India–Mauritius Tax Route Under Scrutiny: Tiger Global–Flipkart Case and Its Impact on Foreign Investment
भारत-मॉरीशस निवेश मार्ग और टाइगर ग्लोबल पर कर विवाद: एक विश्लेषण
भारत के आर्थिक परिदृश्य में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दशकों से मॉरीशस जैसे कर आश्रय (टैक्स हेवन) वाले देशों के माध्यम से आता रहा है। अनुमानित रूप से, इस मार्ग से भारत में लगभग 180 अरब डॉलर की पूंजी का प्रवाह हुआ है, जो मुख्य रूप से प्राइवेट इक्विटी फंडों, वेंचर कैपिटल और संस्थागत निवेशकों द्वारा संचालित रहा। यह व्यवस्था भारत और मॉरीशस के बीच द्विपक्षीय कर संधि (डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट या डीटीएए) पर आधारित थी, जिसने निवेशकों को पूंजीगत लाभ पर न्यूनतम या शून्य कर का लाभ प्रदान किया। हालांकि, हालिया घटनाक्रमों, विशेष रूप से टाइगर ग्लोबल के फ्लिपकार्ट हिस्सेदारी बिक्री से जुड़े कर विवाद ने इस पूरे ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जनवरी 2026 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले ने इस निवेश मार्ग की वैधता और कर चोरी के खिलाफ भारत की सख्ती को रेखांकित किया। यह निर्णय न केवल टाइगर ग्लोबल जैसे वैश्विक निवेशकों के लिए एक झटका है, बल्कि यह वैश्विक कर नीतियों, निवेश संरचनाओं और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कर नियंत्रण के व्यापक संदर्भ में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस लेख में हम इस निवेश मार्ग के उद्भव, टाइगर ग्लोबल मामले की पृष्ठभूमि, न्यायिक फैसले के प्रमुख बिंदुओं और उसके दूरगामी प्रभावों का गहन विश्लेषण करेंगे।
मॉरीशस: विदेशी निवेशकों का पसंदीदा गेटवे क्यों?
भारत-मॉरीशस डीटीएए की स्थापना 1982 में हुई थी, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को प्रोत्साहित करना था। इस संधि के तहत, मॉरीशस में पंजीकृत कंपनियों द्वारा भारत में किए गए निवेशों पर पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) पर कर मॉरीशस में ही लगाया जाना था, जहां कर दरें अत्यंत निम्न हैं—कई मामलों में शून्य। परिणामस्वरूप, विदेशी निवेशक—विशेषकर अमेरिकी और यूरोपीय फंड—अपने निवेशों को मॉरीशस स्थित होल्डिंग कंपनियों या विशेष उद्देश्य वाली संस्थाओं (एसपीवी) के माध्यम से भारत में निर्देशित करते थे। इससे वे भारत में लागू होने वाले करों से बचाव कर पाते थे, जबकि मॉरीशस में न्यूनतम कर देयता होती थी।
यह रणनीति, जिसे ‘ट्रीटी शॉपिंग’ कहा जाता है, ने मॉरीशस को भारत में एफडीआई का सबसे बड़ा स्रोत बना दिया। 2000 से 2025 तक भारत में कुल एफडीआई का लगभग 34 प्रतिशत मॉरीशस से आया। इस व्यवस्था का लाभ मुख्य रूप से प्रौद्योगिकी, ई-कॉमर्स और स्टार्टअप क्षेत्रों में देखा गया, जहां टाइगर ग्लोबल जैसे फंडों ने भारी निवेश किया। हालांकि, आलोचकों का तर्क रहा है कि यह संधि कर चोरी को बढ़ावा देती है और भारत के राजस्व को नुकसान पहुंचाती है, क्योंकि वास्तविक निवेशक मॉरीशस में कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं चलाते, बल्कि केवल कर लाभ के लिए इस देश का उपयोग करते हैं।
