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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...

Was Pakistan’s Nuclear Arsenal Under U.S. Control? — Inside the Former CIA Officer’s Explosive Claim

क्या पाकिस्तान का परमाणु नियंत्रण अमेरिका के हाथों में था? — पूर्व CIA अधिकारी के दावे पर गंभीर सवाल

प्रस्तावना

हाल ही में एक ऐसा बयान सामने आया जिसने पूरे दक्षिण एशिया के रणनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
पूर्व सीआईए अधिकारी जॉन किरियाकौ ने दावा किया कि पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ को अमेरिका ने “लाखों डॉलर देकर खरीदा” और इसके बदले में मुशर्रफ ने पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार का नियंत्रण वाशिंगटन को सौंप दिया।

पहली नज़र में यह दावा उतना ही सनसनीखेज़ लगता है जितना असंभव।
परंतु इसे पूरी तरह खारिज करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की जड़ें कितनी गहरी और कितनी उलझी हुई हैं, खासकर उस दौर में जब “आतंक के खिलाफ युद्ध” का नाम लेकर अमेरिका ने पूरी दुनिया में अपनी पकड़ मज़बूत की थी।


अमेरिका-पाकिस्तान: भरोसे और संदेह की साझेदारी

अमेरिका और पाकिस्तान का रिश्ता हमेशा एक अजीब विरोधाभास रहा है —
एक तरफ साझेदारी और सहायता, दूसरी तरफ गहरा अविश्वास।
11 सितंबर 2001 के बाद जब अमेरिका ने आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध छेड़ा, तब जनरल परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तान उसका अहम सहयोगी बना।

वाशिंगटन ने इस्लामाबाद पर डॉलर बरसाए — 2002 से 2010 के बीच लगभग 18 अरब डॉलर की आर्थिक और सैन्य मदद दी गई।
यह मदद आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर थी, लेकिन इसकी असली भूमिका पाकिस्तान की नीतियों पर अमेरिकी पकड़ को बढ़ाना थी।
अमेरिकी रणनीतिक हलकों का मानना था कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक रूप से बाँधे रखा जाए, तो वह “जिम्मेदार सहयोगी” बना रहेगा।

मुशर्रफ ने भी यह संतुलन बखूबी साधा —
एक ओर वे अमेरिकी खेमे में दिखते रहे, दूसरी ओर पाकिस्तान के भीतर “संप्रभुता” और “राष्ट्रीय सुरक्षा” के रक्षक बनने की छवि बनाए रखी।
यही दोहरा खेल बाद में अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों की पहचान बन गया।


किरियाकौ का दावा और उसके मायने

अब आते हैं जॉन किरियाकौ के दावे पर।
वे CIA में कार्यरत रहे हैं और “व्हिसलब्लोअर” के रूप में जाने जाते हैं।
उन्होंने यह कहा कि अमेरिका ने मुशर्रफ को “खरीदा” और उसके बदले पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का नियंत्रण अमेरिका के पास चला गया।

यह दावा सुनने में जितना नाटकीय है, उसकी सच्चाई उतनी ही उलझी हुई है।
क्योंकि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम उसकी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक माना जाता है।
1970 के दशक में भारत के परमाणु परीक्षण के जवाब में शुरू हुआ यह कार्यक्रम पाकिस्तान के लिए “अस्तित्व की गारंटी” बन गया।

2001 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ “परमाणु सुरक्षा सहयोग” की बात जरूर की थी।
उसका उद्देश्य था —
कहीं आतंकवादी संगठन परमाणु सामग्री या तकनीक तक न पहुँच जाएँ।
इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को कुछ तकनीकी सहायता दी, जैसे “परमिशन एक्शन लिंक्स (PALs)” — एक सुरक्षा प्रणाली जिससे बिना शीर्ष आदेश के परमाणु हथियार सक्रिय नहीं किए जा सकते।
लेकिन यह तकनीकी सहयोग था, नियंत्रण का हस्तांतरण नहीं।


क्या अमेरिका वास्तव में पाकिस्तान को “खरीद” सकता था?

मुशर्रफ का कार्यकाल ऐसा दौर था जब पाकिस्तान का हर फैसला अमेरिका की प्रतिक्रिया देखकर ही होता था।
वॉशिंगटन पोस्ट से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स तक उस समय यह लिख चुके थे कि “मुशर्रफ अमेरिकी दबाव में जीते हैं।”
फिर भी “खरीद लेने” की बात सीधी नहीं है।

पाकिस्तान की सेना — खासकर उसका “स्ट्रेटेजिक प्लान्स डिवीजन (SPD)” — परमाणु कार्यक्रम को लेकर बेहद संवेदनशील है।
इस तंत्र में कोई भी निर्णय सामूहिक होता है और अमेरिका जैसी बाहरी शक्ति को उस पर नियंत्रण देना लगभग असंभव है।
किरियाकौ के बयान में न तो कोई दस्तावेज़ी साक्ष्य है, न कोई स्वतंत्र पुष्टि।

