Skip to main content

MENU👈

Show more

Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

  राजनीति शास्त्र (Polity & Political Science) की तैयारी को बनाएं आसान और सटीक! क्या आप UPSC, State PCS, UGC NET, PGT या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? सही मार्गदर्शन और बेहतरीन स्टडी मटेरियल के लिए विजिट करें: 🌐 www.politypoint.com Polity Point ही क्यों चुनें? विस्तृत एवं सरल नोट्स: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था और राजनीतिक सिद्धांत की आसान भाषा में समझ। परीक्षा-उन्मुख सामग्री: पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) का विश्लेषण और ट्रेंड के अनुसार स्टडी मटेरियल। क्विज़ और टेस्ट सीरीज़: अपनी तैयारी का सही आकलन करने के लिए नियमित अभ्यास प्रश्न। करंट अफेयर्स से जुड़ाव: राजव्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का सटीक कवरेज। 🎯 आज ही अपनी सफलता की नींव रखें! अभ्यास शुरू करने और अपनी तैयारी को अगली स्तर पर ले जाने के लिए अभी वेबसाइट पर जाएँ: 👉 www.politypoint.com (स्मार्ट स्टडी करें, सफलता हासिल करें!)

Was Pakistan’s Nuclear Arsenal Under U.S. Control? — Inside the Former CIA Officer’s Explosive Claim

क्या पाकिस्तान का परमाणु नियंत्रण अमेरिका के हाथों में था? — पूर्व CIA अधिकारी के दावे पर गंभीर सवाल

प्रस्तावना

हाल ही में एक ऐसा बयान सामने आया जिसने पूरे दक्षिण एशिया के रणनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
पूर्व सीआईए अधिकारी जॉन किरियाकौ ने दावा किया कि पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ को अमेरिका ने “लाखों डॉलर देकर खरीदा” और इसके बदले में मुशर्रफ ने पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार का नियंत्रण वाशिंगटन को सौंप दिया।

पहली नज़र में यह दावा उतना ही सनसनीखेज़ लगता है जितना असंभव।
परंतु इसे पूरी तरह खारिज करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की जड़ें कितनी गहरी और कितनी उलझी हुई हैं, खासकर उस दौर में जब “आतंक के खिलाफ युद्ध” का नाम लेकर अमेरिका ने पूरी दुनिया में अपनी पकड़ मज़बूत की थी।


अमेरिका-पाकिस्तान: भरोसे और संदेह की साझेदारी

अमेरिका और पाकिस्तान का रिश्ता हमेशा एक अजीब विरोधाभास रहा है —
एक तरफ साझेदारी और सहायता, दूसरी तरफ गहरा अविश्वास।
11 सितंबर 2001 के बाद जब अमेरिका ने आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध छेड़ा, तब जनरल परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तान उसका अहम सहयोगी बना।

वाशिंगटन ने इस्लामाबाद पर डॉलर बरसाए — 2002 से 2010 के बीच लगभग 18 अरब डॉलर की आर्थिक और सैन्य मदद दी गई।
यह मदद आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर थी, लेकिन इसकी असली भूमिका पाकिस्तान की नीतियों पर अमेरिकी पकड़ को बढ़ाना थी।
अमेरिकी रणनीतिक हलकों का मानना था कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक रूप से बाँधे रखा जाए, तो वह “जिम्मेदार सहयोगी” बना रहेगा।

मुशर्रफ ने भी यह संतुलन बखूबी साधा —
एक ओर वे अमेरिकी खेमे में दिखते रहे, दूसरी ओर पाकिस्तान के भीतर “संप्रभुता” और “राष्ट्रीय सुरक्षा” के रक्षक बनने की छवि बनाए रखी।
यही दोहरा खेल बाद में अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों की पहचान बन गया।


किरियाकौ का दावा और उसके मायने

अब आते हैं जॉन किरियाकौ के दावे पर।
वे CIA में कार्यरत रहे हैं और “व्हिसलब्लोअर” के रूप में जाने जाते हैं।
उन्होंने यह कहा कि अमेरिका ने मुशर्रफ को “खरीदा” और उसके बदले पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का नियंत्रण अमेरिका के पास चला गया।

