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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Daily Current Affairs: 27 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख संकलन व विश्लेषण: 27 अप्रैल 2025


1-नये भारत में पितृत्व के अधिकार की पुनर्कल्पना

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से तलाकशुदा और अविवाहित पुरुषों के सरोगेसी के अधिकार को लेकर मांगा गया जवाब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस की शुरुआत का संकेत देता है। महेश्वर एम.वी. द्वारा दायर याचिका केवल व्यक्तिगत आकांक्षा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में परिवार, पितृत्व और व्यक्तिगत गरिमा के बदलते मायनों को न्यायिक जांच के दायरे में लाती है।

वर्तमान कानूनी परिदृश्य

सरोगेसी (नियमन) अधिनियम, 2021 एक नैतिक और कानूनी प्रयास था, जिसका उद्देश्य वाणिज्यिक सरोगेसी के दुरुपयोग को रोकना और मातृत्व के शोषण को समाप्त करना था। परंतु, इस अधिनियम में सरोगेसी का अधिकार केवल विधिवत विवाहित दंपतियों और विधवा या तलाकशुदा महिलाओं तक सीमित किया गया, जबकि तलाकशुदा अथवा अविवाहित पुरुषों को इससे बाहर कर दिया गया। यह प्रावधान न केवल लैंगिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 को देश के लोकतांत्रिक ढांचे के मूल स्तंभों के रूप में देखा जाता है। अनुच्छेद 14 समानता का वादा करता है, और अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार को केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसमें गरिमामय जीवन जीने का अधिकार भी समाहित है। जब विधि एक विशेष वर्ग (यहां तलाकशुदा या अविवाहित पुरुष) को अन्य समान रूप से इच्छुक व्यक्तियों की तुलना में सरोगेसी का अवसर नहीं देती, तो वह अनुचित भेदभाव का उदाहरण बन जाती है।

इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका ने समय-समय पर प्रजनन अधिकारों को व्यक्तिगत स्वायत्तता के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मान्यता दी है। 'निजता के अधिकार' (Right to Privacy) को एक मौलिक अधिकार घोषित करने वाले Puttaswamy निर्णय में भी व्यक्तिगत प्रजनन विकल्पों को स्वतंत्रता के दायरे में लाया गया था।

समाज और परिवार की बदलती अवधारणाएँ

भारतीय समाज तेजी से विकसित हो रहा है। एकल माता-पिता, सह-पालन (co-parenting), और विविध पारिवारिक ढांचे आज के सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं। परिवार अब केवल एक पारंपरिक 'विवाहित पुरुष और महिला' के गठबंधन तक सीमित नहीं रह गया है। इस पृष्ठभूमि में, कानून का इस बदली हुई सामाजिक वास्तविकता के साथ तालमेल बिठाना आवश्यक है।

तलाकशुदा या अविवाहित पुरुष का सरोगेसी के माध्यम से पितृत्व की आकांक्षा कोई अपवाद नहीं है; बल्कि यह मान्यता है कि पालन-पोषण की क्षमता केवल वैवाहिक स्थिति या लिंग पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। माता-पिता बनने की इच्छा एक मानवीय भावना है जिसे संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।

विधायी सोच में व्यापकता की आवश्यकता

सरोगेसी कानून में संशोधन करते समय विधायकों को केवल शोषण के भय के आधार पर व्यापक निषेध लगाने के बजाय, अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कठोर प्रतिबंधों के बजाय नियमन और निगरानी के उपाय विकसित किए जाने चाहिए जो इच्छुक एकल अभिभावकों के अधिकारों और सरोगेट माताओं के हितों, दोनों की रक्षा करें।

यदि राज्य स्वयं को 'कल्याणकारी राज्य' के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, तो उसे हर व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता और समानता के अधिकार को संवैधानिक प्राथमिकता देनी होगी।

