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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

COP30 in Brazil: Turning Climate Promises into Action for a 1.5°C Future

🌍 सीओपी30: जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्यान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

परिचय

जलवायु परिवर्तन आज मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। बढ़ते तापमान, चरम मौसमी घटनाएं, वनाग्नियां, जल संकट और जैव विविधता का क्षरण — ये सभी संकेत हैं कि पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के तहत आयोजित वार्षिक Conference of the Parties (COP) इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक नीति निर्धारण का सबसे महत्वपूर्ण मंच है।

10 से 21 नवंबर 2025 तक ब्राजील के बेलेम (Belém) शहर में आयोजित COP30 न केवल इस दिशा में एक ऐतिहासिक अवसर है, बल्कि “कार्यान्वयन का सम्मेलन” (Conference of Implementation) कहा जा रहा है। इस बार का उद्देश्य केवल नए वादे नहीं, बल्कि पिछले समझौतों — विशेष रूप से पेरिस समझौते — को वास्तविक क्रियान्वयन की दिशा में ले जाना है।


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: COP सम्मेलनों की यात्रा

COP सम्मेलनों की शुरुआत 1995 में बर्लिन से हुई थी, जिसकी नींव 1992 के रियो अर्थ समिट में रखी गई थी। तब से लेकर आज तक, जलवायु शासन की दिशा में कई मील के पत्थर स्थापित हुए हैं।

  • COP3 (क्योटो, 1997) — क्योटो प्रोटोकॉल ने विकसित देशों के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य तय किए।
  • COP21 (पेरिस, 2015) — सबसे बड़ा मोड़। पेरिस समझौते ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें हर देश को अपने उत्सर्जन घटाने की रणनीति स्वयं तय करनी थी।
  • COP26 (ग्लासगो, 2021) — कोयला उत्सर्जन घटाने और “नेट ज़ीरो” प्रतिज्ञाओं पर सहमति बनी।
  • COP27 (शर्म अल-शेख, 2022)हानि और क्षति कोष (Loss and Damage Fund) की स्थापना हुई।
  • COP28 (दुबई, 2023) — पहली बार जीवाश्म ईंधनों के “फेज-डाउन” पर वैश्विक सहमति बनी।
  • COP29 (बाकू, 2024) — वित्तीय प्रतिबद्धताओं और विकासशील देशों के समर्थन को केंद्र में रखा गया।

इन सभी सम्मेलनों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान वैश्विक उत्सर्जन दर पेरिस समझौते के 1.5°C लक्ष्य से काफी दूर है। अब COP30 का फोकस इस गैप को नीति से क्रियान्वयन में बदलने पर है।


COP30 का एजेंडा: कार्यान्वयन की छह आधारभूत धुरियाँ

ब्राजील ने COP30 के लिए छह प्रमुख पिलर्स या कार्यधाराएँ निर्धारित की हैं, जो पेरिस समझौते के ग्लोबल स्टॉकटेक (GST-1) के परिणामों पर आधारित हैं —

1️⃣ ऊर्जा, उद्योग और परिवहन का निम्न-कार्बन संक्रमण

मुख्य फोकस जीवाश्म ईंधनों से हटकर सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने पर है। हरित उद्योगों को प्रोत्साहन और डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप इस धुरी का केंद्र बिंदु हैं।

2️⃣ वन, महासागर और जैव विविधता का संरक्षण

अमेज़न वर्षावन की सुरक्षा COP30 का भावनात्मक और रणनीतिक केंद्र है। ब्राजील ने Tropical Forests Forever Facility (TFFF) की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य वैश्विक वनों को संरक्षित रखना और कार्बन सिंक को मजबूत बनाना है।

3️⃣ कृषि और खाद्य प्रणालियों का रूपांतरण

कृषि क्षेत्र वैश्विक उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा देता है। COP30 में जलवायु-स्मार्ट कृषि, कम-कार्बन खाद्य श्रृंखला और जल-संवेदनशील खेती जैसी पहलें प्रस्तावित हैं।

4️⃣ शहरी लचीलापन और जल संसाधन प्रबंधन

शहरों को क्लाइमेट-रेजिलिएंट बनाने के लिए अनुकूलन योजनाओं को प्राथमिकता दी गई है। इसमें बाढ़ प्रबंधन, जल संरचना का सुदृढ़ीकरण और सतत परिवहन प्रणालियों का विकास शामिल है।

5️⃣ मानव और सामाजिक न्याय

Just Transition Work Programme’ के तहत उन समुदायों को सहयोग देने की पहल है, जिनकी आजीविका जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों पर निर्भर रही है। इसमें स्वदेशी समुदायों और महिला नेतृत्व को विशेष महत्व दिया गया है।