यह भी ध्यान रखना होगा कि किरियाकौ स्वयं CIA के खिलाफ बोलने के लिए जाने जाते हैं।
उनके कई बयान पहले भी विवादित रहे हैं।
इसलिए यह मान लेना कि उनका हर दावा शत-प्रतिशत सत्य है, भी जल्दबाज़ी होगी।


पाकिस्तान का जवाब और क्षेत्रीय असर

किरियाकौ के बयान के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तत्काल प्रतिक्रिया दी —
उन्होंने इसे “दुर्भावनापूर्ण और निराधार झूठ” बताया।
सरकार ने यह दोहराया कि “पाकिस्तान का परमाणु शस्त्रागार पूरी तरह सुरक्षित है और किसी विदेशी शक्ति का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं।”

पाकिस्तान के लिए यह प्रतिक्रिया केवल औपचारिक बयान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल है।
परमाणु हथियार वहाँ की जनता के लिए “सुरक्षा कवच” से अधिक, “गौरव का प्रतीक” हैं।
ऐसे में किसी बाहरी नियंत्रण की बात जनता के भीतर गहरी प्रतिक्रिया पैदा कर सकती थी —
और यह मुशर्रफ जैसे सैन्य शासक भी कभी नहीं चाहते थे।


भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए यह पूरा विवाद कुछ महत्वपूर्ण सबक छोड़ता है।

  1. परमाणु सुरक्षा सिर्फ तकनीकी नहीं, राजनीतिक विषय है।
    राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत कमजोरी किसी भी परमाणु राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है।

  2. संप्रभुता और पारदर्शिता दोनों जरूरी हैं।
    भारत का परमाणु नियंत्रण नागरिक-सुप्रीमेसी और संसदीय निगरानी में है, जो पाकिस्तान की सैन्य-प्रधान व्यवस्था से अधिक भरोसेमंद है।

  3. अमेरिकी नीतियों से सबक।
    अमेरिका का “आतंक के खिलाफ युद्ध” दरअसल उसके वैश्विक हितों की रक्षा का औजार रहा है।
    ऐसे में दक्षिण एशिया के देशों को अपनी नीतियाँ स्वतंत्र और दीर्घकालिक हितों के आधार पर तय करनी होंगी।


निष्कर्ष

जॉन किरियाकौ के दावे जितने सनसनीखेज़ हैं, उतने ही कमजोर साक्ष्यों पर टिके हैं।
यह कहना कि मुशर्रफ ने पाकिस्तान का परमाणु नियंत्रण अमेरिका को सौंप दिया, ऐतिहासिक और राजनीतिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।

हाँ, यह जरूर सही है कि उस दौर में अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के ज़रिए गहरे तक प्रभावित किया।
लेकिन नियंत्रण और प्रभाव में बहुत फर्क होता है।
पाकिस्तान का सैन्य ढांचा अपनी परमाणु क्षमता को “राष्ट्रीय गौरव” मानता है, और उसके लिए किसी बाहरी शक्ति को अधिकार देना असंभव है।

भारत के लिए यह पूरा प्रकरण याद दिलाता है कि
संप्रभुता की रक्षा केवल सीमाओं से नहीं, संस्थागत आत्मनिर्भरता और पारदर्शी शासन से होती है।
किरियाकौ का बयान भले ही विवादास्पद हो, पर उसने यह ज़रूर साबित किया है कि परमाणु सुरक्षा आज भी सिर्फ हथियारों का नहीं, राजनीतिक भरोसे का सवाल है।


📌 UPSC अभ्यर्थियों के लिए संकेत:

  • यह घटना अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक अप्रसार नीतियों और दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना से जुड़ा महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • GS Paper 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध) और GS Paper 3 (आंतरिक सुरक्षा व प्रौद्योगिकी) दोनों में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • प्रश्न रूप में:
    “अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में जॉन किरियाकौ के दावे दक्षिण एशिया में परमाणु सुरक्षा और संप्रभुता के प्रश्नों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?”

References

  • Ahmed, I. (2013). Pakistan: The Garrison State. Oxford University Press.
  • Epstein, S. B., & Kronstadt, K. A. (2012). Pakistan: U.S. Foreign Assistance. Congressional Research Service.
  • Hindustan Times. (2025). “Ex-CIA officer John Kiriakou claims Pervez Musharraf handed over Pakistan’s nuclear control to US.”
  • Khan, F. H. (2012). Eating Grass: The Making of the Pakistani Bomb. Stanford University Press.
  • Sanger, D. E. (2009). The Inheritance: The World Obama Confronts and the Challenges to American Power. Harmony Books.
  • Dawn. (2025). “Pakistan rejects claims of nuclear arsenal control handover to US.”

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