आगे का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाया गया यह प्रश्न भारत में पितृत्व, परिवार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर एक नई संवैधानिक सोच को प्रेरित कर सकता है। न्यायालय को इस अवसर का उपयोग एक ऐसा मानक स्थापित करने के लिए करना चाहिए जो व्यक्तिगत गरिमा, लैंगिक समानता और सामाजिक समावेशन के आदर्शों को मजबूती से उभार सके।

यदि भारत को वास्तव में एक प्रगतिशील और समावेशी लोकतंत्र बनना है, तो कानूनों को भी उस दिशा में विकसित होना होगा, जो हर नागरिक को बिना भेदभाव के जीवन के हर पहलू में गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित करे।


2-विचार | बहुजन प्रतीकों की राजनीति, हमारी सामूहिक चुप्पी और लोकतंत्र का भविष्य

भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में बहुजन नायकों—महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर—की विरासत न केवल ऐतिहासिक प्रेरणा का स्रोत है, बल्कि समकालीन सामाजिक न्याय के विमर्श का आधार भी है। हाल ही में प्रख्यात विद्वान कांचा इलैया द्वारा उठाए गए सवाल इस गंभीर प्रश्न को रेखांकित करते हैं: क्या हम इन नायकों के विचारों को वास्तव में आत्मसात करने को तैयार हैं, या हमारी श्रद्धा केवल प्रतीकात्मकता और स्मारकों तक सीमित है? यह प्रश्न न केवल सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से, बल्कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक समावेशन, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों से गहराई से जुड़ा है।

'फुले' फिल्म विवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा 'फुले' फिल्म के प्रदर्शन पर की गई कार्रवाई और सरकार की इस पर मौन सहमति एक चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाती है। यह केवल सेंसरशिप का मामला नहीं है, बल्कि उन ऐतिहासिक सत्यों को दबाने का प्रयास है, जिन्हें फुले और आंबेडकर जैसे समाज सुधारकों ने उजागर किया था। UPSC के दृष्टिकोण से, यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसके उचित प्रतिबंधों [अनुच्छेद 19(2)] के बीच तनाव को रेखांकित करता है। CBFC का यह कदम न केवल रचनात्मक स्वतंत्रता का हनन करता है, बल्कि उन सामाजिक सुधार आंदोलनों की स्मृति को भी कमजोर करता है, जिन्होंने भारत के आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे को आकार दिया।

इसके अतिरिक्त, यह विवाद सामाजिक समावेशन और प्रतिनिधित्व के व्यापक प्रश्न को उठाता है। बहुजन नायकों के चित्रण को नियंत्रित करने का प्रयास उन समुदायों की आवाज को दबाने का प्रयास है, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 46 (शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक समानता के लिए कमजोर वर्गों के उत्थान) के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

राजनीतिक जोखिम और सामाजिक न्याय का दावा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसी पार्टियां, जो सामाजिक समावेशन और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सशक्तीकरण का दावा करती हैं, इस प्रकार के विवादों में अपनी चुप्पी से राजनीतिक जोखिम मोल ले रही हैं। बहुजन आंदोलन केवल ऐतिहासिक स्मृति नहीं है; यह आज भी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के खिलाफ एक जीवंत संघर्ष है। मंडल आयोग की सिफारिशों और OBC आरक्षण के बाद से, बहुजन समुदायों की राजनीतिक चेतना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ऐसे में, उनकी भावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता न केवल सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाती है, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक नुकसान भी पहुंचा सकती है।

UPSC के संदर्भ में, यह मुद्दा सामाजिक न्याय, समावेशी शासन, और संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) जैसे विषयों से जुड़ा है। परीक्षा में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों में सामाजिक समावेशन और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन की चर्चा होती है। इस दृष्टिकोण से, फुले और आंबेडकर की विरासत को केवल प्रतीकात्मक सम्मान तक सीमित रखना संवैधानिक आदर्शों के साथ विश्वासघात है।