2017 में भारत ने इस संधि में संशोधन किया, जिससे नए निवेशों पर कैपिटल गेन्स टैक्स भारत में ही लगाया जाने लगा। लेकिन पुराने निवेशों पर विवाद बरकरार रहा, जो टाइगर ग्लोबल मामले में चरम पर पहुंचा।
टाइगर ग्लोबल और फ्लिपकार्ट सौदा: विवाद की जड़
टाइगर ग्लोबल, एक प्रमुख अमेरिकी हेज फंड, ने 2018 में भारतीय ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी को वॉलमार्ट को 1.6 अरब डॉलर में बेचा। इस सौदे से टाइगर ग्लोबल को भारी मुनाफा हुआ, लेकिन फंड ने दावा किया कि चूंकि निवेश मॉरीशस स्थित संस्थाओं के माध्यम से किया गया था, इसलिए भारत-मॉरीशस डीटीएए के तहत कैपिटल गेन्स पर भारत में कोई कर देय नहीं है। भारतीय कर अधिकारियों ने इस दावे को चुनौती दी, तर्क देते हुए कि मॉरीशस की संस्थाएं मात्र ‘कंड्यूइट’ (माध्यम) हैं, जिनका कोई वास्तविक व्यावसायिक आधार नहीं है।
टाइगर ग्लोबल ने मॉरीशस से प्राप्त टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट (टीआरसी) का हवाला दिया, लेकिन कर अधिकारियों ने जनरल एंटी-अवॉयडेंस रूल्स (जीएएआर) का सहारा लिया, जो 2017 से लागू हैं और कर चोरी वाली व्यवस्थाओं को अमान्य ठहराते हैं। मामला निचली अदालतों से गुजरता हुआ सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां यह निवेश संरचनाओं की वैधता पर एक निर्णायक परीक्षा बन गया।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: एक नया मानदंड
15 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने टाइगर ग्लोबल के खिलाफ फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि मॉरीशस स्थित संस्थाओं का उपयोग ‘अनुचित कर बचाव व्यवस्था’ के रूप में किया गया था, जिसमें कोई व्यावसायिक औचित्य नहीं था। प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- केवल टीआरसी होना कर छूट के लिए पर्याप्त नहीं है।
- जीएएआर, डीटीएए पर हावी हो सकता है।
- अदालत ने ‘कॉर्पोरेट वेल हटाने’ की अवधारणा अपनाई और वास्तविक स्वामित्व की जांच की।
अदालत ने लगभग 6.05 प्रतिशत की दर से कर लगाने का आदेश दिया, जिससे टाइगर ग्लोबल पर करोड़ों रुपये का दायित्व आया।
फैसले के व्यापक प्रभाव
यह निर्णय ट्रिटी शॉपिंग की प्रथा को हतोत्साहित करेगा। विदेशी निवेशक अब यह सुनिश्चित करेंगे कि उनकी संरचनाओं में वास्तविक व्यावसायिक गतिविधियां हों। इससे अल्पकाल में निवेश प्रवाह प्रभावित हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह पारदर्शी और मजबूत निवेश वातावरण बनाएगा।
भारत की कर नीति अब ओईसीडी के बीईपीएस (Base Erosion and Profit Shifting) मानकों के अनुरूप है। हालांकि, आलोचक मानते हैं कि इससे निवेशकों का विश्वास अस्थायी रूप से डगमगा सकता है, इसलिए सरकार को स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने होंगे।
निष्कर्ष
टाइगर ग्लोबल मामला दर्शाता है कि अब केवल कानूनी ढांचे बनाकर कर से नहीं बचा जा सकता। भारत अब औपचारिकता से आगे जाकर निवेश के वास्तविक उद्देश्य की जांच करेगा। यह फैसला भारत को एक पारदर्शी, न्यायसंगत और जिम्मेदार निवेश गंतव्य के रूप में मजबूत करता है, जहां निवेश न केवल लाभदायक बल्कि कानूनी और नैतिक रूप से भी टिकाऊ होना चाहिए।
With Reuters Inputs
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