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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Empowerment vs Protectionism in India: Constitutional Rights, Women’s Agency and State Intervention Debate

सशक्तिकरण बनाम संरक्षणवाद: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा

विशेष संपादकीय |

भूमिका: एक उभरता हुआ संवैधानिक द्वंद्व

समकालीन भारतीय राजनीति एक गहरे वैचारिक द्वंद्व के दौर से गुजर रही है। एक ओर ‘नारी शक्ति’, ‘समावेशी प्रतिनिधित्व’ और ‘सशक्तिकरण’ जैसे प्रगतिशील नारों के माध्यम से राज्य स्वयं को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक प्रस्तुत कर रहा है; वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन के अत्यंत निजी क्षेत्रों—विशेषकर विवाह, धर्म और पसंद—में उसका हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है। यह विरोधाभास केवल राजनीतिक रणनीति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों—स्वतंत्रता, समानता और गरिमा—की पुनर्व्याख्या की चुनौती भी है।

यह बहस आज केवल न्यायालयों या विधानसभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी प्रश्न को सामने लाती है: क्या राज्य नागरिकों का संरक्षक (protector) है या उनके अधिकारों का सक्षमकर्ता (enabler)?


राजनीतिक अनुकूलनशीलता: ‘इमेज’ और ‘आइडियोलॉजी’ का संतुलन

भारतीय राजनीति, विशेषकर सत्तारूढ़ दलों की रणनीति, समय के साथ बदलते सामाजिक समीकरणों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता पर आधारित रही है। हाल के वर्षों में महिलाओं को एक स्वतंत्र और निर्णायक मतदाता वर्ग (decisive electoral constituency) के रूप में पहचान मिली है। इसके परिणामस्वरूप, महिला सशक्तिकरण से जुड़े विधायी और नीतिगत कदमों—जैसे महिला आरक्षण—को एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया गया है।

यह नैरेटिव एक दिलचस्प समन्वय प्रस्तुत करता है—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिक प्रगतिशीलता का। इसमें महिलाओं को परंपरागत मूल्यों की संरक्षक के रूप में भी देखा जाता है और आधुनिक नेतृत्व की सहभागी के रूप में भी। किंतु यहीं पर एक सूक्ष्म विरोधाभास जन्म लेता है: क्या यह सशक्तिकरण वास्तविक ‘एजेंसी’ (agency) प्रदान करता है, या यह केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित है?


धर्म परिवर्तन कानून: स्वतंत्रता बनाम विनियमन

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में लागू धर्म परिवर्तन विरोधी कानूनों ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है। इन कानूनों का घोषित उद्देश्य जबरन या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण को रोकना है, किंतु इनके प्रावधान कई संवैधानिक प्रश्न खड़े करते हैं।

1. निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

सर्वोच्च न्यायालय ने पुट्टस्वामी निर्णय (2017) में निजता को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। विवाह और धर्म, दोनों ही व्यक्ति की निजी पसंद के क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में, विवाह से पूर्व प्रशासनिक अनुमति या सूचना की अनिवार्यता व्यक्ति की निजता में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है।

2. पसंद की स्वतंत्रता (Right to Choice)

हादिया केस और शक्ति वाहिनी जैसे मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वयस्कों को अपनी पसंद से विवाह करने का पूर्ण अधिकार है। यह अधिकार केवल कानूनी नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा (dignity) और आत्मनिर्णय (self-determination) से जुड़ा हुआ है। प्रशासनिक प्रक्रियाएँ इस अधिकार पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ डाल सकती हैं—अर्थात् लोग कानूनी भय के कारण अपने अधिकारों का प्रयोग करने से हिचक सकते हैं।

3. ‘Parens Patriae’ और राज्य की भूमिका

राज्य का ‘Parens Patriae’ सिद्धांत यह मानता है कि राज्य नागरिकों के हित में उनके संरक्षक के रूप में कार्य कर सकता है। परंतु जब यह सिद्धांत वयस्क नागरिकों के निजी निर्णयों पर लागू होता है, तो यह एक प्रकार के संवैधानिक पितृत्ववाद (constitutional paternalism) का रूप ले लेता है, जो व्यक्ति की स्वायत्तता के विपरीत है।