नारीवाद और जातिगत न्याय का अधूरापन

कांचा इलैया द्वारा सावित्रीबाई फुले के चित्रण पर मुख्यधारा नारीवादी आंदोलनों की चुप्पी पर उठाया गया सवाल भारतीय नारीवाद की सीमाओं को उजागर करता है। सावित्रीबाई केवल महिलाओं की शिक्षा की प्रणेता नहीं थीं; वे जातिगत और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ एक क्रांतिकारी आवाज थीं। उनकी विरासत पर हमला केवल नारीवादी आंदोलन का अपमान नहीं, बल्कि बहुजन स्वाभिमान पर भी प्रहार है।

UPSC के दृष्टिकोण से, यह मुद्दा सामाजिक आंदोलनों की अंतर्संबंधित प्रकृति (intersectionality) को रेखांकित करता है। नारीवाद, यदि जातिगत न्याय के सवालों को समाहित नहीं करता, तो वह अधूरा और विशेषाधिकार-केंद्रित (privileged) रह जाता है। यह भारतीय समाज में सामाजिक सुधार आंदोलनों की ऐतिहासिक जटिलताओं और उनके समकालीन प्रासंगिकता को समझने की आवश्यकता को दर्शाता है। GS-1 (सामाजिक सशक्तीकरण और समाज सुधार) और GS-2 (शासन और सामाजिक न्याय) के लिए यह एक महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक बिंदु है।

लोकतंत्र की चुनौतियां और भविष्य

फुले-आंबेडकर की विरासत को पुनर्परिभाषित या नियंत्रित करने का कोई भी प्रयास भारतीय लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। संविधान का प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का वादा करता है, और यह तभी संभव है जब ऐतिहासिक सत्यों को स्वीकार किया जाए और वंचित समुदायों की आवाज को मंच प्रदान किया जाए। प्रतीकात्मक श्रद्धांजलियों और स्मारकों के बजाय, इन नायकों के विचारों के साथ सच्चा संवाद आवश्यक है।

UPSC के दृष्टिकोण से, यह मुद्दा निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करने को प्रेरित करता है:

संवैधानिक मूल्य और सामाजिक न्याय: फुले और आंबेडकर की विचारधारा संविधान के मूल सिद्धांतों—समानता, स्वतंत्रता, और बंधुत्व—का आधार है। इन विचारों को दबाना संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन है।

संस्थागत जवाबदेही: CBFC जैसे संस्थानों की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, जो GS-2 के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है।

सामाजिक समावेशन और लोकतांत्रिक भागीदारी: बहुजन समुदायों की उपेक्षा लोकतंत्र में उनकी भागीदारी को कमजोर करती है, जो GS-4 (नैतिकता और समावेशी शासन) के लिए प्रासंगिक है।

निष्कर्ष

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि क्या हम फुले और आंबेडकर जैसे नायकों की विरासत को केवल प्रतीकों और स्मारकों तक सीमित रखेंगे, या उनके विचारों की क्रांतिकारी चुनौती को स्वीकार करेंगे। यह केवल इतिहास के साथ न्याय का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारे लोकतंत्र के भविष्य का भी सवाल है। UPSC की तैयारी के संदर्भ में, यह मुद्दा सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहरी समझ विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी सामूहिक चुप्पी बहुजन नायकों के संघर्षों को और अधिक अदृश्य न बनाए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और सामाजिक न्याय, बहुजन राजनीति, और संवैधानिक मूल्यों पर लिखते हैं।)

3-भारत के सबसे लंबे रेल टनल का निर्माण पूरा: चुनौतियों के बीच एक ऐतिहासिक उपलब्धि

26 अप्रैल, 2025 को लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (एलएंडटी) ने घोषणा की कि उत्तराखंड के देवप्रयाग और जनासू के बीच भारत के सबसे लंबे रेल टनल का निर्माण कार्य पूरा हो गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें ऐसे क्षण भी आए जब ऐसा लगा कि टनल ढह सकता है और पूरी परियोजना खतरे में पड़ सकती है। फिर भी, दृढ़ संकल्प और तकनीकी विशेषज्ञता के बल पर इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल किया गया।

