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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

UPSC Current Affairs in Hindi : 19 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख संकलन: 19 अप्रैल 2025

संपादकीय लेख-1: दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की स्थिति और भारत की कूटनीतिक भूमिका: एक नैतिक और रणनीतिक दायित्व


दक्षिण एशिया, जहां विविधता को सभ्यता की नींव माना गया है, आज धार्मिक असहिष्णुता, मानवाधिकार हनन और अल्पसंख्यकों के दमन जैसे संकटों से जूझ रहा है। बांग्लादेश, जो स्वतंत्रता के समय एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में उभरा था, आज वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न के आरोपों से घिरा हुआ है। भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा इस संदर्भ में जारी हालिया बयान, केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक गंभीर चेतावनी भी है कि क्षेत्रीय स्थिरता का आधार केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवाधिकारों की रक्षा भी है।


बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और अल्पसंख्यकों की चुनौती

वर्तमान में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व प्रो. मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं, चुनावी संक्रमण काल से गुजर रही है। इसी दौर में हिंदू समुदाय के मंदिरों पर हमले, ज़बरन धर्मांतरण, और सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं में वृद्धि हुई है। ये घटनाएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि देश की शासन व्यवस्था अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में असफल रही है।
भारत ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बिना कोई भी लोकतंत्र पूर्ण नहीं हो सकता। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत को केवल देखता रहना चाहिए, या फिर एक क्षेत्रीय शक्ति होने के नाते सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?


भारत की विदेश नीति: नैतिकता और रणनीति के द्वंद्व में संतुलन

भारत की विदेश नीति "नेबरहुड फर्स्ट" और "सागर" (Security and Growth for All in the Region) जैसे सिद्धांतों पर आधारित रही है, जिनका उद्देश्य पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना है। किंतु जब पड़ोसी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हों, तो यह द्वंद्व उत्पन्न होता है — क्या संप्रभुता के नाम पर मौन रहना उचित है?

भारत को यह समझना होगा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कूटनीतिक अवसर भी है। यह अवसर है भारत की वैश्विक छवि को एक मानवतावादी लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करने का। इसके तहत भारत को संयुक्त राष्ट्र, सार्क और बिम्सटेक जैसे मंचों पर इस मुद्दे को उठाना चाहिए। इसके अतिरिक्त Track-II Diplomacy, बुद्धिजीवियों, मीडिया और नागरिक संगठनों के माध्यम से इस विषय पर जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।


द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव और संभावित उपाय

भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। व्यापार, सीमा सुरक्षा, और जल-विवाद जैसे कई मुद्दों पर सहयोग बना हुआ है। लेकिन यदि बांग्लादेश अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करता, तो यह सहयोग दीर्घकाल में कमजोर हो सकता है।

भारत को बांग्लादेश से स्पष्ट और ठोस आश्वासन लेना चाहिए कि वहां अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित हैं। यदि यह संभव न हो तो भारत को अपनी नीति में मानवाधिकार सशर्तता (Human Rights Conditionality) को शामिल करने पर विचार करना चाहिए — यानी सहायता, व्यापार और सहयोग ऐसे देशों से किया जाए जो नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।


निष्कर्ष: भारत की भूमिका एक 'वॉचडॉग' और 'सहयोगी' दोनों के रूप में

भारत को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि वह एक ‘बाहरी हस्तक्षेपकारी’ की छवि न बनाए, बल्कि एक संवेदनशील पड़ोसी के रूप में कार्य करे। उसे कूटनीति, नैतिकता और मानवतावाद के बीच संतुलन साधते हुए क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखना है। क्योंकि अगर पड़ोसी देशों में धार्मिक असहिष्णुता पनपेगी, तो उसकी छाया भारत की सीमाओं तक अवश्य पहुंचेगी।

अतः बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा केवल उनके अस्तित्व का प्रश्न नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के भविष्य की दिशा तय करने वाला प्रश्न है — और भारत उस दिशा-निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है।


नीचे इस समसामयिक मुद्दे पर आधारित UPSC Mains (GS-II) के दृष्टिकोण से संभावित प्रश्न दिए गए हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय संबंध, मानवाधिकार, तथा भारत की विदेश नीति से संबंधित हैं:


GS Paper-II (Governance, Constitution, Polity, Social Justice and International relations)

