाम आतंकी हमले को लेकर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया और पाकिस्तान पर लगाए गए आरोपों के कारण पाकिस्तानी सरकार पर आंतरिक राजनीतिक दबाव बढ़ा है।
  2. कूटनीतिक प्रतिक्रिया: भारत की ओर से पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीति और कठोर सार्वजनिक बयानबाज़ी के जवाब में पाकिस्तान ने यह कदम उठाया।
  3. LOC पर बढ़ते तनाव: नियंत्रण रेखा पर लगातार संघर्षविराम उल्लंघनों और सैन्य झड़पों के कारण पाकिस्तान अब LOC के नियमों से खुद को मुक्त मान रहा है।

प्रभाव: क्या दांव पर है?

1. क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव

शिमला समझौते के निलंबन से LOC पर संघर्ष की संभावनाएँ बढ़ जाएंगी। इससे सीमा पर रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

2. राजनयिक चैनलों पर असर

इस निर्णय से भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे ट्रैक-2 डिप्लोमेसी, बैक-चैनल वार्ताओं और संपर्कों पर प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

3. अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभाव

पाकिस्तान के इस कदम से भारत को यह कहने का अवसर मिल गया है कि पाकिस्तान अब शांति का पक्षधर नहीं रहा। इससे पाकिस्तान की वैश्विक छवि कमजोर हो सकती है।

4. आर्थिक और हवाई यातायात पर प्रभाव

पाकिस्तान द्वारा हवाई क्षेत्र बंद करने से भारतीय एयरलाइंस को लंबे रास्तों से उड़ान भरनी होगी, जिससे ईंधन लागत, समय और किराया तीनों पर असर पड़ेगा।


भारत के लिए रणनीतिक विकल्प

  1. राजनयिक स्तर पर दबाव बनाए रखना: भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के इस निर्णय की निंदा करवाने का प्रयास करना चाहिए।
  2. LOC पर सतर्कता बढ़ाना: सैन्य तैयारी और निगरानी को बढ़ाना आवश्यक है।
  3. शांति की प्राथमिकता को दोहराना: भारत को यह प्रदर्शित करना चाहिए कि वह युद्ध नहीं, शांति चाहता है, परंतु आत्मरक्षा में कोई संकोच नहीं करेगा।

नैतिक और वैश्विक दृष्टिकोण से विश्लेषण

पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौते का निलंबन एक नैतिक विफलता के रूप में देखा जा सकता है। यह शांति और द्विपक्षीय समझौतों की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। यदि ऐसे समझौते राजनीतिक लाभ के लिए एकतरफा तोड़े जा सकते हैं, तो यह संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को अस्थिर कर देगा।


निष्कर्ष:

शिमला समझौते का निलंबन केवल एक कागज़ी समझौते की समाप्ति नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता पर एक गंभीर आघात है। भारत को इस चुनौती का उत्तर राजनयिक, रणनीतिक और नैतिक तीनों स्तरों पर देना होगा। आने वाले समय में यह घटनाक्रम क्षेत्रीय राजनीति की दिशा और भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है।




3-ट्रंप के टैरिफ युद्ध की थकान और भारत के लिए संभावनाएं

भूमिका:

अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के अंतर्गत वैश्विक व्यापार प्रणाली में भारी उथल-पुथल देखी गई है। विशेष रूप से चीन के साथ उनके टैरिफ युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को अस्थिर कर दिया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी-भरकम आयात शुल्कों (टैरिफ़) के जवाब में चीन ने भी प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगाए, किंतु अब उसने संकेत दिया है कि वह इन प्रतिक्रियाओं को विराम देगा। चीन ने अमेरिका के टैरिफ को ‘मजाक’ तक कह दिया है।

इस अनिश्चित और थकाऊ व्यापारिक संघर्ष से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान हो चुकी हैं, और वे वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की खोज में हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत जैसे देश के लिए यह एक अवसर है—जहाँ वह वैश्विक उत्पादन, निवेश और व्यापार का नया केंद्र बन सकता है। यह लेख विश्लेषण करता है कि भारत के कौन-से क्षेत्र इस भू-राजनीतिक व्यापार संघर्ष से लाभान्वित हो सकते हैं।


भारत के लिए संभावित लाभ

1. मैन्युफैक्चरिंग का स्थानांतरण:

"चीन +1" रणनीति के अंतर्गत कई अमेरिकी और वैश्विक कंपनियाँ अपनी उत्पादन इकाइयों को चीन से बाहर स्थानांतरित कर रही हैं। यदि भारत सरकार बेहतर लॉजिस्टिक्स, स्थिर नीतियाँ और श्रम सुधार उपलब्ध कराए, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित कर सकता है।

2. निर्यात बढ़ने की संभावना:

चीन से आयात पर अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के चलते कई उत्पाद अब महंगे हो गए हैं। भारत इन उत्पादों को विकल्प के रूप में अमेरिका को निर्यात कर सकता है, विशेषकर आईटी हार्डवेयर, फार्मास्यूटिकल्स और मशीन टूल्स जैसे सेक्टर्स में।