यह दावा सुनने में जितना नाटकीय है, उसकी सच्चाई उतनी ही उलझी हुई है।
क्योंकि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम उसकी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना जाता है।
1970 के दशक में भारत के परमाणु परीक्षण के जवाब में शुरू हुआ यह कार्यक्रम पाकिस्तान के लिए “अस्तित्व की गारंटी” बन गया।

2001 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ “परमाणु सुरक्षा सहयोग” की बात जरूर की थी।
उसका उद्देश्य था —
कहीं आतंकवादी संगठन परमाणु सामग्री या तकनीक तक न पहुँच जाएँ।
इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को कुछ तकनीकी सहायता दी, जैसे “परमिशन एक्शन लिंक्स (PALs)” — एक सुरक्षा प्रणाली जिससे बिना शीर्ष आदेश के परमाणु हथियार सक्रिय नहीं किए जा सकते।
लेकिन यह तकनीकी सहयोग था, नियंत्रण का हस्तांतरण नहीं।


क्या अमेरिका वास्तव में पाकिस्तान को “खरीद” सकता था?

मुशर्रफ का कार्यकाल ऐसा दौर था जब पाकिस्तान का हर फैसला अमेरिका की प्रतिक्रिया देखकर ही होता था।
वॉशिंगटन पोस्ट से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स तक उस समय यह लिख चुके थे कि “मुशर्रफ अमेरिकी दबाव में जीते हैं।”
फिर भी “खरीद लेने” की बात सीधी नहीं है।

पाकिस्तान की सेना — खासकर उसका “स्ट्रेटेजिक प्लान्स डिवीजन (SPD)” — परमाणु कार्यक्रम को लेकर बेहद संवेदनशील है।
इस तंत्र में कोई भी निर्णय सामूहिक होता है और अमेरिका जैसी बाहरी शक्ति को उस पर नियंत्रण देना लगभग असंभव है।
किरियाकौ के बयान में न तो कोई दस्तावेज़ी साक्ष्य है, न कोई स्वतंत्र पुष्टि।

यह भी ध्यान रखना होगा कि किरियाकौ स्वयं CIA के खिलाफ बोलने के लिए जाने जाते हैं।
उनके कई बयान पहले भी विवादित रहे हैं।
इसलिए यह मान लेना कि उनका हर दावा शत-प्रतिशत सत्य है, भी जल्दबाज़ी होगी।


पाकिस्तान का जवाब और क्षेत्रीय असर

किरियाकौ के बयान के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तत्काल प्रतिक्रिया दी —
उन्होंने इसे “दुर्भावनापूर्ण और निराधार झूठ” बताया।
सरकार ने यह दोहराया कि “पाकिस्तान का परमाणु शस्त्रागार पूरी तरह सुरक्षित है और किसी विदेशी शक्ति का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं।”

पाकिस्तान के लिए यह प्रतिक्रिया केवल औपचारिक बयान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल है।
परमाणु हथियार वहाँ की जनता के लिए “सुरक्षा कवच” से अधिक, “गौरव का प्रतीक” हैं।
ऐसे में किसी बाहरी नियंत्रण की बात जनता के भीतर गहरी प्रतिक्रिया पैदा कर सकती थी —
और यह मुशर्रफ जैसे सैन्य शासक भी कभी नहीं चाहते थे।


भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए यह पूरा विवाद कुछ महत्वपूर्ण सबक छोड़ता है।

  1. परमाणु सुरक्षा सिर्फ तकनीकी नहीं, राजनीतिक विषय है।
    राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत कमजोरी किसी भी परमाणु राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है।

  2. संप्रभुता और पारदर्शिता दोनों जरूरी हैं।
    भारत का परमाणु नियंत्रण नागरिक-सुप्रीमेसी और संसदीय निगरानी में है, जो पाकिस्तान की सैन्य-प्रधान व्यवस्था से अधिक भरोसेमंद है।

  3. अमेरिकी नीतियों से सबक।
    अमेरिका का “आतंक के खिलाफ युद्ध” दरअसल उसके वैश्विक हितों की रक्षा का औजार रहा है।
    ऐसे में दक्षिण एशिया के देशों को अपनी नीतियाँ स्वतंत्र और दीर्घकालिक हितों के आधार पर तय करनी होंगी।