परियोजना का महत्व

यह टनल, जो ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का हिस्सा है, उत्तराखंड के दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में रेल संपर्क को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लगभग 15.1 किलोमीटर लंबा यह टनल भारत का सबसे लंबा रेल टनल है और यह क्षेत्र में यातायात, पर्यटन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह परियोजना चारधाम यात्रा को और सुगम बनाने के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और बुनियादी ढांचे के अवसर भी प्रदान करेगी।

निर्माण के दौरान चुनौतियां

एलएंडटी के अनुसार, इस टनल के निर्माण में कई जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हिमालय की भूगर्भीय संरचना अपने आप में एक बड़ी बाधा थी। अस्थिर चट्टानें, भूजल का रिसाव, और भूकंपीय गतिविधियों का जोखिम इस परियोजना को और जटिल बनाता था। कुछ मौकों पर, निर्माण के दौरान चट्टानों के ढहने का खतरा इतना बढ़ गया कि पूरी परियोजना पर संकट मंडराने लगा। इसके अलावा, क्षेत्र की कठिन जलवायु और दुर्गम इलाकों ने लॉजिस्टिक्स और मशीनरी की आवाजाही को और मुश्किल बना दिया।
एलएंडटी ने बताया कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (एनएटीएम) और अन्य उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों के साथ-साथ अनुभवी इंजीनियरों और श्रमिकों की मेहनत ने इस परियोजना को सफल बनाया। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर निगरानी और त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता थी, ताकि किसी भी संभावित दुर्घटना को रोका जा सके।

तकनीकी और मानवीय योगदान

इस टनल के निर्माण में हजारों इंजीनियरों, तकनीशियनों और श्रमिकों ने दिन-रात मेहनत की। परियोजना की सफलता में उनकी मेहनत और समर्पण का बड़ा योगदान है। इसके अलावा, स्थानीय समुदायों ने भी परियोजना को समर्थन प्रदान किया, जिससे निर्माण कार्य सुचारू रूप से चल सका। इस परियोजना ने न केवल तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया, बल्कि सामूहिक प्रयास और दृढ़ता का भी उदाहरण पेश किया।

क्षेत्रीय और राष्ट्रीय प्रभाव

इस टनल के पूरा होने से उत्तराखंड में रेल कनेक्टिविटी में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। यह टनल ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हिमालयी क्षेत्रों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ेगा। इससे न केवल तीर्थयात्रियों को चारधाम यात्रा में सुविधा होगी, बल्कि स्थानीय व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, यह परियोजना सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीमावर्ती क्षेत्रों में रेल नेटवर्क को मजबूत करेगी।

भविष्य की संभावनाएं

इस टनल के निर्माण ने भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में एक नया मानक स्थापित किया है। यह परियोजना यह दर्शाती है कि जटिल भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के बावजूद, उचित योजना और तकनीकी नवाचार के साथ बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। भविष्य में, इस तरह की परियोजनाएं भारत के अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी कनेक्टिविटी और विकास को बढ़ावा दे सकती हैं।

निष्कर्ष

देवप्रयाग और जनासू के बीच भारत के सबसे लंबे रेल टनल का निर्माण पूरा होना न केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि है, बल्कि भारत के दृढ़ संकल्प और तकनीकी क्षमता का प्रतीक भी है। इस परियोजना ने न केवल उत्तराखंड के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक नई राह खोली है। यह टनल न केवल लोगों को जोड़ेगा, बल्कि विकास, समृद्धि और एकता के नए द्वार भी खोलेगा। लार्सन एंड टुब्रो और इस परियोजना से जुड़े सभी लोगों की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।



4-संपादकीय: गरीबी उन्मूलन की एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण प्रगति

विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट, जिसमें यह बताया गया है कि 2011-12 से 2022-23 के बीच भारत ने 17.1 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाला, देश के विकास मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव को दर्शाती है। अत्यधिक गरीबी दर का 16.2% से घटकर केवल 2.3% पर आ जाना न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि यह भारत में हो रहे गहरे संरचनात्मक परिवर्तनों का प्रमाण भी है।