3. सॉफ्टवेयर और आईटी सर्विसेज:

चीन की तुलना में भारत की आईटी सेवा क्षमताएं अधिक परिपक्व हैं। अमेरिकी कंपनियां जो अब चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं, भारत की आईटी और डिजिटल सेवाओं को अधिक तरजीह दे सकती हैं।

4. बिजनेस सर्विस आउटसोर्सिंग (BPO) में अवसर:

अमेरिकी कंपनियां जो चीन में BPO सेवाएं लेती थीं, वे अब भारत में स्थानांतरित हो सकती हैं। यह भारत के सेवा क्षेत्र के लिए आर्थिक अवसर ला सकता है।


भारत के सामने चुनौतियाँ

  • इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी: भारत में चीन जैसी तेज़ और लागत-कुशल उत्पादन क्षमता की कमी है।
  • नीतिगत अनिश्चितता: निवेशकों को स्थिर और स्पष्ट नीतियों की अपेक्षा है।
  • लॉजिस्टिक लागत अधिक: भारत में माल ढुलाई की लागत अभी भी चीन की तुलना में अधिक है।

सरकार द्वारा उठाए गए प्रयास

  • पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम: भारत सरकार ने मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा आदि क्षेत्रों में उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए यह स्कीम लागू की है।
  • ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में सुधार: भारत ने पिछले वर्षों में विश्व बैंक की रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार किया है।
  • बुनियादी ढांचे पर निवेश: "गति शक्ति योजना" और "राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति" के ज़रिए सरकार लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने पर काम कर रही है।

निष्कर्ष:

ट्रंप युग की व्यापारिक नीतियाँ और चीन के साथ तनाव ने वैश्विक व्यापार संरचना को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भारत के लिए यह एक निर्णायक क्षण है, जहाँ वह वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और व्यापार तंत्र में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर सकता है। यदि भारत इन अवसरों को रणनीतिक रूप से उपयोग करे, तो वह आने वाले दशक में एक वैश्विक उत्पादन केंद्र बन सकता है।




4-पहलगाम आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान की साजिश? - एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

प्रस्तावना:

हाल ही में एक पाकिस्तानी पत्रकार आदिल राजा द्वारा किया गया दावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श में हलचल मचा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पोस्ट करते हुए बताया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के वरिष्ठ सूत्रों ने पुष्टि की है कि पाक सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने ISI को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले को अंजाम देने का आदेश दिया। यह दावा सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।


मुख्य आरोप क्या हैं?

  • आदिल राजा ने कहा है कि यह जानकारी उन्हें "भारतीय एजेंट" करार दिला सकती है, परंतु यह "तथ्य" है।
  • उन्होंने जनरल आसिम मुनीर की मानसिक स्थिरता पर सवाल उठाते हुए उनके नेतृत्व को लेकर चिंता जताई।
  • इस हमले के पीछे राज्य प्रायोजित आतंकवाद का आरोप सीधा पाकिस्तानी फौज पर लगाया गया है।

भारत की दृष्टि से इसका क्या महत्व है?

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया प्रतिक्रिया:
    यह आरोप भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत को न केवल आतंकवादी संगठनों से, बल्कि विदेशी सरकारों द्वारा पोषित आतंकवाद से भी सतर्क रहना होगा।

  2. राजनयिक मोर्चे पर अवसर:
    इस बयान का उपयोग भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे UN, FATF, आदि) पर पाकिस्तान के खिलाफ साक्ष्य के रूप में कर सकता है। यह भारत की कूटनीति को मजबूती दे सकता है।

  3. जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा दृष्टिकोण:
    इस प्रकार के हमले न केवल नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में विकास और स्थायित्व की प्रक्रिया को भी बाधित कर सकते हैं।


क्या पाकिस्तान में सेना और आईएसआई की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं?

पाकिस्तान में अक्सर सेना और ISI की भूमिका को 'राज्य के भीतर राज्य' की संज्ञा दी जाती है। आदिल राजा का बयान इसी आंतरिक शक्ति संघर्ष की ओर संकेत करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पाकिस्तानी लोकतंत्र कमजोर है और सेना अपने राजनीतिक व क्षेत्रीय हितों के लिए आतंकी गतिविधियों का सहारा ले सकती है।


नैतिक एवं मानवाधिकारों का प्रश्न:

  • यह कृत्य केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक चुनौती है।
  • पाकिस्तान के नागरिकों को भी सवाल उठाने चाहिए कि क्या उनकी सेना देश की सुरक्षा के बजाय क्षेत्रीय हिंसा को प्राथमिकता दे रही है?

निष्कर्ष:

पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका पर उठे यह आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून सभी पहलुओं से अत्यंत गंभीर हैं। भारत को चाहिए कि वह सतर्कता बढ़ाए, अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाए और इस प्रकार की साजिशों का कड़ा जवाब दे।


लेखक:
Arvind Singh, Gynamic GK
(UPSC विश्लेषक और समसामयिक विषयों पर टिप्पणीकार)



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जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

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भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...