निष्कर्ष

जॉन किरियाकौ के दावे जितने सनसनीखेज़ हैं, उतने ही कमजोर साक्ष्यों पर टिके हैं।
यह कहना कि मुशर्रफ ने पाकिस्तान का परमाणु नियंत्रण अमेरिका को सौंप दिया, ऐतिहासिक और राजनीतिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।

हाँ, यह जरूर सही है कि उस दौर में अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के ज़रिए गहरे तक प्रभावित किया।
लेकिन नियंत्रण और प्रभाव में बहुत फर्क होता है।
पाकिस्तान का सैन्य ढांचा अपनी परमाणु क्षमता को “राष्ट्रीय गौरव” मानता है, और उसके लिए किसी बाहरी शक्ति को अधिकार देना असंभव है।

भारत के लिए यह पूरा प्रकरण याद दिलाता है कि
संप्रभुता की रक्षा केवल सीमाओं से नहीं, संस्थागत आत्मनिर्भरता और पारदर्शी शासन से होती है।
किरियाकौ का बयान भले ही विवादास्पद हो, पर उसने यह ज़रूर साबित किया है कि परमाणु सुरक्षा आज भी सिर्फ हथियारों का नहीं, राजनीतिक भरोसे का सवाल है।


📌 UPSC अभ्यर्थियों के लिए संकेत:

  • यह घटना अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक अप्रसार नीतियों और दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना से जुड़ा महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • GS Paper 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध) और GS Paper 3 (आंतरिक सुरक्षा व प्रौद्योगिकी) दोनों में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • प्रश्न रूप में:
    “अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में जॉन किरियाकौ के दावे दक्षिण एशिया में परमाणु सुरक्षा और संप्रभुता के प्रश्नों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?”

References

  • Ahmed, I. (2013). Pakistan: The Garrison State. Oxford University Press.
  • Epstein, S. B., & Kronstadt, K. A. (2012). Pakistan: U.S. Foreign Assistance. Congressional Research Service.
  • Hindustan Times. (2025). “Ex-CIA officer John Kiriakou claims Pervez Musharraf handed over Pakistan’s nuclear control to US.”
  • Khan, F. H. (2012). Eating Grass: The Making of the Pakistani Bomb. Stanford University Press.
  • Sanger, D. E. (2009). The Inheritance: The World Obama Confronts and the Challenges to American Power. Harmony Books.
  • Dawn. (2025). “Pakistan rejects claims of nuclear arsenal control handover to US.”

Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

India’s Freebie Culture: Welfare Safety Net or Fiscal Time Bomb?

रेवड़ी संस्कृति: सामाजिक सुरक्षा या भविष्य पर बढ़ता आर्थिक बोझ? भारत में "रेवड़ी संस्कृति" को लेकर बहस पिछले कुछ वर्षों में काफी तेज हुई है। चुनावी मंचों से लेकर टीवी डिबेट तक, मुफ्त बिजली, पानी, राशन और नकद सहायता जैसी योजनाएं लगातार चर्चा का विषय बनी रहती हैं। एक पक्ष इन्हें गरीबों के लिए जरूरी सहारा मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इन्हें सरकारी खजाने पर बोझ और आर्थिक अनुशासन के लिए खतरा बताता है। सवाल यह है कि क्या ऐसी योजनाएं वास्तव में समाज को मजबूत बनाती हैं, या फिर वे भविष्य की पीढ़ियों पर एक ऐसा आर्थिक बोझ डाल रही हैं जिसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी? इसका उत्तर न तो पूरी तरह "हां" में है और न ही पूरी तरह "नहीं" में। वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है। जब मुफ्त योजनाएं अर्थव्यवस्था को गति देती हैं अक्सर माना जाता है कि कल्याणकारी योजनाएं केवल सरकारी खर्च बढ़ाती हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जब सरकार गरीब परिवारों को मुफ्त राशन, बिजली या प्रत्यक्ष नकद सहायता देती है, तो उनके पास अपनी आय का कुछ हिस्सा अन्य जरूरतों पर खर्च करने के लिए बच जाता ह...

