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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...

BRICS Pay vs SWIFT: How De-Dollarization Is Reshaping Global Finance and India’s Digital Leadership

BRICS Pay vs SWIFT 2025: डॉलर निर्भरता कैसे घटाएगी नई भुगतान प्रणाली? | UPSC Current Affairs

प्रिय यूपीएससी अभ्यर्थियों, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की एकछत्र राज आज चुनौती के घेरे में है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों ने SWIFT जैसी डॉलर-आधारित भुगतान प्रणाली के राजनीतिक हथियार बनने का खुलासा कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में BRICS Pay एक क्रांतिकारी वैकल्पिक मॉडल के रूप में उभरा है, जो ब्लॉकचेन तकनीक और स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से BRICS देशों—ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका तथा नए सदस्यों जैसे सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, इथियोपिया—के बीच सीधा, तेज़ और स्वतंत्र व्यापार सुनिश्चित करने का वादा करता है। यह न केवल तकनीकी नवाचार है, बल्कि भू-आर्थिक स्वायत्तता की दिशा में एक सामरिक कदम भी है।

SWIFT, जिसकी स्थापना 1973 में हुई थी, आज भी वैश्विक वित्तीय संचार की रीढ़ है। यह 200 से अधिक देशों के 11,000 से ज़्यादा बैंकों को जोड़ता है और अंतरराष्ट्रीय भुगतानों के लिए मानकीकृत मैसेजिंग सेवा प्रदान करता है। लेकिन यह स्वयं धन हस्तांतरण नहीं करता—बस सूचना का आदान-प्रदान करता है। इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी इसका केंद्रीकृत नियंत्रण है, जो मुख्यतः अमेरिकी और यूरोपीय बैंकों के हाथ में है। परिणामस्वरूप, 80 प्रतिशत से अधिक अंतरराष्ट्रीय लेन-देन डॉलर में होते हैं, और अमेरिका इसे प्रतिबंधों का हथियार बना सकता है। 2022 में रूस को SWIFT से बाहर करने का निर्णय इसका जीता-जागता उदाहरण है, जिसने रूसी अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई।

इसके विपरीत, BRICS Pay एक विकेंद्रीकृत, ब्लॉकचेन-आधारित नेटवर्क है, जिसकी कल्पना 2019 में हुई और 2023-24 में इसका विकास तेज़ हुआ। 2025 तक यह वास्तविकता के करीब पहुँच चुका है। इसका मूल उद्देश्य है—डॉलर को बायपास कर स्थानीय मुद्राओं जैसे भारतीय रुपया, चीनी युआन, रूसी रूबल और ब्राज़ीलियन रियाल में सीधा सेटलमेंट। यह न केवल लेन-देन की लागत और समय को कम करेगा, बल्कि CBDC (केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा) जैसे भारत के ई-रुपया और चीन के e-CNY के साथ एकीकृत होकर रीयल-टाइम भुगतान संभव बनाएगा। 2025 में चीन-ब्राज़ील व्यापार में डॉलर का उपयोग 20 प्रतिशत तक घट चुका है, और भारत-रूस तेल व्यापार में रुपया-रूबल मॉडल सफलतापूर्वक चल रहा है।

भारत इस पहल में तकनीकी नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है। UPI, RuPay और Aadhaar जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) ने भारत को वैश्विक डिजिटल भुगतान का मॉडल बना दिया है। अब ‘India Stack’ को BRICS Pay में निर्यात कर हम ब्लॉकचेन सुरक्षा, इंटरऑपरेबिलिटी और रुपया अंतरराष्ट्रीयकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। RBI का ई-रुपया पायलट 2024 से ही BRICS CBDC फ्रेमवर्क से जुड़ने की दिशा में कार्यरत है। यह आत्मनिर्भर भारत और डिजिटल इंडिया की परिकल्पना का वैश्विक विस्तार है।

दोनों प्रणालियों की तुलना करें तो अंतर स्पष्ट है। SWIFT पारंपरिक, धीमा (1-3 दिन), महंगा और राजनीतिक जोखिमों से ग्रस्त है, जबकि BRICS Pay आधुनिक, त्वरित (सेकंड्स में), सस्ता और बहुपक्षीय नियंत्रण वाला है। लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं—सदस्य देशों में डिजिटल अवसंरचना की असमानता, मुद्रा विनिमय दरों की अस्थिरता, भारत-चीन जैसे राजनीतिक तनाव और पश्चिमी विरोध। फिर भी, 2025 तक BRICS व्यापार का 25 प्रतिशत डॉलर-मुक्त हो चुका है, और NDB के माध्यम से स्थानीय मुद्रा ऋण बढ़ रहे हैं।

भविष्य में BRICS Pay वैश्विक वित्तीय बहुध्रुवीयता की नींव रख सकता है। यदि 2030 तक 50 प्रतिशत BRICS व्यापार डॉलर से मुक्त हो जाता है, तो यह न केवल दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करेगा, बल्कि वैश्विक वित्तीय शासन को अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक बनाएगा। भारत के लिए यह सुनहरा अवसर है कि वह अपने डिजिटल अनुभव से नई विश्व व्यवस्था में नेतृत्व करे।

यूपीएससी के लिए यह विषय अत्यंत स्कोरिंग है। प्रीलिम्स में तथ्य (SWIFT वर्ष, BRICS सदस्य), मेन्स में विश्लेषण (De-dollarization के प्रभाव), और निबंध में दृष्टिकोण (बहुध्रुवीय विश्व में वित्तीय स्वायत्तता) के लिए तैयार रहें। तुलना टेबल बनाएँ, उदाहरण दें, और हमेशा संतुलित दृष्टिकोण अपनाएँ। BRICS Pay केवल तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक शक्ति का प्रतीक है—इसे समझें, विश्लेषित करें, और उत्तर को जीवंत बनाएँ। शुभकामनाएँ!

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