विषय: International Relations, Bilateral Relations, Human Rights


संभावित प्रश्न (UPSC Mains Style):

  1. "भारत-बांग्लादेश संबंधों की स्थिरता का आधार केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा भी है।" – इस कथन के आलोक में भारत की विदेश नीति की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (250 शब्द)

  2. "धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक सार्वभौमिक मानवाधिकार है, जिसे किसी देश की संप्रभुता का आड़ लेकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।" – दक्षिण एशियाई परिप्रेक्ष्य में इस कथन की व्याख्या कीजिए। (250 शब्द)

  3. बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न की घटनाओं का भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? भारत को इस संदर्भ में कौन-कौन से कूटनीतिक उपाय अपनाने चाहिए? (250 शब्द)

  4. "पड़ोसी देशों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन पर भारत की भूमिका नैतिक दायित्व से अधिक कूटनीतिक अवसर भी है।" – इस कथन की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए। (250 शब्द)


लेखक: Arvind Singh PK Rewa

ब्लॉग: Gynamic GK

टैग्स: #UPSCMains #HumanRights #IndiaBangladeshRelations #SouthAsia #GS2 #Diplomacy #MinorityRights


2-पाकिस्तान-श्रीलंका सैन्य अभ्यास की योजना क्यों टली? जानिए भारत की भूमिका.

हाल ही में एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब पाकिस्तान और श्रीलंका की नौसेनाओं के बीच प्रस्तावित सैन्य अभ्यास की योजना अचानक स्थगित कर दी गई। ये अभ्यास श्रीलंका के त्रिंकोमाली बंदरगाह के समीप आयोजित होना था — जो हिंद महासागर क्षेत्र का एक बेहद संवेदनशील और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाका है।

तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि यह योजना कुछ ही हफ्तों पहले shelve (स्थगित) कर दी गई? जवाब है — भारत की कूटनीतिक सतर्कता और स्पष्ट आपत्ति

त्रिंकोमाली: एक बंदरगाह, कई रणनीतियाँ

श्रीलंका का त्रिंकोमाली बंदरगाह दुनिया के सबसे गहरे प्राकृतिक बंदरगाहों में से एक है। यहां से पूरे हिंद महासागर पर नजर रखी जा सकती है, यही वजह है कि यह भारत के लिए बेहद अहम है।

भारत वर्षों से इस क्षेत्र को अपनी समुद्री सुरक्षा नीति का केंद्र मानता रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान — जो भारत का पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी है — इस इलाके में सैन्य गतिविधियाँ करता है, तो भारत के लिए यह चिंता का विषय बनता है।

भारत की आपत्ति और श्रीलंका की प्रतिक्रिया

मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के मुताबिक, भारत ने श्रीलंका सरकार को स्पष्ट तौर पर अपनी आपत्ति से अवगत कराया। नई दिल्ली ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार के सैन्य अभ्यास से क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ सकता है और इससे भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ेंगी।

श्रीलंका ने भारत की बात को गंभीरता से लेते हुए अभ्यास को फिलहाल के लिए टाल दिया है। यह कदम भारत-श्रीलंका के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों और परस्पर समझ को भी दर्शाता है।

बढ़ती समुद्री प्रतिस्पर्धा

यह मामला केवल पाकिस्तान-श्रीलंका या भारत-श्रीलंका तक सीमित नहीं है। दरअसल, पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कई देश इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भारत हर गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए है।

निष्कर्ष: कूटनीति की जीत

यह घटना एक बार फिर दर्शाती है कि कैसे कूटनीतिक संवाद और प्रभावी नीति निर्माण क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भारत ने बिना किसी आक्रामक रवैये के अपने हितों की रक्षा की और श्रीलंका ने भी अपने पुराने मित्र देश की चिंता को प्राथमिकता दी।


क्या भारत की यह नीति दीर्घकाल तक सफल रहेगी? क्या छोटे पड़ोसी देश दो बड़े देशों के बीच संतुलन बना पाएंगे?
अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर साझा करें!