चीन का गोल्डन लूप क्या है? 25,000 KM की मेगा परियोजना से भारत क्यों चिंतित है

चीन का "गोल्डन लूप": क्या यह विकास की राह है या रणनीतिक शक्ति का नया प्रतीक? एक समय था जब चीन की महान दीवार उसकी सुरक्षा और अलगाववादी नीति का प्रतीक मानी जाती थी। लेकिन 21वीं सदी में चीन अपनी सीमाओं की सुरक्षा और संपर्क व्यवस्था को लेकर एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपना रहा है। इसी दिशा में चीन एक विशाल अवसंरचना परियोजना पर काम कर रहा है, जिसे अनौपचारिक रूप से "गोल्डन लूप" या "बॉर्डर-कोस्ट लूप" कहा जाता है। करीब 25,000 किलोमीटर लंबा यह सड़क नेटवर्क चीन की भूमि सीमाओं और तटीय क्षेत्रों को जोड़ने का प्रयास है। यह परियोजना न केवल चीन के दूरस्थ इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने का लक्ष्य रखती है, बल्कि इसके रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रभावों पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। क्या है गोल्डन लूप? गोल्डन लूप दरअसल चीन के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों को जोड़कर तैयार किया जा रहा एक व्यापक परिवहन नेटवर्क है। यह चीन की लगभग पूरी सीमा और समुद्री तट को कवर करता है तथा 14 पड़ोसी देशों से लगने वाले क्षेत्रों को जोड़ता है। चीन सरकार का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य सी...

45 साल बाद अमेरिका ने सीरिया को आतंकवाद सूची से हटाया: मध्य पूर्व की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव

45 वर्षों बाद: आतंकवाद सूची से सीरिया का हटना क्यों है वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव 26 अगस्त 2026 को मध्य पूर्व की कूटनीतिक संरचना, जिसने लगभग आधी सदी तक क्षेत्रीय राजनीति को परिभाषित किया था, आखिरकार बदल गई। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सीरिया को आधिकारिक रूप से राज्य प्रायोजित आतंकवाद (State Sponsors of Terrorism) की सूची से हटाना मात्र एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि एक गहरा भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण है। यद्यपि यह परिवर्तन 2024 के अंत में बशर अल-असद की सत्ता से विदाई के बाद आया, लेकिन पुराने शासन के पतन और इस डीलिस्टिंग के बीच का दो वर्षीय अंतराल यह दर्शाता है कि वाशिंगटन ने सावधानीपूर्वक स्थिति का आकलन किया। अमेरिका ने पिछले 24 महीनों में नई सरकार की स्थिरता का परीक्षण किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि 1979 की यथास्थिति से हटकर किया गया यह परिवर्तन अस्थायी अराजकता नहीं, बल्कि स्थायी सामान्यीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम है। 1979 की मुहर का अंत यह डीलिस्टिंग 45 वर्षों से चले आ रहे उस कूटनीतिक गतिरोध का औपचारिक अंत है, जो लंबे समय तक अमेरिका की लेवांत (Levant) नीति का आध...

AI Weapons and the Moral Red Line: क्या मशीनें इंसानों की मौत का फैसला करेंगी?

मृत्यु का एल्गोरिद्मीकरण: क्या हम जीवन और मृत्यु का फैसला मशीनों को सौंपने के लिए तैयार हैं? कुछ दशक पहले तक एल्गोरिद्म केवल कंप्यूटरों और डेटा सेंटरों तक सीमित थे। आज वही तकनीक युद्ध के मैदान तक पहुँच चुकी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब सिर्फ हमारी खोजों, खरीदारी या सोशल मीडिया गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर रही, बल्कि ऐसे हथियारों का हिस्सा बन रही है जो स्वयं लक्ष्य चुन सकते हैं और उन पर हमला कर सकते हैं। यही वह कारण है जिसके चलते संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (ICRC) ने दुनिया को एक गंभीर चेतावनी दी है। उनका मानना है कि मानवता एक ऐसी "नैतिक लाल रेखा" के करीब पहुँच रही है, जिसे पार करना केवल तकनीकी प्रगति का मामला नहीं होगा, बल्कि मानव मूल्यों और जिम्मेदारियों की बुनियादी परिभाषा को बदल देगा। आखिर यह "नैतिक लाल रेखा" क्या है? सवाल केवल इतना नहीं है कि मशीनें कितनी स्मार्ट हो रही हैं। असली चिंता यह है कि क्या हम किसी एल्गोरिद्म को यह अधिकार देने के लिए तैयार हैं कि वह तय करे कौन जीवित रहेगा और कौन मारा जाएगा। युद्ध के इतिहास में हथियार ...

