ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा
18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है।
ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, क्योंकि रूस और चीन दोनों आर्कटिक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं।
जनता का प्रतिरोध: “हम बिकाऊ नहीं हैं”
17 जनवरी 2026 को ग्रीनलैंड और डेनमार्क में जो दृश्य देखने को मिला, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मामला केवल सरकारों के बीच की राजनीति नहीं है, बल्कि जनता की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। सबसे प्रतीकात्मक दृश्य तब बना, जब ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन स्वयं प्रदर्शनकारियों के साथ आगे बढ़ते दिखे।
लोग ग्रीनलैंड और डेनमार्क के झंडे लहराते हुए अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर बढ़ रहे थे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप समर्थकों की लाल “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” टोपी की नकल की, लेकिन उस पर लिखा था— “मेक अमेरिका गो अवे।” नारों में साफ संदेश था: “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है,” “हम अपना भविष्य खुद तय करेंगे,” और ग्रीनलैंडिक भाषा में “कलाल्लित नुनात”— यानी हमारी भूमि, हमारी पहचान।
डेनमार्क के बड़े शहरों—कोपेनहेगन, आरहूस, आल्बोर्ग और ओडेंस—में भी लोगों ने एकजुटता दिखाई। सर्वेक्षण बताते हैं कि लगभग 85 प्रतिशत ग्रीनलैंड निवासी अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं। दिलचस्प बात यह है कि बहुत से लोग भविष्य में डेनमार्क से पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन किसी भी हालत में अमेरिकी नियंत्रण स्वीकार नहीं करना चाहते। यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ है।
टैरिफ: ट्रंप की दबाव नीति
ट्रंप ने इस विरोध के जवाब में कूटनीति की जगह आर्थिक दबाव का रास्ता चुना। उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच “ट्रुथ सोशल” पर घोषणा की कि यदि ग्रीनलैंड की “पूर्ण और अंतिम खरीद” पर सहमति नहीं बनी, तो यूरोपीय देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाएंगे।
उनकी घोषणा के अनुसार,
1 फरवरी 2026 से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, फिनलैंड और ब्रिटेन से आने वाले सभी सामानों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगेगा।
1 जून 2026 से यह बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएगा और तब तक जारी रहेगा, जब तक ग्रीनलैंड को लेकर “डील” नहीं हो जाती।
ट्रंप का आरोप है कि यूरोपीय देश ग्रीनलैंड में सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाकर “खतरनाक खेल” खेल रहे हैं, जबकि अमेरिका ही आर्कटिक में शांति और स्थिरता का वास्तविक रक्षक है। यह रणनीति नई नहीं है; ट्रंप पहले भी व्यापार को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन इस बार निशाने पर अमेरिका के सबसे पुराने सहयोगी हैं।
यूरोप और नाटो की चिंता
यूरोपीय नेताओं ने इस कदम को खुली धमकी बताया। यूरोपीय आयोग और यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्षों ने इसे “ट्रांसअटलांटिक संबंधों के लिए खतरनाक सर्पिल” कहा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इसे पूरी तरह गलत ठहराया, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे “अस्वीकार्य” बताया।
नाटो के भीतर यह संकट और भी संवेदनशील है। डेनमार्क ने याद दिलाया कि वह नाटो का सदस्य है और गठबंधन का सामूहिक रक्षा सिद्धांत उस पर लागू होता है। हाल ही में ग्रीनलैंड में यूरोपीय देशों की कुछ सैन्य टुकड़ियाँ सुरक्षा अभ्यास के लिए भेजी गई हैं, लेकिन ट्रंप इसे सीधी चुनौती के रूप में देख रहे हैं। इससे नाटो की एकता पर सवाल खड़े हो गए हैं—क्या गठबंधन अपने ही सदस्य के खिलाफ आर्थिक युद्ध को स्वीकार कर सकता है?
अंतरराष्ट्रीय कानून और आत्मनिर्णय
यह संकट अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांतों को भी चुनौती देता है। किसी क्षेत्र को खरीदने का विचार औपनिवेशिक युग की याद दिलाता है, जब शक्तिशाली देश कमजोर क्षेत्रों को सौदे की तरह देखते थे। आज की दुनिया में संप्रभुता और आत्मनिर्णय को सर्वोच्च माना जाता है। ग्रीनलैंड के लोग साफ कह रहे हैं कि उनका भविष्य वे स्वयं तय करेंगे, न कि किसी विदेशी शक्ति की आर्थिक ताकत।
यह सवाल अब केवल ग्रीनलैंड का नहीं रहा। यदि आर्थिक दबाव से किसी क्षेत्र की किस्मत बदली जा सकती है, तो यह पूरे अंतरराष्ट्रीय तंत्र के लिए खतरनाक मिसाल बन जाएगी।
निष्कर्ष: छोटे द्वीप, बड़ी राजनीति
ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति यह दिखाती है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति में भी शक्ति की पुरानी भाषा खत्म नहीं हुई है, बस उसके तरीके बदल गए हैं। अब युद्धपोतों के साथ-साथ टैरिफ और बाजार भी हथियार बन चुके हैं।
ग्रीनलैंड का संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि छोटे और दूरस्थ क्षेत्र भी वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। यहाँ दांव पर केवल बर्फीली ज़मीन नहीं है, बल्कि संप्रभुता, आत्मसम्मान और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता है। यदि यह संकट बढ़ता है, तो अमेरिका-यूरोप संबंधों में गहरी दरार पड़ सकती है और नाटो जैसी संस्थाओं की एकता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
दुनिया अब यह देख रही है कि क्या आर्थिक दबाव लोकतांत्रिक इच्छाओं और संप्रभुता पर हावी हो पाएगा, या फिर ग्रीनलैंड के लोगों की आवाज— “हम बिकाऊ नहीं हैं”— आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करेगी।
With Reuters Inputs

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