ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण
भूमिका
इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’। इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है।
इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक?
यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।
पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना
गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है।
ट्रंप प्रशासन ने 2025 के अंत में एक व्यापक योजना पेश की, जिसके तहत:
- गाजा में हमास का निरस्त्रीकरण,
- एक तकनीकी और गैर-राजनीतिक फिलिस्तीनी प्रशासन,
- अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल की तैनाती,
- और पुनर्निर्माण के लिए बहु-राष्ट्रीय ढाँचा
प्रस्तावित किया गया।
इसी योजना के दूसरे चरण के रूप में ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ की अवधारणा सामने आई। इसे एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय निकाय के रूप में देखा जा रहा है जो गाजा के संक्रमणकालीन शासन और विकास की निगरानी करेगा।
इस बोर्ड की संरचना असामान्य है—इसमें कुछ देशों के लिए भारी आर्थिक योगदान के साथ स्थायी सदस्यता और कुछ के लिए सीमित अवधि की सदस्यता रखी गई है। ट्रंप स्वयं इसके आजीवन अध्यक्ष बताए जा रहे हैं, जिससे इसकी निष्पक्षता और बहुपक्षीयता पर सवाल भी उठ रहे हैं।
भारत का निमंत्रण: कूटनीतिक महत्व
भारत को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिलना यह दर्शाता है कि आज भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय-निर्माण में एक महत्वपूर्ण पक्ष बन चुका है।
भारत के मध्य पूर्व से संबंध बहुस्तरीय हैं:
- इजरायल के साथ मजबूत रक्षा और तकनीकी सहयोग,
- अरब देशों और खाड़ी क्षेत्र के साथ ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी संबंध,
- और फिलिस्तीनी मुद्दे पर पारंपरिक समर्थन तथा मानवीय सहायता।
ऐसे में भारत को आमंत्रित किया जाना उसकी “संतुलित मध्य पूर्व नीति” की अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।
भारत की भागीदारी के पक्ष में तर्क
1. वैश्विक भूमिका का विस्तार
भारत पहले ही जी-20 अध्यक्षता, क्वाड और ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। इस बोर्ड में भागीदारी भारत को पश्चिम एशिया की शांति प्रक्रिया में प्रत्यक्ष भूमिका दे सकती है।
2. भारत–अमेरिका संबंधों को मजबूती
ट्रंप प्रशासन भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम साझेदार मानता है। इस पहल में भागीदारी से दोनों देशों के रणनीतिक रिश्ते और गहरे हो सकते हैं।
3. आर्थिक और ऊर्जा हित
मध्य पूर्व की स्थिरता भारत के लिए केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता भी है। भारत अपनी 80% से अधिक ऊर्जा आवश्यकताएँ इसी क्षेत्र से पूरी करता है। गाजा और आसपास की अस्थिरता ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
4. पुनर्निर्माण में अवसर
गाजा के पुनर्निर्माण में भारतीय कंपनियों के लिए अवसंरचना, स्वास्थ्य, आवास और तकनीकी क्षेत्रों में अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत की भागीदारी के विपक्ष में तर्क
1. बोर्ड की विश्वसनीयता पर प्रश्न
ट्रंप की राजनीति अक्सर “अमेरिका फर्स्ट” और व्यक्तिकेंद्रित दृष्टिकोण से जुड़ी रही है। एक ऐसा बोर्ड, जिसमें वे आजीवन अध्यक्ष हों, भारत की बहुपक्षीय और नियम-आधारित विश्व व्यवस्था की सोच से टकरा सकता है।
2. संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर होने का खतरा
भारत परंपरागत रूप से संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय संस्थाओं का समर्थक रहा है। यदि यह बोर्ड यूएन के समानांतर या उसके स्थानापन्न के रूप में उभरता है, तो भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक सोच प्रभावित हो सकती है।
3. वित्तीय बोझ
स्थायी सदस्यता के लिए प्रस्तावित भारी आर्थिक योगदान भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए विवादास्पद हो सकता है, खासकर तब जब देश को स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन जैसी आंतरिक चुनौतियों पर भी संसाधन लगाने हों।
4. क्षेत्रीय राजनीति में उलझने का जोखिम
पाकिस्तान सहित कुछ विवादास्पद देशों की भागीदारी से यह मंच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन सकता है। इससे भारत अनावश्यक रूप से एक जटिल और भावनात्मक संघर्ष में फँस सकता है।
नैतिक और वैचारिक आयाम
भारत की विदेश नीति केवल शक्ति और हितों तक सीमित नहीं रही है। गुटनिरपेक्षता, रणनीतिक स्वायत्तता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व इसके मूल तत्व रहे हैं।
गाजा का मुद्दा केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी का भी प्रश्न है। भारत पहले ही फिलिस्तीन को मानवीय सहायता, दवाइयाँ और राहत सामग्री भेजता रहा है। यदि भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी एक पक्ष के एजेंडे का उपकरण न बने, बल्कि वास्तविक शांति और मानवीय न्याय का पक्षधर रहे।
निष्कर्ष: सतर्क संलग्नता ही सही रास्ता
भारत के लिए यह निमंत्रण सम्मान की बात है, लेकिन हर सम्मान स्वीकार करना विवेकपूर्ण नहीं होता।
मेरे विचार से भारत को इस बोर्ड में:
- पूर्ण और स्थायी सदस्यता से फिलहाल बचना चाहिए,
- लेकिन मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में सीमित और शर्तों के साथ भागीदारी करनी चाहिए।
इससे भारत:
- अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकेगा,
- ट्रंप की व्यक्तिगत राजनीति से दूरी भी बनाएगा,
- और साथ ही वैश्विक शांति में रचनात्मक योगदान भी देगा।
भारत को अपनी मूल विदेश नीति—बहुपक्षीयता, संतुलन और नैतिकता—पर कायम रहते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए। गाजा में शांति की राह लंबी और कठिन है, लेकिन भारत की भूमिका उसमें तभी सार्थक होगी जब वह शक्ति से नहीं, बल्कि विवेक और मानवीय मूल्यों से प्रेरित होगी।
With the India today Inputs
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