ग्रामीण भारत, जो लंबे समय तक देश की गरीबी का मुख्य केंद्र रहा है, ने अत्यधिक गरीबी में 18.4% से गिरावट कर 2.8% तक की कमी देखी है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी गरीबी दर 10.7% से घटकर 1.1% रह गई है। ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि वित्तीय समावेशन, लक्षित कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक विकास ने वंचित समुदायों तक पहुंच बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई है।

इस प्रगति के पीछे प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का विस्तार और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) प्रणाली जैसे कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को प्रमुख कारक माना जा सकता है। जन धन योजना के माध्यम से वित्तीय समावेशन और स्वास्थ्य व शिक्षा तक बेहतर पहुँच ने भी गरीबी घटाने में योगदान दिया है।

फिर भी, इस उपलब्धि के साथ संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। अत्यधिक गरीबी में गिरावट भले ही सराहनीय हो, लेकिन सापेक्ष गरीबी (relative poverty) और आजीविका की नाजुकता जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। कोविड-19 महामारी जैसी आर्थिक आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि गरीबी रेखा के ऊपर उठे अनेक लोग अभी भी असुरक्षित हैं और किसी भी संकट से पुनः निर्धनता में धकेले जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, रोजगार की गुणवत्ता, पोषण स्तर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच जैसे मुद्दों में अभी भी क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताएँ मौजूद हैं। यदि इन बहुआयामी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो गरीबी उन्मूलन की यह सफलता आंशिक और अस्थायी सिद्ध हो सकती है।

भारत यदि आने वाले दशकों में एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है, तो उसे केवल आंकड़ों में गरीबी घटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे एक मजबूत, न्यायसंगत और समावेशी समाज के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। मानव पूंजी में निवेश, क्षेत्रीय संतुलन और मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली इस दिशा में अनिवार्य हैं।

अत्यधिक गरीबी के खिलाफ यह प्रगति निश्चित रूप से सराहना योग्य है। फिर भी, न्यायपूर्ण और टिकाऊ भारत की यात्रा अभी अधूरी है।




5-आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक एकजुटता की आवश्यकता

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है, बल्कि वैश्विक शांति व्यवस्था पर भी गहरे प्रश्नचिह्न अंकित करता है। इस घटना की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा की गई कड़ी निंदा स्वागतयोग्य है, किंतु इससे आगे बढ़कर आतंकवाद के प्रति एक ठोस और सुसंगत वैश्विक रणनीति की आवश्यकता स्पष्ट हो गई है।

यूएनएससी का यह वक्तव्य, जिसमें दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने की बात कही गई है, सिद्धांततः सटीक है, किंतु व्यावहारिकता में इसके क्रियान्वयन की राह चुनौतियों से भरी है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान, जिस पर आतंकवादी नेटवर्कों को शरण देने के गंभीर आरोप हैं, स्वयं इस समय यूएनएससी का अस्थायी सदस्य है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या वैश्विक संस्थाएं अपने निर्णयों में सचमुच निष्पक्ष और प्रभावी हो सकेंगी?

भारत लंबे समय से यह रेखांकित करता आया है कि आतंकवाद का कोई धर्म, कोई राष्ट्रीयता नहीं होती, और इसका किसी भी प्रकार से महिमामंडन या तर्कसंगत ठहराया जाना वैश्विक सुरक्षा के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। पहलगाम हमला इस कटु यथार्थ की एक और भयावह अभिव्यक्ति है।

आतंकवाद का राजनीतिकरण: एक बड़ी चुनौती

दुर्भाग्यवश, वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष अक्सर भू-राजनीतिक हितों का शिकार बन जाता है। कुछ देश आतंकवादी संगठनों को रणनीतिक उपकरण की भांति प्रयोग करते हैं, जबकि कुछ राष्ट्र अपने भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के प्रयास में इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लेते। जब तक आतंकवाद को 'अच्छा' और 'बुरा' कहकर विभाजित किया जाता रहेगा, तब तक इस वैश्विक संकट का कोई स्थायी समाधान संभव नहीं है।