BRICS Summit 2026: Bridge Builder or Global Power Bloc? 5 Key Takeaways from New Delhi

ब्रिज बिल्डर या नया पावर ब्लॉक? नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की 5 बड़ी बातें 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। भारत, चीन, रूस सहित कई प्रमुख देशों के नेता इस महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होंगे। ऐसे समय में जब BRICS तेजी से बदल रहा है और विस्तार कर रहा है, इसकी बढ़ती भूमिका वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। 1. "ब्रिज बिल्डर" के रूप में भारत की उभरती भूमिका भारत BRICS के सदस्य देशों के अलग-अलग हितों और दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। सहमति निर्माण की इस प्रक्रिया में भारत खुद को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सेतु के रूप में स्थापित कर रहा है। "भारत विभिन्न हितों वाले देशों के बीच एक 'ब्रिज बिल्डर' की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहा है।" 2. संयुक्त घोषणा-पत्र पर सहमति की बड़ी चुनौती इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा एक साझा संयुक्त घोषणा-पत्र (Joint Declaration) पर सहमति बनाना है। इसके लिए राजनयिक लगातार वार्ता कर रहे हैं। मुख्य मुद्दे हैं: पश्चिम एशिया...

Why Uzbekistan Matters to India: 5 Key Takeaways from a Growing Strategic Partnership

सिल्क रोड से आगे: उज़्बेकिस्तान के साथ भारत के मजबूत होते रिश्ते से जुड़ी 5 चौंकाने वाली बातें 1. प्रस्तावना: मध्य एशियाई कूटनीति का नया अध्याय हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उज़्बेकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "दोस्तलिक" (Friendship) ऑर्डर से सम्मानित किया जाना यूरेशियाई कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। यह सम्मान केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मध्य एशिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश के साथ भारत की गहरी होती साझेदारी की मान्यता है। क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक महत्व के कारण उज़्बेकिस्तान भारत की व्यापक महाद्वीपीय महत्वाकांक्षाओं में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह भू-आवेष्ठित (Landlocked) देश इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सिल्क रोड के ऐतिहासिक आकर्षण से परे, यह संबंध एक सुविचारित और आधुनिक रणनीतिक गठबंधन का प्रतिनिधित्व करता है। भू-राजनीतिक दृष्टि से यह साझेदारी भारत की "कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति" का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो दक्षिण एशिया की समुद्री शक्ति को यूरेशिया के संसाधन-संपन्न हृदयस्थल से जोड़ती है।...

Nepal Floods and the Himalayan Crisis: When Climate Change Meets Unplanned Development

संकट में हिमालय: नेपाल की त्रासदी हमें क्या सिखाती है? हिमालय को अक्सर "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे अधिक हिमनद पाए जाते हैं। यही हिमनद गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी महान नदियों को जीवन देते हैं। लेकिन आज हिमालय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ प्राकृतिक संतुलन और मानवीय हस्तक्षेप के बीच संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी आपदाएँ अब केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और विकास की गलत नीतियों का संयुक्त परिणाम हैं। नेपाल में आई हालिया आपदा की शुरुआत ऊँचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में हुई, जहाँ ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं। जब अत्यधिक वर्षा, बादल फटना या भू-स्खलन जैसी घटनाएँ इन झीलों को प्रभावित करती हैं, तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी विनाशकारी घटना...

