ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग
प्रस्तावना
17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था—‘बोर्ड ऑफ पीस’—के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था।
यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है।
पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक
अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरान 71,000 से अधिक फिलिस्तीनी और लगभग 1,671 इज़राइली मारे गए। बुनियादी ढांचा लगभग ध्वस्त हो गया, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई और लाखों लोग विस्थापन का शिकार हुए।
ट्रंप की शांति योजना को दो चरणों में बांटा गया:
- पहला चरण – युद्धविराम, बंधकों की रिहाई और मानवीय सहायता।
- दूसरा चरण – हमास का पूर्ण निशस्त्रीकरण, नेशनल कमिटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाज़ा (NCAG) की स्थापना, और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण।
इसी दूसरे चरण को लागू करने के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की परिकल्पना की गई है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’: संरचना और भूमिका
‘बोर्ड ऑफ पीस’ को एक ऐसे मंच के रूप में पेश किया गया है जो कूटनीति, वित्त, सुरक्षा और प्रशासन—चारों को एक साथ जोड़े। इसके मुख्य कार्य हैं:
- रणनीतिक पर्यवेक्षण
- अंतरराष्ट्रीय संसाधनों का जुटान
- पारदर्शिता और जवाबदेही
- गाजा को युद्ध से विकास की ओर ले जाना
इसके अधीन एक इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (ISF) भी तैनात की जाएगी, जिसकी कमान अमेरिकी मेजर जनरल जास्पर जेफर्स के हाथ में होगी।
संस्थापक कार्यकारी बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, विश्व बैंक अध्यक्ष अजय बंगा, जैरेड कुशर, अपोलो ग्लोबल के सीईओ मार्क रोवन और अमेरिकी उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गेब्रियल जैसे नाम शामिल हैं। साथ ही, क्षेत्रीय प्रतिनिधियों और पूर्व यूएन दूत निकोलाय म्लादेनोव को भी भूमिका दी गई है।
यह संरचना अपने आप में एक अनोखा मिश्रण है—राजनीति, पूंजी और सुरक्षा तंत्र का संकर मॉडल।
शक्ति और शांति का अंतर्संबंध
अकादमिक दृष्टि से यह बोर्ड “लिबरल पीसबिल्डिंग” और “रियलपॉलिटिक” के बीच खड़ा दिखाई देता है। एक ओर यह लोकतांत्रिक प्रशासन, विकास और स्थिरता की भाषा बोलता है, तो दूसरी ओर इसकी संरचना अमेरिकी नेतृत्व और रणनीतिक हितों से गहराई से जुड़ी है।
ट्रंप का स्वयं अध्यक्ष होना इस पहल को अंतरराष्ट्रीय से अधिक “व्यक्तिकेंद्रित कूटनीति” की ओर झुकाता है। आलोचक इसे “ट्रंप-शैली की शांति” कहते हैं—जहाँ शांति एक नैतिक परियोजना से अधिक एक रणनीतिक सौदा बन जाती है।
फिलिस्तीनी दृष्टिकोण: स्वामित्व या अधीनता?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस पूरी संरचना में फिलिस्तीनियों की वास्तविक भूमिका क्या है। फिलिस्तीनी समाज में यह आशंका गहरी है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ कहीं गाजा पर एक नया अंतरराष्ट्रीय संरक्षक शासन न थोप दे।
- क्या NCAG वास्तव में स्थानीय नेतृत्व को सशक्त करेगा या केवल तकनीकी नौकरशाही बनेगा?
- क्या पुनर्निर्माण की प्राथमिकताएँ गाजा के लोगों की जरूरतों से तय होंगी या दानदाताओं और भू-राजनीतिक हितों से?
यदि स्थानीय स्वामित्व और सहभागिता नहीं बनी, तो यह पहल भी अतीत की कई विफल शांति योजनाओं की तरह कागज़ी बनकर रह सकती है।
सुरक्षा की दुविधा: निशस्त्रीकरण और वापसी
हमास का पूर्ण निशस्त्रीकरण इस योजना की सबसे विवादास्पद शर्त है। इज़राइल इसे सुरक्षा की अनिवार्यता मानता है, जबकि कई फिलिस्तीनी इसे प्रतिरोध के अधिकार पर हमला मानते हैं। दूसरी ओर, इज़राइली सैन्य वापसी की समय-सीमा और शर्तें अब भी अस्पष्ट हैं।
युद्धविराम के बावजूद सीमित सैन्य कार्रवाइयों की खबरें इस पूरी योजना की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं। शांति बिना भरोसे के नहीं बन सकती, और भरोसा बिना समानता के नहीं टिकता।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थान
‘बोर्ड ऑफ पीस’ अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में अपनी नेतृत्व भूमिका को फिर से स्थापित करने का प्रयास भी है। यह पहल संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं के साथ-साथ एक समानांतर, अमेरिकी-प्रभावित ढांचे का निर्माण करती है। यह बहुपक्षीयता से “à la carte” बहुपक्षीयता की ओर झुकाव को दर्शाता है—जहाँ सहयोग सुविधा के अनुसार चुना जाता है।
टोनी ब्लेयर जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी इस पहल को नैतिक वैधता देने की कोशिश है, लेकिन इराक युद्ध की विरासत उन्हें फिलिस्तीनी समाज में विवादास्पद बनाती है।
निष्कर्ष: आशा और आशंका के बीच
‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक साहसिक लेकिन जोखिम भरा प्रयोग है। यह गाजा के लिए संसाधन, ध्यान और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता ला सकता है। यदि इसे पारदर्शिता, स्थानीय सहभागिता और न्यायपूर्ण राजनीतिक समाधान से जोड़ा गया, तो यह सचमुच शांति और विकास का मार्ग खोल सकता है।
लेकिन यदि यह केवल शक्ति-संतुलन और रणनीतिक हितों का औजार बना, तो यह भी उन असफल पहलों की सूची में जुड़ जाएगा, जिन्होंने गाजा को शांति से अधिक निराशा दी।
अंततः, शांति बोर्ड नहीं, लोग बनाते हैं। जब तक गाजा के लोगों को अपनी नियति तय करने का वास्तविक अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी “बोर्ड ऑफ पीस” स्थायी शांति की गारंटी नहीं दे सकता।
स्रोत: व्हाइट हाउस आधिकारिक बयान, बीबीसी, द गार्जियन, अल जज़ीरा, रॉयटर्स आदि प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स, जनवरी 2026.
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