भारत की भूमिका

भारत ने समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध एक व्यापक सम्मेलन (Comprehensive Convention on International Terrorism - CCIT) की आवश्यकता पर बल दिया है, किंतु दुर्भाग्यवश, अब तक व्यापक सहमति नहीं बन पाई है। पहलगाम जैसे हमले भारत को और भी दृढ़ संकल्पित बनाते हैं कि वह आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन को संगठित करे और दोषी देशों को वैश्विक मंचों पर अलग-थलग करे।

आगे का मार्ग

यूएनएससी का वक्तव्य एक सकारात्मक संकेत अवश्य है, किंतु वक्तव्यों से अधिक महत्वपूर्ण है ठोस कार्रवाई। वैश्विक समुदाय को यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले किसी भी राष्ट्र को दंडमुक्ति न मिले। इसके लिए वित्तीय प्रवाह पर रोक, हथियारों की आपूर्ति बंद करना और राजनीतिक दबाव जैसे ठोस उपाय अपनाने होंगे।

इसके अतिरिक्त, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आतंकवाद के विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और अनुकूल तंत्र विकसित करना चाहिए। केवल तब ही पहलगाम जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोका जा सकेगा।

निष्कर्षतः, पहलगाम हमला हमें यह स्मरण कराता है कि आतंकवाद आज भी वैश्विक समुदाय के समक्ष सबसे बड़ी और जटिल चुनौतियों में से एक है। यदि वैश्विक नेतृत्व इस अवसर का उपयोग आतंकवाद के विरुद्ध सच्ची एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए नहीं करता, तो आने वाला समय और भी अधिक अनिश्चित और असुरक्षित हो सकता है।


 मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु संभावित प्रश्न:

GS Paper 2 (Governance, International Relations, Polity)

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आतंकवाद के प्रति भूमिका की समीक्षा कीजिए। क्या इसके वर्तमान ढांचे में आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में प्रभावशीलता है?

"आतंकवाद वैश्विक शांति के लिए सबसे गंभीर चुनौती बन गया है।" इस कथन के संदर्भ में भारत के दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

पहलगाम आतंकी हमले के आलोक में भारत के आतंकवाद विरोधी कूटनीतिक प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए।

आतंकवाद के वित्तपोषण और प्रायोजन को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं? उनकी सीमाओं और प्रभावशीलता का विश्लेषण कीजिए।


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✍️ARVIND SINGH PK REWA

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ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा 18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ...

Trump’s Gaza “Board of Peace”: Power, Peacebuilding and the Future of Post-War Reconstruction

ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग प्रस्तावना 17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है। पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरा...

Jimmy Lai Case: Hong Kong National Security Law, Press Freedom and Global Human Rights Debate

हांगकांग–चीन संबंध और जिमी लाई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रेस स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का समग्र अकादमिक विश्लेषण भूमिका हांगकांग आज केवल एक वैश्विक वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, कानून और मानवाधिकारों के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है। इसकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक अतीत, “एक देश–दो प्रणाली” की अवधारणा और हाल के वर्षों में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की भूमिका को समग्रता में देखना आवश्यक है। जिमी लाई का मामला इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और प्रेस स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। 1. हांगकांग–चीन संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) चीन का पारंपरिक हिस्सा हांगकांग प्राचीन काल से चीनी साम्राज्यों का हिस्सा रहा। यह मुख्यतः मछली पकड़ने और स्थानीय व्यापार पर आधारित क्षेत्र था। मिंग और चिंग राजवंशों के समय इसे दक्षिण चीन का सामान्य तटीय इलाका माना जाता था। (ख) अफीम युद्ध और ब्रिटिश उपनिवेश 19वीं सदी में अफीम युद्धों ने हांगकांग के भाग्य को बदल दिया। 1842 की नानजि...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Gig Workers in India: Pain, Challenges and 10-Minute Delivery Crisis in Quick Commerce Sector

भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...

Trump’s “Board of Peace”: From Gaza Plan to Global Conflict Resolution

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...