SCO at 25: Why the Bishkek Summit Matters for the Emerging Multipolar World

सीमाओं से आगे: वैश्विक सुरक्षा के नए दौर में क्यों महत्वपूर्ण है 26वाँ एससीओ शिखर सम्मेलन दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ पारंपरिक गठबंधन बदल रहे हैं और नए शक्ति-केंद्र उभर रहे हैं। ऐसे समय में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 26वाँ शिखर सम्मेलन केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। 31 अगस्त और 1 सितंबर को किर्गिज़ गणराज्य की राजधानी बिश्केक में होने वाला यह सम्मेलन एससीओ की उस यात्रा को दर्शाता है, जो एक सीमित सुरक्षा मंच से आगे बढ़कर यूरेशिया की प्रमुख बहुपक्षीय संस्था के रूप में स्थापित हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित बिश्केक यात्रा और उससे पहले मध्य एशियाई देशों के साथ बढ़ते संपर्क इस बात का संकेत हैं कि भारत भी क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा के इस मंच को नई दृष्टि से देख रहा है। ऐसे में यह सम्मेलन केवल सदस्य देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की रणनीतिक दिशा तय करने वाला मंच बन सकता है। 25 वर्षों की यात्रा और नई चुनौतियाँ वर्ष 2025 एससीओ के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि संगठन अपनी स्थापना के...

Strategic Autonomy: Why India Keeps Its Embassy Open in Pyongyang

चुप्पी कोई रणनीति नहीं: उत्तर कोरिया के साथ भारत का राजनयिक पुल दशकों से पश्चिमी देशों का यही मानना रहा है कि 'अछूत' समझे जाने वाले देशों को सबक सिखाने का एक ही तरीका है—उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दो। लेकिन ऐसे देशों का लंबे समय तक टिके रहना यह साफ बताता है कि राजनयिक चुप्पी कोई सोची-समझी रणनीति नहीं, बल्कि अपना प्रभाव खो देने की मजबूरी है। जब दुनिया के ज्यादातर देश पूरी तरह से मुंह मोड़ रहे थे, तब नई दिल्ली ने बातचीत का दरवाजा खुला रखने का व्यावहारिक रास्ता चुना। आज के दौर में जब दुनिया में गुटबाजी काफी तेज हो गई है, उत्तर कोरिया में भारत का बने रहना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी बात मजबूती से रखने की एक परिपक्व कोशिश है। नया राजदूत और उपस्थिति का प्रभाव अगस्त 2026 में, भारत ने उत्तर कोरिया में नए राजदूत की नियुक्ति करके अपने इस अनूठे रुख को एक बार फिर साफ किया। ऊपर से देखने पर यह केवल अफसरों का एक सामान्य तबादला लग सकता है। लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप के इस बेहद नाजुक मंच पर औपचारिकताओं की अपनी कीमत होती है और आपकी मौजूदगी ही आपकी हैसियत तय करती है। किसी छोटे अधिकारी को भेजने के ब...

The 22% Formula: A New Roadmap to Resolve the India-China Border Conflict

भारत-चीन सीमा विवाद: क्या 22% का फॉर्मूला बन सकता है स्थायी शांति की कुंजी? भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पिछले छह दशकों से एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक रहा है। 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर समय-समय पर हुए तनाव, सैन्य टकराव और राजनीतिक मतभेदों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है। लेकिन अब एक नई रणनीति उभरती दिखाई दे रही है, जिसे विशेषज्ञ "फॉर्मूला 22%" का नाम दे रहे हैं। यह रणनीति इस सोच पर आधारित है कि पूरे सीमा विवाद को एक साथ सुलझाने के बजाय उन क्षेत्रों से शुरुआत की जाए जहां सहमति बनने की संभावना अधिक है। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो भारत-चीन सीमा पर स्थायी शांति की दिशा में यह सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है। आखिर क्या है 22% फॉर्मूला? 22% फॉर्मूला सीमा के उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां विवाद अपेक्षाकृत कम है। इसमें दो प्रमुख सेक्टर शामिल हैं: सिक्किम सेक्टर : लगभग 220 किलोमीटर मध्य सेक्टर (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) : लगभग 545 किलोमीटर दोनों को मिलाकर कुल 765 किलोमीटर सीमा बनती है, जो पूरी विवादित सीमा का...