शीर्षक-3: लद्दाख में मोबाइल कनेक्टिविटी और इसके व्यापक प्रभाव

प्रस्तावना:

भारत का सीमावर्ती क्षेत्र लद्दाख, जहाँ प्रकृति की कठोरता और दुर्गमता राष्ट्र की रक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा लेती है, अब एक ऐतिहासिक परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। भारतीय सेना द्वारा गलवान घाटी और सियाचिन ग्लेशियर जैसे सामरिक रूप से अति-संवेदनशील क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की सुविधा उपलब्ध कराना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार और एक भारत-श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को साकार करने की दिशा में एक दूरदर्शी प्रयास है।


संचार सुविधाएँ: सामरिक और सामाजिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी बदलाव

संचार एक आधुनिक राष्ट्र का आधार है। लद्दाख के इन दुर्गम क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना वहाँ तैनात सैनिकों के लिए मानसिक राहत का साधन है। अत्यधिक ठंड और विषम परिस्थितियों में सेवा दे रहे सैनिक अब अपने परिवार से सीधे संपर्क कर सकते हैं। यह भावनात्मक जुड़ाव उनकी कार्यक्षमता और मनोबल दोनों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

साथ ही, सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के लिए यह सुविधा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, डिजिटल बैंकिंग और सरकारी योजनाओं की पहुँच को सुलभ बनाएगी। यह ‘डिजिटल डिवाइड’ को कम करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।


सैन्य अभियानों में आधुनिक संचार तकनीक की भूमिका

21वीं सदी के सैन्य अभियानों में सूचनाओं की गति और सुरक्षा निर्णायक होती है। गलवान और सियाचिन जैसे क्षेत्रों में संचार के आधुनिक साधनों की उपलब्धता सेना को रियल टाइम इनपुट, समन्वय और आपातकालीन प्रतिक्रिया में मदद करती है। मोबाइल नेटवर्क, सैटेलाइट कनेक्टिविटी और उच्च फ्रिक्वेंसी संचार माध्यम सामरिक कुशलता को कई गुना बढ़ा देते हैं।


राष्ट्र की एकता का सशक्त प्रतीक

यह पहल केवल सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीमांत क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने की एक रणनीतिक कवायद है। सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी का विकास वहाँ के नागरिकों को यह संदेश देता है कि वे देश के ‘सीमांत’ नहीं, बल्कि ‘मूलभूत’ भाग हैं। यह ‘इंटीग्रेटेड नेशनल डेवेलपमेंट’ की अवधारणा को ज़मीनी स्तर पर मूर्त रूप देता है।


चुनौतियाँ और आवश्यक कदम

हालांकि, इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ, तापमान, बर्फबारी और दुर्गमता ऐसे हैं जो तकनीकी स्थापना और रखरखाव को कठिन बना देते हैं। इसके लिए दीर्घकालिक नीति, स्थानीय प्रशासन का सहयोग, और उच्च तकनीक आधारित समाधान की आवश्यकता है।

साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह सुविधा केवल सेना तक सीमित न रह जाए, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी समान रूप से लाभ मिले। इसके लिए नागरिक संचार ढाँचे का भी समानांतर विकास किया जाना चाहिए।


निष्कर्ष:

लद्दाख में मोबाइल कनेक्टिविटी की यह पहल केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि यह एक रणनीतिक, सामाजिक और भावनात्मक विजय है। भारतीय सेना ने यह सिद्ध किया है कि वह केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। यह एक ऐसा कदम है, जो सीमाओं को नहीं, दिलों को जोड़ता है।


विस्तारित विचार हेतु संभावित निबंध विषय:

  • ‘सीमावर्ती विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा: एक समन्वित दृष्टिकोण’
  • ‘संचार क्रांति: सैनिक से नागरिक तक’
  • ‘भारतीय सेना: रक्षक से राष्ट्र-निर्माता तक की यात्रा’

4-स्वस्थ भारत की ओर एक कदम: 'Food is Medicine' और लिवर स्वास्थ्य पर केंद्रित जनजागरूकता

हर वर्ष 19 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व लिवर दिवस केवल एक दिन की जागरूकता नहीं, बल्कि यह जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति दीर्घकालिक सोच का आह्वान है। 2025 की थीम 'Food is Medicine' हमें पुनः उस बुनियादी सिद्धांत की याद दिलाती है कि भोजन ही सबसे प्रभावी औषधि बन सकता है — यदि हम इसे समझदारी से चुनें और अपनाएं।

