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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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PM Narendra Modi’s Constitution Day Message: Duty-Oriented Citizenship and India’s Journey Toward Viksit Bharat

संविधान दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश: कर्तव्य-उन्मुख नागरिकता और विकसित भारत की दिशा

सारांश (Abstract)

भारतीय संविधान दिवस (26 नवम्बर) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया संदेश कर्तव्यों-उन्मुख नागरिकता (duty-based citizenship) पर गहरा बल देता है। यह लेख इस संदेश का विश्लेषण भारत में संवैधानिक राष्ट्रवाद, नागरिक दायित्व और शासन-संस्कृति के बदलते विमर्शों के संदर्भ में करता है। अध्ययन यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री का कर्तव्य-केन्द्रित आग्रह भारतीय राजनीतिक विचार, विशेष रूप से गांधी, अंबेडकर और आधुनिक विकास-राज्य की अवधारणा, से कैसे संवाद स्थापित करता है और “विकसित भारत” के व्यापक नैरेटिव में किस प्रकार समाहित होता है।


1. भूमिका (Introduction)

संविधान दिवस 2025 पर प्रधानमंत्री का संदेश केवल एक औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि समकालीन भारतीय शासन-दर्शन में कर्तव्यों की पुनर्परिभाषा का महत्वपूर्ण प्रयास भी था। जहाँ भारत का राजनीतिक विमर्श लंबे समय से अधिकार-केंद्रित रहा है, वहीं प्रधानमंत्री का आग्रह यह संकेत देता है कि अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे को पूरक करते हैं। यह लेख इस भाषण को एक प्राथमिक स्रोत के रूप में लेते हुए, कर्तव्य-प्रधान नैतिक-राजनीतिक संरचना का समाजशास्त्रीय और संवैधानिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।


2. संवैधानिक राष्ट्रवाद और कर्तव्य-चिंतन (Constitutional Nationalism and Duty Discourse)

भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार (Part III) और मौलिक कर्तव्य (Part IVA) के बीच संबंध स्वभावतः जटिल है। प्रधानमंत्री के संदेश में तीन प्रमुख प्रतिपाद्य उभरते हैं:

  1. राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की सामूहिक भावना – यह विचार संविधान-निर्माताओं द्वारा कल्पित “सहभागी गणराज्य” की संकल्पना से मेल खाता है।
  2. कर्तव्यों को विकास-राज्य का आधार – प्रधानमंत्री ने विकास को केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं, बल्कि नागरिक आचरणों का परिणाम बताया, जो कि कर्तव्य-निष्ठा से संचालित होता है।
  3. संवैधानिक राष्ट्रवाद का पुनर्संस्कार – भाषण यह संकेत देता है कि संविधान को आदर्शों की स्थिर ग्रंथ-संहिता नहीं, बल्कि व्यवहारिक कर्तव्यों की प्रेरक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।

3. गांधी, अंबेडकर और कर्तव्य-प्रधान नैतिकता: एक बौद्धिक संवाद

प्रधानमंत्री की दृष्टि भारतीय राजनीतिक चिंतन के दो महत्त्वपूर्ण स्तंभों से संवाद स्थापित करती है:

(क) गांधी का नैतिक कर्तव्यवाद

गांधी मानते थे कि “अधिकार कर्तव्य-पालन से स्वतः उत्पन्न होते हैं।” प्रधानमंत्री का संदेश इसी परिप्रेक्ष्य को समकालीन संदर्भों में पुनर्जीवित करता है—विशेषकर स्वच्छता, सामाजिक सद्भाव, अनुशासन और सार्वजनिक आचरण जैसे क्षेत्रों में।

(ख) अंबेडकर का संवैधानिक आचरण (Constitutional Morality)

अंबेडकर ने कानून से अधिक महत्वपूर्ण “संवैधानिक आचरण” को माना, जो नागरिकों की कर्तव्य-निष्ठा और संस्थागत मर्यादा पर आधारित होता है। प्रधानमंत्री का आग्रह इसी विचार को आधुनिक लोक-प्रशासन की भाषा में प्रस्तुत करता है।


4. विकसित भारत (Developed India) का विमर्श और कर्तव्य-उन्मुखता

प्रधानमंत्री के संदेश में “विकसित भारत” केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं है; यह एक नैतिक-सांस्कृतिक परियोजना की तरह भी सामने आता है। इसमें नागरिकों की भूमिका तीन स्तरों पर रेखांकित होती है:

  1. सामाजिक कर्तव्य — स्वच्छता, लैंगिक समानता, जन-स्वास्थ्य, और सामुदायिक उत्तरदायित्व।
  2. नागरिक कर्तव्य — मतदान, कर-अनुशासन, संस्थाओं का सम्मान और कानून का पालन।
  3. राष्ट्रीय कर्तव्य — सामाजिक सामंजस्य, पर्यावरण संरक्षण, और वैश्विक मंच पर भारत की सकारात्मक छवि।

यह बहु-स्तरीय ढांचा विकास को “भागीदारी आधारित राष्ट्र-निर्माण” के रूप में प्रस्तुत करता है।


5. आलोचनात्मक विमर्श (Critical Discourse Analysis)

अकादमिक दृष्टि से प्रधानमंत्री का यह संदेश तीन आलोचनात्मक प्रश्नों को जन्म देता है:

  1. क्या कर्तव्यों पर बल अधिकारों की प्राथमिकता को कमजोर कर सकता है?
    अधिकार और कर्तव्यों के संतुलन पर भारतीय लोकतंत्र का भविष्य निर्भर करता है।

  2. क्या कर्तव्य-उन्मुखता संरचनात्मक असमानताओं के मुद्दों को छिपा देती है?
    सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ नागरिकों की कर्तव्य-पालन की क्षमता को प्रभावित करती हैं।

  3. क्या यह भाषण विकास-दर्शन के “नागरिक केंद्रित” मॉडल को मजबूत करता है?
    अकादमिक दृष्टि से यह नागरिक-भागीदारी आधारित शासन के वैश्विक रुझानों से मेल खाता है।


6. निष्कर्ष (Conclusion)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संविधान दिवस संदेश भारतीय लोकतंत्र में कर्तव्य-प्रधान नागरिकता की उभरती धारा को चिह्नित करता है। यह न केवल संवैधानिक आदर्शों की पुनर्स्मृति है, बल्कि “विकसित भारत” की परियोजना में नागरिकों की सक्रिय भूमिका का आह्वान भी है। अकादमिक दृष्टि से यह संदेश—संवैधानिक राष्ट्रवाद, नागरिक दायित्व और विकास-राज्य—इन तीनों के संगम पर एक नए विमर्श का निर्माण करता है।



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