6️⃣ वित्त, तकनीक और क्षमता निर्माण

COP29 में तय $300 अरब की जलवायु वित्तीय प्रतिबद्धता को अब $1.3 ट्रिलियन तक स्केल-अप करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही तकनीकी हस्तांतरण और विकासशील देशों में क्षमता निर्माण पर जोर दिया गया है।


अपेक्षित परिणाम और प्रमुख चुनौतियाँ

🌱 संभावित परिणाम

  • NDCs 3.0 का प्रस्तुतीकरण (2025 संस्करण) — हर देश 2035 तक के नए लक्ष्य पेश करेगा।
  • ‘बाकू टू बेलेम रोडमैप’ — वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पारदर्शी रूप में लागू करने की रूपरेखा।
  • ग्लोबल गोल ऑन अडैप्टेशन (GGA) — अनुकूलन के वैश्विक लक्ष्य की स्पष्ट परिभाषा।
  • 600 से अधिक साइड-इवेंट्स और सिविल सोसाइटी इनिशिएटिव्स — जलवायु न्याय, युवाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु।

 चुनौतियाँ

फिर भी, COP30 के सामने कई गंभीर अवरोध हैं:

  1. वित्तीय प्रतिबद्धता की कमी — विकसित देशों द्वारा 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष की प्रतिबद्धता अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
  2. राजनीतिक अस्थिरता — अमेरिका और यूरोप में आंतरिक राजनीतिक बदलाव जलवायु एजेंडा को कमजोर कर सकते हैं।
  3. लॉजिस्टिकल चुनौतियाँ — बेलेम के सीमित शहरी बुनियादी ढाँचे के कारण प्रतिभागियों के लिए आवास और परिवहन कठिनाइयाँ।
  4. निर्णय प्रक्रिया में सहमति पर निर्भरता — “वन-कंट्री, वन-वेटो” व्यवस्था कई बार प्रगति रोकती है। इसके सुधार के लिए बहुमत आधारित निर्णय प्रणाली की मांग उठ रही है।

भारत की भूमिका: विकास और जलवायु न्याय का संतुलन

भारत COP30 में एक संतुलित मध्यस्थ के रूप में उभरने की स्थिति में है।
देश अपनी 2035 NDCs और पहली राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (National Adaptation Plan) प्रस्तुत कर सकता है।

भारत की प्राथमिकताएँ होंगी:

  • सौर ऊर्जा का विस्तारइंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) के माध्यम से।
  • अनुकूलन वित्त की मांग — गरीब और जलवायु-संवेदनशील देशों के लिए न्यायपूर्ण फंडिंग।
  • ‘Lifestyle for Environment’ (LiFE) मिशन — व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर जलवायु-हितैषी व्यवहार को बढ़ावा देना।
  • न्यायपूर्ण संक्रमण (Just Transition) — ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव के दौरान श्रमिकों के हितों की सुरक्षा।

भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है — जलवायु कार्रवाई तभी न्यायसंगत होगी जब विकास का अधिकार और ऐतिहासिक जिम्मेदारी दोनों को समान रूप से मान्यता मिले।


निष्कर्ष

COP30, अमेज़न की धरती से उठती एक वैश्विक पुकार है — “अब वादे नहीं, कार्यान्वयन चाहिए।”
यह सम्मेलन जलवायु शासन की उस दिशा में कदम है, जहाँ घोषणाएँ नहीं बल्कि वास्तविक नीति परिवर्तन होंगे।

यदि COP30 अपने 30 प्रमुख लक्ष्यों पर ठोस प्रगति करता है, तो यह पेरिस समझौते के लक्ष्यों की दिशा में एक निर्णायक मोड़ होगा। परंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या विकसित देश वित्तीय व तकनीकी सहायता में वास्तविक ईमानदारी दिखाते हैं या नहीं।

अंततः, जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं — यह मानवता के अस्तित्व का प्रश्न है।
COP30 हमें यह याद दिलाता है कि पृथ्वी का भविष्य हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर निर्भर करता है।
यह सम्मेलन सचमुच “वैश्विक जलवायु न्याय” की दिशा में एक आशाजनक शुरुआत बन सकता है।


संदर्भ सूची

  • UNFCCC (2025): COP30 to take place 6–21 November 2025 in Belém, Brazil.
  • The Guardian (2025): Less arguing, more action: Will Brazil’s unorthodox approach to COP30 work?
  • UN News (2025): COP30 kicks off with urgent call to deliver on climate promises.
  • Inexp.in (2025): COP30 begins today in Brazil: Limited outcomes so far, focus on implementation.
  • COP30 Official Site (2025): Action Agenda.