प्रधानमंत्री का संदेश: नेतृत्व और नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक

इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व लिवर दिवस के अवसर पर नागरिकों से तेल की खपत घटाने, मोटापे से सतर्क रहने और संपूर्ण स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की अपील की। यह संदेश एक सामान्य जन जागरूकता के स्तर से कहीं ऊपर है — यह नेतृत्व की नैतिक जिम्मेदारी और प्रोएक्टिव गवर्नेंस का उदाहरण है। जब कोई शीर्ष जनप्रतिनिधि स्वयं छोटे स्वास्थ्य सुधारों की वकालत करता है, तो यह व्यापक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।

"Small lifestyle changes can lead to significant social transformation."

इस विचार को मोदी के वक्तव्य से बेहतर और क्या समर्थन मिल सकता है? यह कथन नीति-निर्माताओं की सोच और आम नागरिकों की आदतों के बीच एक पुल बनाता है।

'Food is Medicine': आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में पारंपरिक सोच की वापसी

आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में जहां उपचार केंद्रित दृष्टिकोण हावी है, वहीं 'Food is Medicine' जैसी अवधारणाएँ निवारक स्वास्थ्य प्रणाली (Preventive Healthcare) की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य संसाधन सीमित हैं, वहां यह दृष्टिकोण कम लागत, अधिक प्रभावशीलता का समाधान प्रदान करता है।

लिवर स्वास्थ्य पर आधारित यह थीम यह बताती है कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि शरीर और समाज को स्वस्थ रखने का आधार बन सकता है।

लिवर स्वास्थ्य: नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता

भारत में लिवर रोग जैसे फैटी लिवर, हेपेटाइटिस और सिरोसिस तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका मुख्य कारण अनुचित खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और बढ़ता मोटापा है। इन बीमारियों की रोकथाम के लिए सरकार को निम्नलिखित उपाय करने चाहिए:

  • स्कूल स्तर पर पोषण शिक्षा
  • सस्ती और सुलभ स्क्रीनिंग सुविधाएं
  • फूड लेबलिंग और जन-जागरूकता अभियानों का विस्तार
  • जंक फूड और अत्यधिक तेल/नमक वाले उत्पादों पर नियंत्रण

इन उपायों से हम लिवर और अन्य जीवनशैली जनित रोगों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोक नेतृत्व का रिश्ता

प्रधानमंत्री की अपील यह दर्शाती है कि नैतिक नेतृत्व केवल नीति निर्माण में नहीं, बल्कि जीवनशैली में उदाहरण प्रस्तुत करने में भी होता है। UPSC के GS Paper 4 में नेतृत्व के नैतिक आयामों की चर्चा होती है, और यह प्रसंग उसी का जीवंत उदाहरण है।

"Ethical responsibility of public figures lies in promoting not just political agendas but also public well-being."

जब नेता स्वयं स्वास्थ्य-संबंधी अनुशासन अपनाते हैं और जनमानस को प्रेरित करते हैं, तो यह सामूहिक नैतिकता की भावना को सशक्त करता है।

UPSC दृष्टिकोण से प्रासंगिकता

यह विषय UPSC की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए कई आयामों में उपयोगी है:

  • GS Paper 2: सार्वजनिक स्वास्थ्य, जनकल्याण योजनाएं, जागरूकता अभियान
  • GS Paper 4: नैतिक नेतृत्व, व्यक्तिगत उदाहरण की शक्ति, निवारक नैतिकता
  • Essay Paper: "Food is Medicine", "Health is Wealth", "Public Awareness and Lifestyle Diseases" जैसे विषयों पर प्रभावशाली निबंध लेखन

निष्कर्ष

'Food is Medicine' कोई नारा नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शन है। प्रधानमंत्री का लिवर स्वास्थ्य पर बल देना, सिर्फ एक बीमारी की चर्चा नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है। यदि हम निवारक उपायों को अपनाएं, भोजन को औषधि समझें और नेतृत्व से प्रेरणा लें — तो एक स्वस्थ भारत केवल कल्पना नहीं, एक सच्चाई बन सकता है।


लेखक: Arvind Singh, Gynamic GK Blog
टैग्स: #WorldLiverDay #FoodIsMedicine #UPSCGS #PublicHealth #PreventiveCare #EthicsInGovernance



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ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...