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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Balochistan Violence Explained: Roots of Separatism, State Response and the Crisis of Trust in Pakistan’s Restive Province

बलूचिस्तान में हिंसा का नया चक्र: अलगाववाद की जड़ें और राज्य की चुनौतियाँ

पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में फरवरी 2026 की शुरुआत में भड़की हिंसा ने एक बार फिर इस क्षेत्र की गहरी असंतोष की तस्वीर पेश की है। पिछले 48 घंटों में हुए समन्वित हमलों ने न केवल दर्जनों लोगों की जान ली, बल्कि प्रांत की स्थिरता पर सवालिया निशान लगा दिया है। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है, जबकि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में बड़ी संख्या में उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया है। यह घटना न केवल स्थानीय अलगाववाद की जड़ों को उजागर करती है, बल्कि पाकिस्तानी राज्य के सामने खड़ी चुनौतियों को भी सामने लाती है।

हाल की घटनाओं का विवरण

1 फरवरी 2026 को, पाकिस्तानी अधिकारियों ने बताया कि बीएलए के उग्रवादियों ने प्रांत के विभिन्न शहरों में समन्वित हमले किए, जिनमें आत्मघाती विस्फोट, गोलीबारी और सुरक्षा चौकियों पर हमले शामिल थे। इन हमलों में कम से कम 31 नागरिकों की मौत हुई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, जबकि 17 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए। पाकिस्तानी सेना और पुलिस की जवाबी कार्रवाई में 40 घंटों के भीतर 145 उग्रवादियों को मार गिराया गया, जिसे प्रांतीय मुख्यमंत्री सरफराज बुग्टी ने दशकों में एक दिन की सबसे बड़ी सफलता बताया। हमलों की शुरुआत 31 जनवरी को हुई, जब सेना ने पहले से ही 41 उग्रवादियों को ढेर किया था।

बीएलए ने इन हमलों को 'ऑपरेशन हेरॉफ' (काला तूफान) का नाम दिया और दावा किया कि उन्होंने 84 सुरक्षा कर्मियों को मार गिराया तथा 18 को बंधक बनाया। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज कर दिया और कहा कि ये स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सके। प्रांत में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं और सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया। कुल मिलाकर, 190 से अधिक लोग मारे गए, जिसमें उग्रवादियों की संख्या सबसे अधिक है।

अलगाववाद की गहरी जड़ें

बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी आंदोलनों का गढ़ रहा है। यह प्रांत प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है—गैस, खनिज और तेल के भंडार यहां प्रचुर हैं—लेकिन स्थानीय बलूच समुदाय का एक बड़ा हिस्सा महसूस करता है कि इन संसाधनों का लाभ केंद्र सरकार और बाहरी निवेशकों को मिलता है, जबकि स्थानीय लोग वंचित रह जाते हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) और ग्वादर बंदरगाह जैसे परियोजनाओं ने विकास का वादा तो किया, लेकिन इनके साथ विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और स्थानीय रोजगार की कमी की शिकायतें जुड़ी हैं।

बलूच समुदाय में असंतोष की जड़ें राजनीतिक अलगाव में भी हैं। वे आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार उनकी सांस्कृतिक पहचान को दबाती है और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, जैसे जबरन गायब करना और अतिरिक्त न्यायिक हत्याएं। आर्थिक असमानता भी एक बड़ा मुद्दा है—प्रांत की जीडीपी पाकिस्तान के औसत से कम है, बेरोजगारी ऊंची है, और बुनियादी सुविधाओं की कमी है। इन कारकों से अलगाववादी समूहों को समर्थन मिलता है, जो स्थानीय युवाओं को भर्ती करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब नागरिक हताहत होते हैं, तो उग्रवाद और मजबूत होता है।

पाकिस्तानी राज्य की चुनौतियाँ

पाकिस्तानी सरकार की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से सैन्य रही है। हमलों के बाद, अधिकारियों ने 'फिटना-अल-हिंदुस्तान' जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर भारत पर हमलों को प्रायोजित करने का आरोप लगाया। पाकिस्तानी सेना ने दावा किया कि मारे गए उग्रवादियों के पास भारतीय समर्थन के सबूत मिले, लेकिन भारत ने इन आरोपों को निराधार बताकर खारिज कर दिया। कुछ रिपोर्ट्स में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे अन्य कारकों का भी जिक्र है, लेकिन ये आरोप असत्यापित हैं।

हालांकि, कई विश्लेषकों का कहना है कि समस्या की जड़ें आंतरिक हैं। सैन्य अभियान अल्पकालिक सफलता देते हैं, लेकिन राजनीतिक संवाद की कमी से चक्र दोहराता रहता है। प्रांत में तालिबान जैसे अन्य उग्रवादी समूह भी सक्रिय हैं, जो सुरक्षा चुनौतियों को जटिल बनाते हैं। इसके अलावा, सरकार ने आतंकवादियों के परिवारों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जैसे पासपोर्ट ब्लॉक करना और बैंक खाते फ्रीज करना, जो असंतोष को और बढ़ा सकता है।

आगे की राह: शांति की तलाश

बलूचिस्तान की हिंसा का यह चक्र तोड़ने के लिए सैन्य कार्रवाई से आगे सोचने की जरूरत है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि स्थानीय समुदायों के साथ संवाद, आर्थिक न्याय और संसाधनों के समान वितरण से ही स्थायी समाधान निकलेगा। सीपीईसी जैसी परियोजनाओं में स्थानीय भागीदारी बढ़ाने से विश्वास बहाल हो सकता है। लेकिन अगर पुरानी नीतियां जारी रहीं—जैसे विदेशी साजिशों पर दोषारोपण और दमन—तो असंतोष बढ़ेगा।

इतिहास सिखाता है कि दमन से विद्रोह नहीं रुकता; बल्कि बातचीत और न्याय से शांति आती है। क्या इस्लामाबाद अब व्यापक सुधारों की दिशा में कदम उठाएगा? समय ही बताएगा, लेकिन बलूचिस्तान की शांति पूरे पाकिस्तान की स्थिरता के लिए जरूरी है।

(यह विश्लेषण विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध सूत्रों पर आधारित है। घटनाओं के आंकड़े और दावे समय के साथ बदल सकते हैं।)

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