The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...
Model Code of Conduct (MCC) Reforms 2025: A New Framework for Electoral Transparency and Democratic Ethics
मॉडल कोड ऑफ कन्डक्ट (MCC) में प्रस्तावित सुधार 2025: भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता और नैतिकता की नई दिशा
प्रस्तावना
भारतीय लोकतंत्र, विश्व का सबसे बड़ा निर्वाचन तंत्र होने के नाते, निष्पक्षता और पारदर्शिता के उच्च मानदंडों पर टिका हुआ है। मॉडल कोड ऑफ कन्डक्ट (MCC) इस प्रक्रिया का एक अनौपचारिक किंतु महत्वपूर्ण अंग रहा है, जो चुनावी आचार संहिता के रूप में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के व्यवहार को नियंत्रित करता है। 1960 के दशक में केरल विधानसभा चुनावों से उद्भूत यह संहिता 1991 में सर्वसम्मति से अपनाई गई और तब से निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चुनाव अवधि में लागू की जाती रही है। किंतु डिजिटल युग की चुनौतियाँ—सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार, डीपफेक वीडियो, धनबल का दुरुपयोग तथा सत्ताधारी दलों द्वारा सरकारी योजनाओं का चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल—ने MCC की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। नवंबर 2025 में चर्चा में आए प्रस्तावित सुधार इस संहिता को एक मजबूत कानूनी ढांचे में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होते हैं। यह लेख इन सुधारों का आलोचनात्मक परीक्षण करता है, उनकी संभावित प्रभावशीलता, चुनौतियों तथा भारतीय लोकतंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
MCC की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान सीमाएँ
MCC का विकास भारतीय निर्वाचन प्रणाली की परिपक्वता का प्रतीक है। शुरू में यह एक स्वैच्छिक संहिता थी, जो राजनीतिक दलों की सहमति पर आधारित थी। समय के साथ इसमें सात प्रमुख भाग जोड़े गए, जिनमें चुनावी सभाओं का आयोजन, जुलूस, मतदान दिवस के दिशानिर्देश तथा मेनिफेस्टो के प्रावधान शामिल हैं। यह संहिता सत्ताधारी दलों को सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग से रोकती है और सभी पक्षों को समान अवसर प्रदान करने का प्रयास करती है।
तथापि, MCC की गैर-कानूनी प्रकृति इसकी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) का हिस्सा नहीं है, जिसके कारण उल्लंघनों पर दंड केवल नैतिक दबाव या चुनाव स्थगित करने तक सीमित रहता है। हाल के उदाहरण, जैसे बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सत्ताधारी दल द्वारा नकद हस्तांतरण योजनाओं की घोषणा, MCC की लचीलता को उजागर करते हैं। डिजिटल माध्यमों से फैलने वाला दुष्प्रचार, विशेषकर AI-जनित डीपफेक, पारंपरिक निगरानी तंत्र को अप्रभावी बना रहा है। Law Commission की 255वीं रिपोर्ट (2015) तथा Goswami Committee (1990) ने पहले ही MCC को कानूनी दर्जा देने की सिफारिश की थी, किंतु कार्यान्वयन में विलंब हुआ।
प्रस्तावित सुधार 2025: एक नई रूपरेखा
नवंबर 2025 में निर्वाचन आयोग द्वारा चर्चित सुधार MCC को 'नैतिक दिशानिर्देश' से 'कानूनी बंधन' में बदलने का प्रयास करते हैं। प्रमुख प्रस्ताव निम्नलिखित हैं:
1. डिजिटल निगरानी का सशक्तीकरण: Integrated MCC Violation Tracking System (IMVTS) की स्थापना, जो रीयल-टाइम सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सुनिश्चित करेगी। AI-आधारित एल्गोरिदम डीपफेक और हेट स्पीच का स्वचालित पता लगाएंगे, जिससे उल्लंघनों पर त्वरित कार्रवाई संभव हो सकेगी।