‘नारी शक्ति’ बनाम ‘संरक्षणवादी मानसिकता’

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास उभरता है—एक ओर महिलाओं को ‘निर्णय लेने वाली स्वतंत्र इकाई’ (independent decision-maker) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वहीं दूसरी ओर कानून उन्हें ‘संरक्षण की पात्र’ (objects of protection) मानते हैं।

यह दृष्टिकोण अनजाने में पितृसत्तात्मक संरचनाओं को सुदृढ़ करता है। जब राज्य यह तय करने लगता है कि कौन-सा विवाह वैध है या किन परिस्थितियों में महिला का निर्णय ‘स्वतंत्र’ माना जाएगा, तो वह महिलाओं की एजेंसी को सीमित कर देता है। इस प्रकार, सशक्तिकरण का सार्वजनिक विमर्श और निजी जीवन में नियंत्रण की प्रवृत्ति एक साथ चलने लगती है।


राज्य का पक्ष: सुरक्षा की अनदेखी नहीं

हालाँकि, इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। राज्य यह तर्क देता है कि:

  • जबरन धर्मांतरण (forced conversion) की घटनाएँ सामाजिक तनाव को जन्म देती हैं
  • विवाह के नाम पर धोखाधड़ी (fraudulent intent) के मामले सामने आए हैं
  • कमजोर वर्गों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है

इस दृष्टिकोण से, कानून को एक निवारक उपाय (preventive mechanism) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अतः प्रश्न यह नहीं है कि राज्य को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि उस हस्तक्षेप की सीमा और प्रकृति क्या होनी चाहिए


संवैधानिक नैतिकता बनाम सामाजिक नैतिकता

भारतीय संविधान का मूल दर्शन ‘संवैधानिक नैतिकता’ (constitutional morality) पर आधारित है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और गरिमा को सर्वोपरि मानता है। इसके विपरीत, ‘सामाजिक नैतिकता’ अक्सर परंपराओं, रूढ़ियों और बहुसंख्यक दृष्टिकोण से प्रभावित होती है।

न्यायपालिका ने कई बार स्पष्ट किया है कि जब दोनों में टकराव हो, तो प्राथमिकता संवैधानिक नैतिकता को दी जानी चाहिए। इस संदर्भ में, धर्म परिवर्तन और विवाह संबंधी कानूनों की वैधता इसी कसौटी पर परखी जाएगी।


आगे की राह: संतुलन की आवश्यकता

इस जटिल द्वंद्व का समाधान किसी एक छोर पर खड़े होकर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए एक संतुलित और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • कानूनी स्पष्टता: कानूनों को इतना स्पष्ट और सीमित होना चाहिए कि उनका दुरुपयोग न हो
  • न्यायिक निगरानी: प्रशासनिक शक्तियों पर प्रभावी न्यायिक नियंत्रण आवश्यक है
  • जागरूकता और शिक्षा: महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना वास्तविक सशक्तिकरण का आधार है
  • राज्य की भूमिका में परिवर्तन: राज्य को ‘संरक्षक’ से ‘सक्षमकर्ता’ (enabler) की भूमिका में आना होगा

निष्कर्ष: सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ

भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह सशक्तिकरण को केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित न रखे, बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के व्यापक ढांचे में समझे। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में स्थान देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि उन्हें अपने जीवन के निजी निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो।

अंततः, एक सशक्त समाज वही होगा जहाँ राज्य नागरिकों की रक्षा तो करे, परंतु उनके विवेक और स्वतंत्रता पर अविश्वास न जताए। सच्चा सशक्तिकरण तभी संभव है जब अधिकार, गरिमा और स्वायत्तता—तीनों का समन्वय सुनिश्चित हो।

With The Indian Express Inputs 

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