गुजरात एक समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026: UPSC CSE हेतु संपूर्ण विश्लेषण
पाठ्यक्रम संबंध (Syllabus Mapping):
GS Paper-2 (शासन व्यवस्था, भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय एवं तुलनात्मक राजनीति)
1. चर्चा में क्यों? (Context)
हाल ही में गुजरात राज्य समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 को भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति (अनुच्छेद 201) प्राप्त हो गई है। उत्तराखंड के पश्चात् गुजरात देश का ऐसा दूसरा प्रमुख राज्य बन गया है, जिसने अपने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू की है।
यह कानून राज्य में विवाह, तलाक, संपत्ति का उत्तराधिकार, गोद लेने (Adoption) तथा लिव-इन संबंधों के लिए सभी धर्मों पर लागू होने वाला एक सर्वसमावेशी व एकीकृत कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
2. संवैधानिक एवं कानूनी आधार (Constitutional & Legal Framework)
समान नागरिक संहिता (UCC) का अर्थ है—नागरिकों की धार्मिक या व्यक्तिगत (Personal) मान्यताओं से परे होकर संपूर्ण भारत के राज्यक्षेत्र में विवाह, तलाक, संपत्ति व उत्तराधिकार संबंधी एक समान नागरिक कानून का होना।
अनुच्छेद 44 (DPSP): संविधान के भाग IV में निहित राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत यह प्रावधान है कि "राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा"।
समवर्ती सूची (List III, Entry 5): सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 के तहत संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को विवाह, तलाक और उत्तराधिकार पर कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
मौलिक अधिकारों से संतुलन: UCC को लागू करते समय अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 29-30 (सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकार) के साथ सामंजस्य बिठाना आवश्यक होता है।
3. गुजरात UCC विधेयक, 2026 की मुख्य विशेषताएँ (Key Provisions)
1. अनिवार्य विवाह एवं तलाक पंजीकरण:
सभी समुदायों के लिए विवाह का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है; पंजीकरण न होने पर सरकारी योजनाओं और कानूनी अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता है।
एकतरफा तलाक और प्रथागत तलाक (Customary Divorces) को अवैध घोषित कर अनिवार्य न्यायिक प्रक्रिया लागू की गई है।
2. लिव-इन संबंधों (Live-in Relationships) का नियमन:
लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया है।
लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को पूर्ण वैध माना जाएगा और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में समान उत्तराधिकार अधिकार मिलेगा ।
3. उत्तराधिकार एवं लैंगिक समानता:
पैतृक तथा स्व-अर्जित संपत्ति में पुत्र और पुत्री (विवाहित या अविवाहित) दोनों को समान अधिकार दिया गया है ।
विभिन्न समुदायों में महिलाओं पर लगने वाले उत्तराधिकार संबंधी पूर्वग्रहों व भेदभाव को समाप्त किया गया है।
4. बाल विवाह एवं बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध:
विवाह की कानूनी आयु (महिलाओं के लिए 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष) का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाएगा।
बहुविवाह (Polygamy) तथा निकाह हलाला जैसी कुरीतियों को कानूनन दंडनीय अपराध बनाया गया है।
4. पक्ष एवं विपक्ष में प्रमुख तर्क (Arguments Pro & Contra)
पक्ष में तर्क (Arguments in Favor):
लैंगिक न्याय व महिला सशक्तिकरण: व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के विरुद्ध मौजूद लैंगिक असमानता, विषम तलाक प्रक्रिया और उत्तराधिकार में भेदभाव समाप्त होगा।
समानता का सिद्धांत (Article 14): भारत के प्रत्येक नागरिक को जाति, लिंग और धर्म से परे कानून के समक्ष समान संरक्षण मिलेगा।
राष्ट्रीय एकीकरण: एक समान नागरिक ढांचा विविध सामाजिक वर्गों के बीच एकरूपता व बंधुत्व (Fraternity) को बढ़ावा देगा।
न्यायिक सरलीकरण: अलग-अलग समुदायों के जटिल व विरोधाभासी व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक कोड होने से न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ घटेगा।
विरोध में तर्क (Arguments Against):
धार्मिक स्वतंत्रता पर आशंकाएँ: आलोचकों का मानना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 (धर्म का आचरण व प्रचार करने की स्वतंत्रता) का अतिक्रमण करता है।
सांस्कृतिक बहुलवाद को खतरा: भारत की विविधता और विभिन्न जनजातीय व स्थानीय परंपराओं के लोप होने का भय व्यक्त किया जाता है।
संघवाद एवं राज्य स्तरीय विविधता: राज्यों द्वारा अलग-अलग UCC कानून बनाने से राज्यों के बीच ही कानूनों में भिन्नता आ सकती है, जिससे "एक देश, एक कानून" का मूल विचार प्रभावित हो सकता है।
21वें विधि आयोग का दृष्टिकोण (2018): विधि आयोग ने टिप्पणी की थी कि "इस स्तर पर समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय", बल्कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता है।
5. प्रमुख ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय (Landmark Judgments)
शाह बानो बेगम मामला (1985): सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार दिया और UCC लागू करने की वकालत की।
सरला मुद्गल मामला (1995): धर्म परिवर्तन कर दूसरा विवाह करने को असंवैधानिक ठहराया और UCC की आवश्यकता दोहराई ।
शायरा बानो मामला (2017): 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित करते हुए लैंगिक न्याय को प्राथमिकता दी।
6. UPSC Mains अभ्यास प्रश्न एवं मॉडल उत्तर ढांचा
प्रश्न: "समान नागरिक संहिता (UCC) भारत में लैंगिक न्याय और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दे सकती है, किंतु यह धार्मिक स्वतंत्रता एवं सांस्कृतिक विविधता से जुड़ी चुनौतियाँ भी उत्पन्न करती है।" गुजरात UCC विधेयक, 2026 के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
🎯 मॉडल उत्तर ढांचा (Model Structure for Mains):
भूमिका (30-40 शब्द): अनुच्छेद 44 (DPSP) का उल्लेख करते हुए गुजरात UCC विधेयक, 2026 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के संदर्भ से शुरुआत करे।
मुख्य भाग (160-170 शब्द):
1. लैंगिक न्याय व एकीकरण हेतु महत्व: अनिवार्य पंजीकरण, संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार, बहुविवाह/बाल विवाह पर रोक और लिव-इन से जन्मे बच्चों के कानूनी अधिकार।
2. चुनौतियाँ व चिंताएँ: अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के साथ टकराव, बहुसांस्कृतिक पहचान तथा राज्यों के अलग-अलग UCC से कानूनी जटिलता।
3. न्यायिक दृष्टिकोण: शाह बानो व शायरा बानो मामलों का संदर्भ।
निष्कर्ष / आगे की राह (40-50 शब्द): थोपने के स्थान पर सर्वसम्मति-आधारित सुधार; मौलिक अधिकारों, लैंगिक न्याय और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन स्थापित करना।
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