ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग
प्रस्तावना
गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति
2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया।
इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा कॉन्फ्लिक्ट’ नाम से 20-सूत्रीय योजना घोषित की। इसके मुख्य लक्ष्य थे—
- गाजा का डी-रेडिकलाइजेशन
- हमास का निरस्त्रीकरण
- अस्थायी संक्रमणकालीन प्रशासन
- पुनर्निर्माण और आर्थिक पुनरुद्धार
अक्टूबर 2025 में इजरायल और हमास के बीच एक अस्थायी सीजफायर हुआ और गाजा में एक तकनीकी, गैर-राजनीतिक फिलिस्तीनी प्रशासनिक समिति बनाई गई। इसी ढांचे की निगरानी के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को सामने लाया गया।
प्रारंभिक स्वरूप: गाजा-केंद्रित संस्था
नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के तहत बोर्ड ऑफ पीस को गाजा में—
- प्रशासनिक निगरानी
- मानवीय सहायता का समन्वय
- पुनर्निर्माण परियोजनाओं की देखरेख
- आर्थिक स्थिरीकरण
की जिम्मेदारी दी गई। इसका मूल जनादेश 2027 तक सीमित और केवल गाजा तक था।
बोर्ड की अध्यक्षता स्वयं डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं। इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, जेरेड कुश्नर जैसे राजनीतिक और कूटनीतिक चेहरे शामिल हैं। शुरू में इसे एक अस्थायी, तकनीकी और क्षेत्र-विशेष संस्था के रूप में देखा गया।
जनवरी 2026: सीमित योजना से वैश्विक संस्था तक
जनवरी 2026 में तस्वीर अचानक बदल गई। नए चार्टर के साथ बोर्ड ऑफ पीस का दायरा गाजा से बढ़ाकर—
“संघर्षग्रस्त या संघर्ष की आशंका वाले सभी क्षेत्रों”
तक कर दिया गया।
अब यह संस्था केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे वैश्विक शांति-निर्माण मंच के रूप में पेश किया गया।
मुख्य विशेषताएं—
- सदस्य देशों को तीन वर्ष का कार्यकाल
- 1 अरब डॉलर के योगदान पर स्थायी सदस्यता
- ट्रंप आजीवन अध्यक्ष (केवल स्वैच्छिक इस्तीफा या उनके द्वारा नियुक्त बोर्ड की सर्वसम्मति से हटाए जा सकते हैं)
- दावा: संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं से अधिक “तेज़, चुस्त और परिणामोन्मुख” ढांचा
यह बदलाव ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लगभग एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था में बदल देता है—लेकिन अमेरिकी नियंत्रण में।
संयुक्त राष्ट्र बनाम बोर्ड ऑफ पीस
संयुक्त राष्ट्र की मूल भावना है—सभी देशों की भागीदारी, बहस और सहमति।
इसके विपरीत, बोर्ड ऑफ पीस—
- चयनित देशों का क्लब है
- आर्थिक योगदान के आधार पर स्थायी सदस्यता देता है
- अमेरिका-केंद्रित नेतृत्व संरचना रखता है
ट्रंप पहले भी संयुक्त राष्ट्र को “अप्रभावी और महंगा” कह चुके हैं। फंडिंग में कटौती और संस्थानों से दूरी उनकी नीति का हिस्सा रही है।
अब कई विश्लेषक मानते हैं कि बोर्ड ऑफ पीस—
- यूएन सुरक्षा परिषद को दरकिनार करने का प्रयास है
- बहुपक्षीयता को “à la carte” यानी अपनी सुविधा के अनुसार अपनाने की नीति का उदाहरण है
- वैश्विक शासन में अमेरिकी वर्चस्व को नए रूप में स्थापित करने की कोशिश है
यूरोपीय देशों और कई विकासशील देशों ने चिंता जताई है कि इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अधिक खंडित हो सकती है।
भारत के लिए अर्थ
जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण मिलना भारत-अमेरिका संबंधों की गहराई को दिखाता है।
भारत के सामने तीन बड़े विकल्प हैं—
- गाजा पुनर्निर्माण में योगदान देकर वैश्विक छवि मजबूत करना
- संघर्ष समाधान में एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभरना
- अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को और सुदृढ़ करना
लेकिन जोखिम भी हैं—
- 1 अरब डॉलर जैसे भारी वित्तीय योगदान का दबाव
- अमेरिका-केंद्रित संस्था में शामिल होकर यूएन-केंद्रित पारंपरिक नीति से विचलन
- गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रश्न
भारत को सावधानी से यह संतुलन बनाना होगा कि वह न तो वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे हटे, न ही किसी एक शक्ति के अधीन दिखे।
वैश्विक राजनीति के लिए निहितार्थ
बोर्ड ऑफ पीस केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक संकेत है—
- बहुपक्षीय व्यवस्था संकट में है
- बड़ी शक्तियां नई-नई संरचनाएं बना रही हैं
- नियमों पर आधारित व्यवस्था से शक्ति-आधारित व्यवस्था की ओर झुकाव बढ़ रहा है
यदि बोर्ड सफल होता है, तो यह शांति स्थापना का नया मॉडल बन सकता है।
यदि असफल होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में और अविश्वास, विभाजन और प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगा।
निष्कर्ष
ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ गाजा संकट से जन्मी एक योजना है, लेकिन उसका रूप अब वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने लगा है।
यह पहल बताती है कि—
- पुरानी संस्थाएं चुनौती में हैं
- नई संस्थाएं सत्ता-संतुलन को बदलने का माध्यम बन रही हैं
- शांति भी अब भू-राजनीति का उपकरण बनती जा रही है
भारत जैसे उभरते देश के लिए यह समय केवल अवसर का नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय का है—जहां राष्ट्रीय हित, वैश्विक जिम्मेदारी और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन ही असली कूटनीति होगी।
With The Indian Express Inputs
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