जलवायु परिवर्तन की बढ़ती तीव्रता और COP30 की चुनौतियाँ

इस सप्ताह दक्षिण-पूर्व एशिया में लगातार आ रहे शक्तिशाली टाइफ़ून (योलांडा और त्रामी) ने फिलीपींस, वियतनाम और ताइवान में भारी तबाही मचाई है। हजारों लोग बेघर हो चुके हैं, सैकड़ों की मौत हो चुकी है और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है। इसी बीच, कैरिबियाई देश जमैका अभी-अभी तूफ़ान राफ़ाएल के कहर से उबरने की कोशिश कर रहा है, तो ब्राज़ील के कुछ हिस्से अभी भी पिछले महीने आए अभूतपूर्व बाढ़ और भूस्खलन के मलबे को हटा रहे हैं।  

ये कोई अलग-थलग घटनाएँ नहीं हैं। ये जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चरम मौसमी घटनाओं की नई सामान्य स्थिति का हिस्सा बनती जा रही हैं। IPCC की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (AR6) ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि ग्लोबल तापमान में 1.5°C से अधिक वृद्धि हुई तो इस तरह की चरम घटनाएँ न केवल बार-बार आएँगी, बल्कि उनकी तीव्रता भी कई गुना बढ़ जाएगी। आज हम ठीक उसी मोड़ पर खड़े हैं। वर्तमान में हम पहले से ही लगभग 1.3°C तापमान वृद्धि के दौर से गुज़र चुके हैं और 2030 तक 1.5°C की सीमा पार हो जाने की बहुत अधिक संभावना है।

इन्हीं भयावह परिस्थितियों के बीच ब्राज़ील के बेलेम शहर में COP30 सम्मेलन (11-22 नवंबर 2025) चल रहा है। यह पहला COP है जो पूरी तरह अमेज़न वर्षावन के दिल में आयोजित किया जा रहा है। यह प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस जंगल को हम "पृथ्वी का फेफड़ा" कहते हैं, वह आज खुद जलवायु परिवर्तन और अवैध कटाई की दोहरी मार झेल रहा है। इस बार सम्मेलन का मुख्य एजेंडा है: नया जलवायु वित्त लक्ष्य (New Collective Quantified Goal on Climate Finance) निर्धारित करना, जो 2009 में तय $100 बिलियन प्रतिवर्ष के पुराने लक्ष्य की जगह लेगा।

विकासशील देश मांग कर रहे हैं कि 2035 तक कम-से-कम 1 ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष जलवायु वित्त उपलब्ध हो, जिसमें से अधिकांश हिस्सा अनुकूलन (adaptation) और हानि-क्षति (loss and damage) कोष के लिए हो। लेकिन विकसित देश अभी भी 300-400 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष की बात कर रहे हैं। यह अंतर ही COP30 का सबसे बड़ा संकट बिंदु है।

सवाल सिर्फ़ धन का नहीं है। सवाल विश्वास का है। जब फिलीपींस जैसे देशों में एक ही महीने में तीन-तीन सुपर टाइफ़ून आ रहे हैं, जब ब्राज़ील में पहली बार "श्रेणी-5 स्तर" की बाढ़ आ रही है, जब जमैका जैसे छोटे द्वीपीय देश अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, तब सिर्फ़ "प्रतिबद्धता पत्र" काफी नहीं हैं। ज़रूरत है तत्काल, मूर्त और न्यायसंगत कार्रवाई की।

COP30 से दुनिया को तीन स्पष्ट संदेश चाहिए:

1. 2025 तक सभी देश अपने NDC (Nationally Determined Contributions) को 1.5°C पथ के अनुरूप अपडेट करें, जिसमें 2030 तक उत्सर्जन में कम-से-कम 45% और 2035 तक 60% कटौती का लक्ष्य हो।  

2. नया जलवायु वित्त लक्ष्य कम-से-कम 1 ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष हो, जिसमें 50% से अधिक अनुकूलन और loss & damage के लिए हो।  

3. जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का चरणबद्ध तरीके से पूर्ण उन्मूलन (phase-out) हो, न कि सिर्फ़ "कम करना" (phase-down)।

बेलेम की यह बैठक सिर्फ़ एक और COP नहीं है। यह मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ा नैतिक और अस्तित्व का प्रश्न है। यदि हम यहाँ भी विफल हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी। क्योंकि तब तक टाइफ़ून, बाढ़ और जंगल की आग सिर्फ़ खबरें नहीं रह जाएँगी; वे हमारी रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी होंगी।

समय बहुत कम बचा है। अब या तो हम सब मिलकर इतिहास बदल देंगे, या जलवायु हमें बदल देगी।

लेखक  

(10 नवंबर 2025, COP30 कवरेज के दौरान)

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ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...