2. कानूनी एकीकरण: MCC के प्रमुख प्रावधानों को RPA, 1951 में समाहित करने की सिफारिश, जिससे उल्लंघन RPA की धारा 133 के तहत दंडनीय हो जाएंगे। इससे चुनावी अपराधों पर जुर्माना या अयोग्यता जैसे कठोर दंड लागू हो सकेंगे।
3. सत्ताधारी दलों पर अंकुश: सरकारी विज्ञापनों और योजनाओं की घोषणाओं पर पूर्ण प्रतिबंध, तथा 'Purdah Rules' की तरह ब्रिटेन मॉडल अपनाना, जहां चुनाव घोषणा के बाद नीतिगत निर्णय स्थगित हो जाते हैं।
4. अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं का समावेश: अमेरिका के Federal Election Campaign Act (FECA) से प्रेरित व्यय सीमा और कनाडा की न्यायिक समीक्षा प्रणाली को अपनाकर ECI को अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ प्रदान करना।
ये सुधार NITI Aayog और PRS India की हालिया रिपोर्टों से प्रेरित प्रतीत होते हैं, जो डिजिटल युग में निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता पर बल देते हैं।
आलोचनात्मक विश्लेषण: अवसर और चुनौतियाँ
ये प्रस्ताव निस्संदेह क्रांतिकारी हैं। डिजिटल निगरानी से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और छोटे दल तथा स्वतंत्र उम्मीदवार समान अवसर प्राप्त कर सकेंगे। MCC का कानूनी दर्जा प्राप्त करना लोकतांत्रिक नैतिकता को मजबूत करेगा, जो GS Paper 4 के संदर्भ में 'सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी' के सिद्धांत से जुड़ता है। अंतरराष्ट्रीय तुलना से भारतीय प्रणाली वैश्विक मानकों के अनुरूप होगी।
किंतु चुनौतियाँ तो हैं ही; ये सुधार कई गंभीर जोखिम भी वहन करते हैं। AI-आधारित निगरानी से डेटा गोपनीयता का उल्लंघन हो सकता है, जो संविधान की अनुच्छेद 21 का स्पष्ट अतिक्रमण होगा। छोटे राजनीतिक दलों पर अनुपालन का अत्यधिक बोझ पड़ सकता है, जिससे संघीय ढांचे की विविधता प्रभावित होगी। ECI की बढ़ती शक्तियाँ कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के साथ संवैधानिक असंतुलन उत्पन्न कर सकती हैं। इसके अलावा, इन सुधारों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु पर्याप्त बजट और प्रशिक्षित मानव संसाधनों की आवश्यकता होगी; इनकी अनुपस्थिति में ये प्रस्ताव मात्र कागजी शेर बनकर रह जाएंगे।
निष्कर्ष
MCC सुधार 2025 भारतीय लोकतंत्र के लिए एक संक्रमणकालीन अवसर प्रस्तुत करते हैं, जहां परंपरागत नैतिकता डिजिटल युग की कानूनी मजबूती से मिलकर एक नई निर्वाचन संस्कृति का निर्माण कर सकती है। यदि ये सुधार शीघ्र लागू हो जाएं, तो भारत न केवल विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र वरन सबसे निष्पक्ष भी बन सकता है। तथापि, सफलता संवैधानिक संतुलन, तकनीकी सतर्कता और सभी हितधारकों की सहभागिता पर निर्भर करेगी। निर्वाचन आयोग को इन सुधारों को औपचारिक रूप देने और संसदीय बहस के लिए प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। अंततः, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ही लोकतंत्र की सच्ची आत्मा हैं, और MCC सुधार इस दिशा में एक सराहनीय प्रयास है।
(यह लेख पूर्णतः मौलिक है तथा वर्तमान निर्वाचन चर्चाओं पर आधारित है। संदर्भ के लिए ECI की आधिकारिक वेबसाइट तथा PRS India की रिपोर्ट्स का अध्ययन अनुशंसित है।)
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